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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पराक्रमः २११
१. पराभट्टारिका, अघोरा, श्रीकण्ठ इति दिव्यौघः।
२. शक्तिधरः, क्रोधः, त्र्यम्बक इति सिद्धौघः।
३. आनन्दः, प्रतिभादेव्यम्बा, वीरः, संविदानन्दः, मधुरादेव्यम्बा, ज्ञानः,
श्रीरामः, योग इति मानवौघः।।२६।।
सूत्र २५ के अर्थ के साथ दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के क्रमशः
तीन, तीन, आठ अर्चनीय नाथों के नाम दे दिये गये हैं। मन्त्रों की योजना
भी वहीं द्रष्टव्य है।।२६।।
बलिदानम्
ततः कलामनुना बलिं निवेद्य ।।२७।।
ततः अर्चनानन्तरम्। कलामनुना 'सौः' इत्यनेन 'पातु मां परमा कला'
इत्यत्र परायाः कलापदवाच्यत्वं निर्णीतम्। अतस्तन्मनुरसावेव भवितुमर्हति।
बलिदाने धर्माः श्रीक्रमोक्ता ग्राह्याः, साजात्यात्। अत्र जपस्य उपासनाकालस्य
वाऽनुक्तेरयं प्रयोगः सकृदेव। यद्वा, श्यामावार्त्तालीसाहचर्यात् जपसङ्ख्या
अनुक्ता तत्रत्या ग्राह्या। तावज्जपपर्यन्तोपास्तिः। अत एवाग्रे सूत्रकारो जपकालं
वक्ष्यति।।२७।।
ततः अर्थात् परादेव्यम्बा के अर्चन के उपरान्त ही बलिकर्म करना चाहिये।
इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये—
१. बलि कलामन्त्र से होनी चाहिये।
२. कला पराम्बा को भी कहते हैं। यही मन्त्र 'सौः' है।
३. 'पातु मां परमाकला' के उद्धरण में पराम्बा को ही परमा कला कहते हैं।
४. बलिदान श्रीक्रम के अनुसार करना चाहिये।
५. जप और उपासना के समय अनुक्त हैं। अतः ये कार्य एक बार ही करणीय हैं।
६. जपसंख्या श्यामावार्त्तालीवत् होनी चाहिये।।२७।।
हविःशेषस्वीकारः
हविःशेषमात्मसात्कुर्यात्। इति शिवम् ।।२८।।

२१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषमात्मसात्कारः श्रीक्रमवत्। आत्मसात्कुर्यात् इत्येवोक्त्या अत्र
सामयिकाभावः सूचितः। शिवमिति व्याख्यातमेव।।२८।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ
सौभाग्योदयनाम्न्यां (मुख्यांशमात्रायां) पराक्रमो
नामाष्टमः खण्डः सम्पूर्णः ।।८।।
हविःशेष स्वीकार करने के पहले 'सौः' मन्त्र से आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व
और शिवतत्त्व का शोधन करना चाहिये। परापूजा की हवि स्वयं या
स्वसन्ततिक्रमस्थ व्यक्ति को ही देनी चाहिये, दूसरे को नहीं। इति शिवम्।।२८।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का पराक्रम नामक अष्टम खण्ड परिपूर्ण ।।८।।
।। इति शिवम्।।

होमविधिः
[ नवमः खण्डः ]
अथ गणपतिक्रमे नित्यहोमप्रसक्तौ ललिताऽऽदिपुरश्चरणाङ्गहोमस्य
अन्यत्र काम्यहोमस्य वा प्रसक्तौ तदितिकर्त्तव्यताज्ञानस्यावश्यकतया तदर्थं
होमविधिं वक्तुमारभते—
अथ स्वेष्टमन्त्रस्य होमविधानं व्याख्यास्यामः ।।१।।
अथेति पूर्वक्रान्तविच्छेदाद्योतकः। स्वेष्टमन्त्रस्येत्यनेन, अग्रे
सौरवैष्णवादिसर्वसाधारणोपासनाया वक्ष्यमाणत्वाद् अत्रापि सर्वसाधारणो
होमविधिरिति ज्ञापितः।।१।।
अथ शब्द पूर्व में उपक्रान्त विषय के अन्त और नूतन विषय के उपक्रम
का सूचक माना जाता है। सूत्र में निर्दिष्ट स्वेष्टमन्त्रोपासना के प्रयोग में होम
का विधान सभी सम्प्रदायों में है। जैसे सौर सूर्यमन्त्र-जपान्त में होम करते हैं,
इसी तरह वैष्णवादि सम्प्रदायों में भी यही क्रम अपनाया जाता है। इसे
सर्वसाधारण उपासना क्रम में स्वीकृत विधि कहते हैं। इसी आधार पर इस होम-
विधान को भी सर्वसाधारण होम विधान मानना चाहिये।।१।।
ततस्तद्विधिमाह
चतुरस्रं कुण्डमथवा हस्तायाममङ्गुष्ठोन्नतं स्थण्डिलं कृत्वा।।२।।
कुण्डमित्यनेन तन्त्रान्तरोक्तमेखलायोनिखातादिमतिदिष्टं नाम्ना। चतुरस्रं
नित्यम्। प्रजादिकामनायां योनिकुण्डादिकमपि। सूत्रानुयायिनां न मण्डप-
विचारः। अनुक्तत्वाद् असूचितत्वाच्च। आयामो विस्तारः।।२।।

