परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ )
७५ २२ पात्रस्थापन विधि ८७-८८
७६ २३ सामान्य, विशेष अर्घ्य ८८
७७ २४ द्वादशकलात्मक सूर्य और षोडशकलात्मक
चन्द्र की कलाओं को अर्घ्य प्रदान करने का
निर्देश और अर्घ्य मन्त्र ८८-८९
७८ २५ अकथ त्रिकोण में ४८ वर्णों का प्रयोग, मध्य
में वाक्, काम और शक्ति बीजों का प्रयोग ८९-९१
७९ २६ चौरानबे मन्त्रों के प्रयोग से द्रव्य संस्कार ९१-९२
८० २७ अखण्डादि पाँच मन्त्रों के वैकल्पिक
प्रयोग का निर्देश ९२-९३
८१ २८ अनुष्टुप् विद्या ९३-९५
८२ २९ अमृतेशी मन्त्र ९५
८३ ३० वाग्वादिनी विद्या सहित पाँच मन्त्रों से
अर्घ्यशोधन ९५-९६
८४ ३१ अर्घ्यपात्रस्थ बिन्दुओं से कुण्डलिनी-
ज्वाला में होम ९६-९७
८५ ३२ अर्घ्य शोधनविधि की पूर्णता का निर्देश ९७
चतुर्थः खण्डः ललिताक्रमः ९८-११२
८६ १ हृदयचक्र में उपस्थित सुषुम्णा के भेदन में
दक्ष आद्या संविद् को श्वास के माध्यम से
कुसुमाञ्जलि में आनयन की सुगम प्रक्रिया ९८-१००
८७ २ माया, लक्ष्मी और पराबीजों का उच्चारण कर
अमृतचैतन्यमूर्ति देवी का प्रकल्पना १००-१०१
८८ ३ सहस्रार में कारणानन्दविग्रहा माँ ललिता
बैन्दवचक्राधीश्वरी का समन्त्रक आवाहन १०१
८९ ४ त्रितारीपूर्व उपचार मन्त्रों से ६४ उपचारों
का प्रयोग १०१-१०२