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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

( १४ )
१४ १४ दर्शननिन्दा का निषेध १६-१७
१५ १५ शास्त्रविरुद्ध गुरुवचन भी अमान्य १७
१६ १६ सत्यनिष्ठ शिष्य को रहस्यकथन का निर्देश १७-१८
१७ १७ उपास्य विद्या का नित्य अनुसन्धान आवश्यक १८-१९
१८ १८ सतत शिवता का समावेश आवश्यक १९-२०
१९ १९ क्रोध, काम आदि लोकविरुद्ध आचरण
का निषेध २०-२१
२० २० एक गुरु की उपासना का निर्देश २१-२२
२१ २१ निष्परिग्रहता धर्म २३
२२ २२ फलाकांक्षारहित कर्म करने का निर्देश २३-२४
२३ २३ नित्यकर्म लोप अनुचित २४
२४ २४ पञ्चमकार के अभाव में भी क्रम का
पालन अनिवार्य २४-२५
२५ २५ सर्वत्र निर्भयता का उपदेश २५
२६ २६ सारभूतधर्म-वेद्य ही हव्य, इन्द्रियाँ स्रुक्
शक्ति ज्वाला, स्वात्मा ही शिव, स्वयं होता २५-२६
२७ २७ निर्विषय चिद्विमर्श ही फल २६-२७
२८ २८ आत्मलाभ सर्वोत्कृष्ट फल, इससे
बढ़कर कुछ नहीं २७
२९ २९ शास्त्रशैली २७-२८
३० ३० स्वशास्त्र प्रशंसा (गुप्त विद्या) २८-२९
३१ ३१ दीक्षा अनिवार्यतः आवश्यक २९-३०
३२ ३२ तीन प्रकार की दीक्षाएँ ३०-३१
३३ ३३ दीक्षा क्रमिक रूप से सभी या एक ही
आवश्यक वैमत्य का उल्लेख ३१
३४ ३४ गुरुद्वारा दीक्षा की प्रक्रिया ३२-३४
३५ ३५ शाम्भवी दीक्षा ३४-३५