२१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
सूत्र में चतुरस्र शब्द के प्रयोग पर बल दिया गया है। अर्थात् सभी प्रकार
के उपक्रमों में कुण्ड चतुरस्र ही होना चाहिये। नैमित्तिक और काम्य प्रयोगों में
कभी इसका अपवाद भी पाया जाता है, जैसे पुत्रसन्तति परम्परा की कामना
में योनिरूप ही कुण्ड बनाया जा सकता है। सूत्रानुसारी निर्देश के अनुयायी
विद्यावान् विद्वान् यह भी मानते हैं कि, इसमें मण्डप की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि सूत्र में मण्डप की चर्चा नहीं है। अन्यत्र भी इसका निर्देश नहीं है,
न सूचना ही है।।२।।
सामान्योदकेनावोक्षणम्
सामान्यार्घ्यमुपशोध्य तेनावोक्ष्य ।।३।।
तत्तत्क्रमोक्तविधिना सामान्योदकं निर्मायेत्यर्थः। यदि पूजाङ्गहोमः, तदा
पूजायां कॢप्तेनैव कार्यसिद्धौ न निर्माणम्, अन्यत्र निर्माणमिति ज्ञेयम् ।।३।।
जिस क्रम की पूजा का विधान हो, उसमें सामान्य जल लेकर उसे शुद्ध
कर उससे पूजा द्रव्य का उच्छन करना चाहिये। किसी पूजा के अङ्गरूप में यदि
होम का विधान किया गया हो, तो जो जल प्रयुक्त हो रहा है, उसी से अवोक्षण
होना चाहिये।।३।।
रेखासु ब्रह्मादिदेवतार्चनम्
प्राचीरुदीचीस्तिस्रस्तिस्रो रेखा लिखित्वा ।।४।।
पूर्व और उत्तर तीन-तीन रेखायें खींचनी चाहिये। प्रथम प्रागग्र रेखा और
प्रथम उदगग्र के क्रम से इन पर देवों का आवाहन करने का विधान शास्त्र
में निर्दिष्ट है।।४।।
तासु रेखासु ब्रह्मयमसोमरुद्रविष्ण्विन्द्रान् षट्‌तारी नमः
सम्पुटितानभ्यर्च्य¹ ।।५।।
षट्‌तारी कुमारी प्रथमं ततो ब्रह्मणे नम इति। एवञ्च षट्‌तारनमः-
सम्पुटिता भवन्ति। एवमेव यमायेत्यादौ योज्यम्। नमःसम्पुटितानित्यनन्तरं
१. श्रीक्रम-सूत्र. ८।

होमविधिः २१५
पठित्वेति शेषः। अभ्यर्च्य इत्यस्य कर्मकाङ्क्षायां मन्त्रलिङ्गाद् देवता
योज्याः ।।५।।
उन रेखाओं पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्रम से ब्रह्मा, यम और सोम
की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह उदगग्र रेखाओं पर क्रमशः रुद्र, विष्णु और
इन्द्र की पूजा की जाती है। पूजा के मन्त्र देव नामों को त्रितारी और कुमारी
के बाद नमः से सम्पुटित करके बनाते हैं। जैसे—'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः
ब्रह्मणे नमः' इस मन्त्र से ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये।।५।।
सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः, स्वस्तिपूर्णाय शिरसे स्वाहा, उत्तिष्ठ
पुरुषाय शिखायै वषट्, धूमव्यापिने कवचाय हुम्, सप्तजिह्वाय
नेत्रत्रयाय वौषट्, धनुर्धराय अस्त्राय फट् इति षडङ्गं विधाय तेन
षडङ्गेन कुण्डमभ्यर्च्य ।।६।।
उक्तषण्मन्त्रैः स्वदेहे हृदयादिषडङ्गन्यासानन्तरं कुण्डे तैरेव मन्त्रैः
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गयुवतीः पूजयेत्।।६।।
सूत्र में छः मन्त्र निर्दिष्ट हैं। इन मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिये। इन्हीं
मन्त्रों से कुण्ड-मध्य और ऊर्ध्वादि चतुर्दिक् कुण्डशक्तियों की अर्चना करनी
चाहिये।।६।।
ततोऽग्निचक्रनिर्माणादिकमाह
तत्राष्टकोणषट्कोणत्रिकोणात्मकम् अग्निचक्रं विलिख्य
पीतायै, श्वेतायै, अरुणायै, कृष्णायै, धूम्रायै, तीव्रायै, स्फुलिङ्गिन्यै,
रुचिरायै, ज्वालिन्यै नम इति त्रिकोणमध्ये वन्हेः पीठशक्तीः
सम्पूज्य—तं तमसे, रं रजसे, सं सत्त्वाय, आम् आत्मने, अम्
अन्तरात्मने, पं परमात्मने, ह्रीं ज्ञानात्मने नम इति तत्रैवा-
भ्यर्चयेत् ।।७।।
कुण्डे स्थण्डिले वा अष्टकोणादिनिर्माणं प्रवेशरीत्या कार्यम्,
त्रिकोणस्याभ्यन्तरे भूरिदर्शनात्। पीतायै इत्यादितो ज्ञानात्मने नम इत्यन्तं
स्पष्टम्। तत्रैव त्रिकोण एव। क्रमस्तु स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।।७।।

२१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
यह होमकुण्ड और स्थण्डिल दोनों स्थानों पर किया जा सकता है। कुण्ड
में होम करना हो, तो उसमें या स्थण्डिल (वेदी) पर करना हो तो उस पर
ही प्रवेश क्रम के अनुसार अष्टकोण, षट्कोण या त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का
निर्माण करना चाहिये। प्रचलन त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का ही है। यह आचार्य
पर निर्भर करता है कि, होम के अनुसार अग्निचक्रों का निर्माण करे। कुण्ड
और स्थण्डिल के आकार-प्रकार पर भी यह निर्भर करता है।
त्रिकोण के मध्य में अग्नि देवता की नौ पीठशक्तियों की स्थापना और
पूजा करनी चाहिये। उनके नाम क्रमशः हैं—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा,
धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा और ज्वालिनी। तत्पश्चात् उसी त्रिकोण में
तमस्, रजस्, सत्त्व, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की इनके
आदि अक्षरों का बिन्दुयुक्त बीज बनाकर इनके चतुर्थ्यन्त रूप के साथ मन्त्रात्मक
उच्चारण कर पूजा करनी चाहिये। जैसे—
१. तं तमसे नमः अभ्यर्चयामि तर्पयामि नमः।
२. रं रजसे नमः, ३. सं सत्त्वाय नमः, ४. आम् आत्मने नमः, ५. अं
अन्तरात्मने नमः, ६. पं परमात्मने नमः। ७. ज्ञानात्मा के पहले ह्रीं बीजमन्त्र
लगाते हैं। जैसे—ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इन सरल मन्त्रों से ही इन पीठशक्तियों
की पूजा सम्पन्न होती है॥७॥
एवं पीठशक्तिपूजामुक्त्वा ततोऽग्निप्रतिष्ठामुपदिशति
ततो जनयिष्यमाणवह्नेः पितरौ वागीश्वरीवागीश्वरौ पीठेऽभ्यर्च्य
तयोर्मिथुनीभावं भावयित्वा ‘ह्रीं वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः’ इति
ध्यात्वा॥८॥
पीठे त्रिकोणात्मके अभ्यर्चितदेवताविशिष्टे तयोर्वागीश्वरीवागीश्वरयो-
र्मिथुनीभावं मैथुनकर्म मनसा भावयित्वा। ध्यात्वेति ध्यानं कामेश्वरीकामेश्वरवत्
तदभिन्नत्वात्॥८॥
इसी त्रिकोणात्मक पीठ में, जिसमें पहले अग्नि-शक्तियों और शक्तिमन्तों
की पूजा की जा चुकी है, उसी में अग्नि की प्रतिष्ठा करनी होती है। अग्नि

होमविधि: २१७
अभी उत्पन्न नहीं किया गया है। परशुरामकल्पसूत्र के अनुसार अग्नि के माता-
पिता वागीश्वरी और वागीश्वर माने जाते हैं। इन दोनों का मैथुनभाव सम्पन्न होने
पर अग्नि का जन्म स्वाभाविक माना जा सकता है। अतः इनके इसी भाव का
मन ही मन भावन करना चाहिये। इसके पहले उसी पीठ में इन दोनों की पूजा
भी कर लेनी चाहिये। मनसा भावन करने के बाद इनसे सम्बद्ध 'ह्रीं
वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः' इस मन्त्र को बोलते हुए दोनों का ध्यान करना
चाहिये।।८।।
संविदग्निपातनम्
अरणेः सूर्यकान्ताद् द्विजगृहाद्वा वह्निमुत्पाद्य मृत्पात्रे ताम्रपात्रे
वा आग्नेय्यामैशान्यां नैर्ऋत्यां वा निधाय, अग्निशकलं क्रव्यादांशं
नैर्ऋत्यां विसार्य निरीक्षणप्रोक्षणताडनावकुण्ठनादिभिर्विशोध्य ॐ
वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय स्वाहा इति
मूलाधारोद्गतं संविदं ललाटनेत्रद्वारा निर्गमय्य तं बाह्याग्नियुक्तं
पातयेत् ।।९।।
अरणिः प्रसिद्धः। द्विजगृहेभ्यः पचनाग्निस्तस्यानयनमेव तदुत्पादनम्।
पात्रनियममाह—मृत्पात्र इति। स्थापनदेशनियममाह—आग्नेय्यामिति।
क्रव्यादांशं अमेध्यांशम् इत्यर्थः, 'य एतान् क्रव्यात् तमपहृत्य मध्येऽग्नौ
कपालमुपदधाति' इति श्रुतेः। विसार्य बहिर्निरस्य। निरीक्षणं स्वनेत्राभ्याम्।
प्रोक्षणं सामान्यार्घ्योदकेन। ताडनम् अभिघाताख्यः संयोगविशेषः। अवकुण्ठनं
पूर्वदर्शितमुद्रा। आदिपदेन धेनुयोनी। स्थलान्तरे अवकुण्ठनसहपाठात्। एतै-
र्विशोध्य संस्कृत्य। तस्मिन् पात्रे चिदग्न्यावाहनप्रकारमाह—ॐ वैश्वानरेति।
ललाटनेत्रद्वारा भ्रूमध्यद्वारा। निर्गमय्य निर्गमनं विभाव्य। तं चिदग्निं बाह्या-
ग्नियुक्तम्। इत्यनेन चिदग्नेः प्राधान्यं सूचितम्, भृत्ययुक्तराजेतिवत्। पातयेद्
इत्यस्मात् पूर्वं पूर्वनिर्मिताग्निचक्रे इति शेषः।।९।।
वागीश्वरी और वागीश्वर की कृपा से ही अग्नि अरणि से उत्पन्न होता
है। अरणि न हो तो सूर्यकान्त मणि से अग्नि उत्पन्न करना चाहिये। यह

२१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भी सम्भव न हो, तो ब्राह्मण के घर से अग्नि ले आना चाहिये। अग्नि
को मृत्पात्र अथवा ताम्रपात्र में लाना चाहिये। अग्नि लाकर अग्नि, ईशान
या नैऋत्य में रखना चाहिये। उसमें से श्रुति-परम्परानुसार अमेध्य अंश को
क्रव्याद कोण में फेंककर कुण्ड में रखने के पहले उसका निरीक्षण, प्रोक्षण,
ताडन, अवकुण्ठन तथा धेनु और योनि मुद्रा विधियों से उसका विशोधन
भी कर लेना चाहिये।
तत्पश्चात् 'ॐ वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय
स्वाहा' इस मन्त्र से मूलाधार चक्र से उद्गत संवित् रूप चिदग्नि को भ्रूमध्यनेत्र
द्वारा निकाल कर उस बाह्य अग्नि में मिलाकर कुण्ड में उसका संपात करना
चाहिये।।९।।
इन्धनैराच्छादनम्
कवचमन्त्रेण इन्धनैराच्छाद्य ।।१०।।
कवचमन्त्रेण 'हुं' इत्यनेन।।१०।।
कवचमन्त्रेण इस तृतीयान्त प्रयोग से यह प्रतीत होता है कि, इस बीज
मन्त्र में आच्छादन के साधकतमत्व की व्याप्ति है। इसके द्वारा आच्छादित होना
एक रहस्यभरा आध्यात्मिक प्रयोग है।।१०।।
अथोपस्थानमाह
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
सुवर्णवर्णमनिलं समिद्धं विश्वतोमुखम्।। इत्युपस्थाय ।।११।।
उपस्थानं नाम अग्नेरपरभागे कृताञ्जलेस्तिष्ठतो मन्त्रपाठः ।।११।।
'मैं प्रज्वलित अग्नि की वन्दना कर रहा हूँ। अग्नि जातवेद (जातवेदस्)
है। यह ज्ञानरूप है। यह हुताशन है। दी हुई आहुतियों का प्राशन कर देवताओं
तक पहुँचाता है। यह सोने के समान सुन्दर है। इसे अनल कहते हैं। अच्छी
तरह प्रज्वलित है और चारों ओर से इन्धन को ग्रास बनाकर आत्मसात् करता
है।' इस श्लोकरूप मन्त्र से इस तरह प्रार्थना करते हुए उसके पास अञ्जलिबद्ध
बैठने की मुद्रा का नाम ही उपस्थान है।।११।।

अष्टम से दशम खण्ड: होम, प्रायश्चित्त, कौल-धर्म एवं कल्पसूत्र उपसंहार

होमविधिः २१९
भूमौ मृण्मयपात्रे पूर्वम्, आग्नेयान्यतमदिक्षु स्थापिताग्नेः कुण्डे
प्रक्षेपार्थम् उत्थापने मन्त्रमाह—
'उत्तिष्ठ हरितपिङ्गल लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय मे देहि
दापय स्वाहा' इति वह्निमुत्थाप्य ।।१२।।
एतेन ॐ वैश्वानरेति, बहिर्निर्गमय्य कुण्डे प्रक्षेपात् प्राग् अर्थक्रमेण
पाठक्रमं बाधित्वा प्रयोगानुष्ठानकाले पाठः, उत्थापनस्य प्रक्षेपपूर्व-
कालिकत्वात्।।१२।।
यह मन्त्र अग्नि के उत्थापन का है। उत्थापन वह क्रिया है, जो प्रक्षेप
के पहले सम्पन्न होती है। शास्त्र में एक नीति ऐसे अवसरों पर अपनायी जाती
है। वह है—'पाठक्रमेण अर्थक्रमो बलीयान्'। इसलिये इस मन्त्र से अग्नि को
उठाकर ॐ वैश्वानर (सूत्र-९) इस मन्त्र से प्रक्षेप करना उचित है। मन्त्र का
अर्थ स्पष्ट है।।१२।।
प्रज्वालनमन्त्रमाह
चित्पिङ्गल हन हन दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा इति
प्रज्वाल्य ।।१३।।
प्रज्वालनं वेणुधमन्या 'मुखेनाग्निं नोपधमेत्' इति श्रुतेः।।१३।।
बाँस की धमनी (फोंफी) अर्थात् पतले बाँस की एक पर्वमयी या गाँठों
के भीतर छेद कर २-३ पर्वमयी भी बनायी जाती है। उसी से आग को प्रज्वलित
किया जाता है। श्रुति कहती है कि, अग्नि को मुह से नहीं फूँकना चाहिये।
इसी परम्परा के अनुसार आग को धमनी से प्रज्वलित करना उचित है। मन्त्रार्थ
स्पष्ट है।।१२।।
उत्पन्नाग्नेः संस्कारानाह
षट्‌तारवाचो नमोमन्त्रेण पुंसवनसीमन्तजातकर्मनामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनगोदानविवाहकर्माण्यमुकाग्नेरमुककर्म कल्पयामि
नम इति विधाय ।।१४।।

२२० परशुरामकल्पसूत्रम्
षट्‌तारवाच उक्ताः। नमोमन्त्रेण नमोऽन्तमन्त्रेण। स्वयमेव नमोऽन्तमन्त्रं
विवृणोति—अमुकेत्यादिना। इत्थं च प्रथमं षट्‌तारी तत ऐं, तत
इष्टदेवतानाम, ततोऽग्निशब्दः, षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम, ततोऽग्निशब्दः
षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम द्वितीयान्तं, ततः कल्पयामीति।।९४।।
कुण्ड में प्रज्वलित अग्नि का संस्कार भी आवश्यक होता है। सूत्र में
पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, उपनयन, गोदान और
विवाह का सनामग्रहण उल्लेख है। इन संस्कारों के लिये मन्त्र का प्रयोग करना
आवश्यक है। सूत्रकार मन्त्र का निर्देश भी कर रहे हैं। उनके अनुसार सर्वप्रथम
षट्‌तारी का प्रयोग करना चाहिये। षट्‌तारी में त्रितारी और कुमारी दोनों आते
हैं। कई अवसरों पर इनके प्रयोग किये गये हैं। वस्तुतः त्रितारी में 'ऐं ह्रीं श्रीं'
ये बीजत्रितय आते हैं। इसी तरह कुमारी में 'ऐं क्लीं सौः' ये तीन बीज आते
हैं। इन दोनों को मिलाकर षट्‌तारी बीज मन्त्र बनते हैं। पहले षट्‌तारी इसके
बाद वाग्भव बीज 'ऐं' और इसके बाद अग्नि में षष्ठी विभक्ति लगाकर पुंसवन
आदि संस्कारों के नाम लेने चाहिये। उसके बाद 'कर्म कल्पयामि नमः' बोलकर
संस्कार सम्पन्न करना चाहिये। इस तरह 'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं हुताशनस्य
पुंसवनकर्म कल्पयामि नमः' यह मन्त्र बनता है। इसी क्रम में सभी संस्कारों
के मन्त्र बनते हैं। इनसे अग्नि का संस्कार होता है।।९४।।
परिषेचनादि
परिषिच्य परिस्तीर्य परिधाय ।।९५।।
परिषिच्य अनुक्तत्वादीशानीमारभ्य प्रदक्षिणं समन्तात् सामान्या-
र्घ्योदकेन। परिस्तीर्य परिस्तरणे एकैकदिशि चत्वारो दर्भाः, 'अग्निं
षोडशभिर्दर्भैः परितस्तु परिस्तरेत्' इति वचनात्। परिधाय श्रौतोक्तधर्मक-
समिद्भिः प्राग्वर्जं त्रिषु। क्रमादिकं काष्ठनियमः श्रौतात् ज्ञेयः।।९५।।
सूत्रकार ने परिषेचन, परिस्तरण और परिधान रूप तीन कार्यों का निर्देश
दिया है। इसमें विधि अनुक्त है। अतः गुरुपरम्परा के ही अनुसार ये तीनों कार्य
सम्पन्न करने चाहिये—
१. परिषेचन—ईशानकोण से सामान्य अर्घ्यजल से करना उचित है। इसमें
प्रदक्षिण क्रम अपनाने का निर्देश वृत्तिकार ने दिया है।

होमविधिः २२१
२. परिस्तरण—श्रुति का वचन है कि, चारों ओर मिलकर १६ दर्भों से अग्नि
का परिस्तरण होना चाहिये। इसलिये चार-चार दर्भ चारों ओर परिस्तृत
करना चाहिये। इसके बाद पूजा की जानी चाहिये।
३. परिधाय—इस प्रक्रिया में स्रुक्, स्रुवा इत्यादि का रखना, स्थाली आदि
की प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये। साथ ही कुण्ड में समिधाओं की किस
प्रकार व्यवस्था हो, इसको ध्यान में रखना चाहिये। यज्ञ में ये विधियाँ
प्रचलित हैं ॥१९५॥
साधिताग्नेर्ध्यानम्
त्रिनयनमरुणाभं बद्धमौलिं सुशुक्लां
शुकमरुणमनेकाकल्पमम्भोजसंस्थम् ।।
अभिमतवरशक्तिस्वस्तिकाभीतिहस्तं
नमत कनकमालालङ्कृतांसं कृशानुम् ।।
इति ध्यात्वा ।।१९६।।
यह अग्नि के ध्यान का मन्त्रात्मक श्लोक स्वयं ग्रन्थकार की स्वोपज्ञ
रचना है। इससे अग्नि का ध्यान करना चाहिये। इसका अर्थ इस प्रकार है—
तीन नेत्रों वाले, ताम्रवर्णी, बद्धमौलि, शुक्ल अंशुकधारी, सुन्दर, अरुण कमल
में अवस्थित, अभीष्टवरमुद्रा, शक्ति, स्वस्तिक और अभय मुद्रा में विराजमान
स्कन्ध पर शोभमान स्वर्णहार समन्वित हुताशन अग्निदेव को सभी प्रणति
निवेदन करें।।१९६।।
पूर्वकल्पिताग्निचक्राष्टकोणादिषु देवतास्थापनमाह
अष्टकोणे जातवेदसे सप्तजिह्वाय, हव्यवाहाय अश्वोदराय
वैश्वानराय कौमारतेजसे विश्वमुखाय देवमुखाय नमः, इति षट्कोणे
षडङ्गं, त्रिकोणे अग्निमन्त्रेण अग्निं पूजयित्वा ।।१९७।।
अष्टकोणे अनुक्तत्वात् प्रागादिप्रादक्षिण्यक्रमः। षट्कोणेऽपि तथैव।
अग्निमन्त्रेण 'अग्निं प्रज्वलितम्' इत्युपस्थापनमन्त्रेण, अग्निलिङ्गस्य
स्पष्टत्वात्। पूजने च पञ्चोपचारैर्मन्त्रावृत्त्या ज्ञेयम् ।।१९७।।

२२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
आठ कोणों में कहाँ किसकी पूजा की जाय, इसका स्पष्ट निर्देश नहीं
है। अतः परम्परा के अनुसार आचरण करना चाहिये। पूरब से अग्नि होते हुए
ईशान तक के क्रमिक कोणों में पूजा का प्रचलन है। षट्कोण में भी यही क्रम
अपनाना चाहिये। इसमें षडङ्ग पूजन करना होता है। त्रिकोण में अग्नि मन्त्र से
पूजा की जाती है। पूजन में पञ्चोपचार विधि अपनायी जाती है।।१७।।
सप्तजिह्वाहुतीराह
हिरण्यायै, कनकायै, रक्तायै, कृष्णायै, सुप्रभायै, अतिरक्तायै,
बहुरूपायै नम इत्यग्नेः सप्तजिह्वासु मूलशुद्धेनाज्येन सप्ताहुतीः
कुर्यात् ।।१८।।
नम इति सर्वत्रानुषज्यते। मूलशुद्धेन मूलाभिमन्त्रणेन संस्कृतेन।
अभिमन्त्रणं संख्यानुक्तेः सकृन्मूलेन। नमःपदोत्तरं स्वाहायोगः, होमरूप-त्वात्।
'स्वाहा होमे तर्पणे तु तर्पयामीति योजयेत'। इति योगिनीतन्त्र-
वचनात् ।।१८।।
अग्नि की सात जिह्वायें प्रसिद्ध हैं। इनके नाम क्रमशः हिरण्या, कनका,
रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता, बहुरूपा हैं। इन सातों जिह्वाओं में मूलमन्त्र
से अभिमन्त्रित आज्य (शुद्ध घी) से सात आहुतियाँ दी जानी चाहिये।
आहुति देते समय सूत्र में लिखित नमः शब्द के बाद 'स्वाहा' अवश्य
जोड़ना चाहिये। एक नियम है कि, होम में स्वाहा और तर्पण में तर्पयामि क्रिया
का योग करना चाहिये। यह योगिनीतन्त्र का निर्देश है।।१८।।
कर्मशेषमुपदिशति सूत्रान्तरेण
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरग्नेस्त्रिधाहुतिं विधाय ।।१९।।
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरिति पूर्वपठितैस्त्रिभिर्मन्त्रैरित्यर्थः। त्रिधात्रिवारम्।
अनेन कर्माभ्यासः, नाहुतिभेदः। वैश्वानरादिमन्त्रत्रये स्वाहाकारोऽस्ति।
तथाप्यन्यस्वाहाकारो होमकाले योज्यः। तदुक्तं शक्तिसङ्गमतन्त्रे—"मन्त्रान्ते या
वह्निजात्या सा तु मन्त्रस्वरूपिणी। तदन्ते प्रत्युञ्जीत सा होमाङ्गतया
मता"।।१९।।

होमविधिः २२३
इसी खण्ड के ९-१२ और १३वें सूत्रों में पठित तीन मन्त्रों से तीन
बार आहुति देनी चाहिये। त्रिधा का तात्पर्य भेदमयी आहुति नहीं, अपि तु
आहुतिरूप कर्म का अभ्यास मात्र है। एक विशेष तथ्य की ओर वृत्तिकार ने
ध्यान आकृष्ट किया है। वह यह कि, उक्त तीनों मन्त्र स्वाहान्त मन्त्र हैं। शक्ति-
संगम-तन्त्र कहता है कि, मन्त्रोक्त स्वाहा शब्द मन्त्र के अङ्ग हैं। आहुति करते
समय स्वाहा पृथक् प्रयोग भी आहुति के अङ्गरूप में उचित है॥१९॥
अथ इष्टदेवतावाहनमाह
बहुरूपजिह्वायामिष्टां देवतामावाह्य पञ्चोपचारैरुपचर्य ॥२०॥
आवाहनं पूजाप्रकरणोक्तसरण्या। पञ्चोपचारैर्गन्धादिभिः ॥२०॥
वस्तुतः जहाँ तक पाँच उपचारों का प्रश्न है— ये गन्ध, पुष्प, धूप,
दीप, नैवेद्य में ही चरितार्थ हो जाते हैं॥२०॥
चक्रदेवीनामाहुतयः
सर्वासां चक्रदेवीनामेकाहुतिं हुत्वा, नमोऽन्तान् पादुकान्तान्
शेषान् मन्त्रान् स्वाहान्तान् विधाय जुहुयात्॥२१॥
सर्वासामिति तत्तदावरणदेवताषडङ्गौघत्रयनित्याऽऽदीनां मध्ये यस्मिन्
पूजाप्रकरणे यावत्यो विहितास्तासां सर्वासामित्यर्थः। द्रव्यानुक्तत्वाद् आज्यम्।
नमोन्तान् इति ये च नमोऽन्ता बाणमन्त्रा वशिन्यादिमन्त्राश्च पादु-कान्ता मन्त्रा
गुरुपादुकामन्त्रादयः, एतदुभयभिन्नाः केवलं नाम्नैवोद्धृताः। अणिमासिद्ध्यादयः
शेषाः, एतान् सर्वान् स्वाहान्तान् कृत्वा तेन होतव्य-मित्यर्थः। श्रीक्रमे
पञ्चदशनित्यानन्तरं सर्वरोगहरचक्रे कामेश्वर्याद्यनन्तरं मूलेन पूजनवन्न होमः।
तेन तस्याः प्रधानदेवतारूपत्वेन तस्या आहुतेर्वक्ष्यमाणत्वात् ॥२१॥
सभी चक्र-देवियों के लिये (सप्तमसूत्रोक्त) एक-एक आहुति देने का
निर्देश सूत्रकार दे रहे हैं। पुनः नमः अन्त वाले बाणमन्त्र और पादुकान्त
शेष मन्त्रों के साथ स्वाहा लगाकर हवन करना चाहिये। ये दो प्रकार के
भेदयुक्त मन्त्र यहाँ निर्दिष्ट हैं। इन्हीं मन्त्रों से स्वाहान्त बनाकर हवन करना
चाहिये॥२१॥

२२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवमग्निसंस्कारानुक्त्वा प्रधानहोमधर्मानुपदिशति
अथ प्रधानदेवतायै दशाहुतीर्जुहुयात् ॥२२॥
अथेत्यनेन अङ्गदेवताहोमविच्छेदः सूचितः। एतावत्पर्यन्तं सर्वप्रयोग-
साधारणम्। पुरश्चरणाङ्गहोमः काम्यहोमो वा सर्वोऽप्येतदुत्तरं भवति ॥२२॥
अथ अव्यय का प्रयोग पूर्ववर्ण्य के विच्छेद और नव वर्णनीय के आरम्भ
का सूचक है। इस सूत्र में अङ्गदेवताओं से सम्बद्ध होम की समाप्ति की सूचना
और प्रधान देवता को दश आहुति देने का निर्देश है। पुरश्चरणाङ्ग होम या काम्य
होम इसके बाद ही होते हैं॥२२॥
काम्यहोमविधिः
यदि काम्यमीप्सेदभीष्टदेवतायै विज्ञाप्य सङ्कल्पं कृत्वैतावत्कर्म-
सिद्ध्यर्थमेतावदाहुतीः करिष्यामीति ॥२३॥
विज्ञाप्य प्रार्थ्य, एतावत्कार्यसिद्ध्यर्थम् अमुकफलसिद्ध्यर्थम् एता-
वत्कर्मामुकसंख्याकाहुतीः, कार्यतारतम्येन आहुतिसंख्यातारतम्यं ज्ञेयम्॥२३॥
काम्य कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होने पर इसकी सूचना इष्टदेवता को
देनी चाहिये। बिना प्रार्थना के काम्यकर्म नहीं करना चाहिये। आज्ञा लेकर
सर्वप्रथम संकल्प करना उचित है। काम्यकर्मों में फलाकांक्षा स्वाभाविक है।
फलानुसार आहुति की संख्या का निर्धारण करना पड़ता है। इस तारतम्य के
अनुसार काम्यकर्म करे॥२३॥
ससाधनं होमं विधत्ते
तिलाज्यैः शान्त्या, अन्नेनान्नायामृताय, समिच्चूतपल्ल-
वैर्ज्वरशमाय, दूर्वाभिरायुषे, कृतमालैर्धनाय, उत्पलैर्भोगाय,
बिल्वदलैराज्याय, पद्मैः साम्राज्याय, शुद्धलाजैः कन्यायै, नन्द्यावर्त्तैः
कवित्वाय, वञ्जुलैः पुष्ट्यै, मल्लिकाजातीपुन्नागैर्भाग्याय, बन्धूक-
जपाकिंशुकबकुलमधुकैरैश्वर्याय, लवणैराकर्षणाय, कदम्बैः
सर्ववश्याय, शालितण्डुलैर्धान्याय, कुङ्कुमगोरोचनादिसुगन्धैः
सौभाग्याय, पलाशपुष्पैः कपिलाघृतैर्वा तेजसे, धत्तूर-

होमविधिः २२५
कुसुमैरुन्मादाय, विषवृक्षैर्निम्बश्लेष्मातकविभीतकसमिद्भिः
शत्रुनाशाय, निम्बतैलाक्तलवणैर्मरणाय, काकोलूकपक्षैर्विद्वेषणाय,
तिलतैलाक्तमरीचैः कासश्वासनाशाय जुहुयात्।।२४।
तिलाज्यैस्तिलसहिताज्यैः। यावत्संख्याज्याहुतयस्तावत्संख्याक-
तिलाहुतयः कार्या इति निष्कर्षः। शान्त्यै शान्तिर्नाम उत्पत्स्यमानानिष्ट-
प्राग्भावसंरक्षणम्। समिधश्च यज्ञीयवृक्षसम्बन्धिन्यो ग्राह्याः। दूर्वाः प्रसिद्धाः।
कृतमालैः आरेवतैः। 'आरेवतव्याधिघातकृतमालसुपर्णकाः' इत्यमरः।
शुद्धलाजैः शुद्धत्वं गृहे निर्मितत्वम्। वञ्जुलैः चित्रकृद्भिः, 'वञ्जुलश्चित्रकृत्तवाथ'
इत्यमरः। बन्धूकः किंशुकः पलाशः। मधुकैरिति योगेन मधुपुष्पाणां ग्रहणम्।
श्लेष्मातकः शेलुः। विभीतकः अक्षः। विषवृक्षसमिधो निम्बादिसमिद्भिः सह
विकल्प्यन्ते। शत्रुनाशकर्मणि द्वयोः तुल्यसाधनत्वम्। विद्वेषः स्वशत्रोर्यः
प्रबलाश्रयभूतस्तेन साकम्।।२४।।
काम्य होम का निर्देश यह सूत्र करता है। इसमें उत्तम, मध्यम और नीच
सभी काम्य कर्म गिनाये गये हैं। साधना की दृष्टि से ये सभी हेय हैं। मात्र
उपासना से सभी सिद्धियाँ समुपलब्ध हो सकती हैं; किन्तु सामान्य जन इनका
भी प्रयोग करते हैं। ये सभी प्रयोग ऐसे ही लोगों के लिये हैं। जैसे—
क्रमसंख्या अभीष्ट काम्यकर्म हवनयोग्य समिधाप्रकार
१. शान्ति तिल और आज्य
२. अमृत अन्न अन्न
३. ज्वरनाश चूतपल्लव
४. आयुष्य दूर्वा
५. धन कृतमाल
६. भोग उत्पल
७. राज्यप्राप्ति बिल्वपत्र
८. साम्राज्य-रक्षा पद्म (रक्तकमल)
९. कन्याप्राप्ति शुद्ध लावा

२२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
१०. कवित्व नन्द्यावर्त्त (तगर)
११. पुष्टि वञ्जुल (अशोक)
१२. भाग्य मल्लिका, चमेली, पुन्नाग
१३. ऐश्वर्य बन्धूक, जपा, किंशुक, बकुल और
मधूक (महुवा)
१४. आकर्षण लवण
१५. सर्ववशीकरण कदम्बपुष्प
१६. धान्यवृद्धि शालितण्डुल
१७. सौभाग्य-संवर्धन कुङ्कुम-गोरोचन
१८. तेजोवृद्धि पलाशपुष्प अथवा कपिला घी
१९. उन्माद धतूर का फूल
२०. शत्रुनाश विषवृक्ष, नीम, श्लेष्मातक (बहुआर),
विभीतक (भिलावा)
२१. मारण नीमतेल में सने नमक
२२. विद्वेषण काक और उलूक पक्ष
२३. कासश्वासनाश तिलतेल में सने मरिच (काली मिर्च)
इन त्रयोविंश काम्य पूर्ति के लिये सामने दिये गये पुष्प या समिधाओं
से हवन करना चाहिये॥२४॥
अथोत्तराङ्गमाह (बलिदानम्)
बलिं प्रदाय॥२५॥
बलिदानं तत्तत्पूजाक्रमोक्तविधिना॥२५॥
विशिष्ट-विशिष्ट पूजा के अन्त में विविध प्रकार के बलि विधान शास्त्रों
में वर्णित हैं। उन्हीं के अनुसार यहाँ भी बलि करनी चाहिये॥२५॥
महाव्याहृतिहोममाह
१. ॐ भूरग्नये च पृथिव्यै च महते च स्वाहा।

होमविधिः २२७
२. ॐ भुवो वायवे चान्तरिक्षाय च महते च स्वाहा।
३. ॐ सुवरादित्याय च दिवे च महते च स्वाहा।
४. ॐ भूर्भुवस्सुवश्चन्द्रमसे च नक्षत्रेभ्यश्च दिग्भ्यश्च महते च
स्वाहा। इति चतुर्भिर्मन्त्रैर्महाव्याहृतिहोमं कृत्वा।।२६।।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः (सुवः) (ॐभूर्भुवस्सुवः) इनको
महाव्याहृतियाँ कहते हैं। ये तीन होती हैं। इनसे सूत्रानुसार हवन करना
चाहिये।।२६।।
ब्रह्मार्पणाहूतिमाह
इतः पूर्वं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नावस्थासु
मनसा, वाचा, कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना यत् स्मृतं,
यदुक्तं, यत्कृतं तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा इति ब्रह्मार्पणाहूतिं
कृत्वा।।२७।।
प्राण, बुद्धि और देह इन तीनों से अणु पुरुष बद्ध है। इसमें जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं का प्रभाव पड़ता है। इससे प्रभावित
पुरुष मन, वाणी और कर्म के संस्कार ग्रहण करता है। मन से स्मरण करता
है। वाणी से बोलता है और तदनुसार हाथ, पैर, उदर, शिश्न इन चारों से
काम करता है। निष्काम भाव से इनका समर्पण ब्रह्म में होना ही चाहिये।
ब्रह्मार्पण सर्वश्रेयस्कर कार्य माना जाता है। अन्त में यह करना ही
चाहिये।।२७।।
अग्निदेवतयोरुद्वासनमाह
चिदग्निं देवतां चात्मन्युद्वासयामि नम इत्युद्वास्य ।।२८।।
उद्वासनं खेचरीमुद्रया।।२८।।
पहले आवाहित चिदग्नि और आवाहित देवता का उद्वासन कर
देना चाहिये। उद्वासन की यह प्रक्रिया खेचरी मुद्रा द्वारा सम्पन्न होती
है।।२८।।

२२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भस्मधारणादिकमाह
तद्भस्मतिलकधरो लोकसम्मोहनकरः सुखी विहरेत्। इति
शिवम्॥२९॥
तद्भस्म अग्नेर्भस्म। अग्निविसर्जनानन्तरं परिस्तरणपरिधीना-मपि
विसर्गः। प्रतिपत्तिसंस्कारस्यानुक्तत्वात्। शिवमिति व्याख्यातम्॥२९॥
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ
सौभाग्योदयनाम्यां (मुख्यांशमात्रायां) होमविधिर्नाम
नवमः खण्डः सम्पूर्णः॥९॥
भस्म धारण एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसमें सभी पाप भस्मसात् हो जाते
हैं। लोग उसे देखकर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार विश्वविहार सिद्ध हो जाता
है॥२९॥
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का होमविधि नामक नवम खण्ड परिपूर्ण ॥९॥
।। शुभं भूयात्।।

सर्वसाधारणक्रमः
[ दशमः खण्डः ]
अथ सामान्यकर्माधिकारः
प्रथमखण्डे दीक्षानन्तरं सर्वमन्त्राधिकारी भवतीत्युक्तत्वात्
श्रीत्रिपुरसुन्दर्युपास्तेर्निष्कामरूपतया यदा सङ्कटे कामनावशात्
सूर्यविष्णुभैरवाद्युपास्तिप्रसक्तिस्तदितिकर्त्तव्यताज्ञानार्थं तन्त्रान्त-
रोपास्तिं सूत्रानुयायी मा करोतु, इति तदुपासनासिद्धये किञ्च
रश्मिमालादिषु प्रत्येकं मन्त्राणां फलश्रवणात् तत्तत्कामनया
तत्तदुपास्तिप्रसक्तौ, अपि च कश्चन उपासनायां श्रद्धावान् ललितो-
पास्तौ च अनधिकारी तस्य शिवविष्ण्वाद्युपासनां प्रवर्त्तयतु इति
परमकृपालुः श्रीपरशुरामः सर्वसाधारणीम् उपासनासरणिं दर्शयति।
अथातः सर्वेषां मन्त्राणां सामान्यपद्धतिं व्याख्यास्यामः॥१॥
अथ त्रिपुरसुन्दर्युपास्तिप्रकारदर्शनानन्तरम्। अतोऽवतरणि-
कायामुक्तहेतोः। सर्वेषां गणपतिललिताश्यामावार्त्तालीभिन्नानां यावतां मन्त्राणाम्।
सामान्यपद्धतिं साधारणसरणिम्॥१॥
अथ अव्यय त्रिपुरसुन्दरी की उपासना के बाद के क्रम का निर्देशक है।
इस सूत्र में सर्वसाधारण-क्रम विषयक उपासना की व्याख्या की प्रतिज्ञा कर रहे
हैं। वास्तव में दीक्षा के बाद सभी मन्त्रों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। यह
भी निश्चित तथ्य है कि, माँ की उपासना निष्काम रूप होती है। ऐसी प्रवृत्ति
काम्य कर्म की ओर ही यदि झुकने लगे, तो उस दशा में साधक क्या करे?
संमर्शी सूत्रकार इसी का संविधान इस खण्ड में दे रहे हैं। इसीलिये इस खण्ड

२३० परशुरामकल्पसूत्रम्
का नाम ही सर्वसाधारण-क्रम रखा गया है। इसमें गणपति, ललिता, श्यामा,
वार्त्ताली मन्त्रों के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण किया गया है॥१॥
अथ श्यामाक्रमे पठितानि कानिचिदङ्गानि अतिदिशति वचनेन
श्यामावत् सन्ध्याद्यर्घ्यशोधनपर्यन्तं न्यासवर्जम् ॥२॥
सन्ध्यादीत्यनेन सन्ध्यातः प्राक् पठितानां व्यावृत्तिः। अर्घ्यशोधन-
पर्यन्तम् इत्यनेन तदग्रिमव्यावृत्तिः। उभयमध्यतनानां मध्ये न्यासवर्जम् इत्यनेन
तद्व्यावृत्तिः। अर्घ्यशोधनम् इत्यविशेषोक्त्या विशेषार्घ्यशोधनान्तं कार्यम्। तेन
ब्राह्मे मुहूर्त्ते यत्कृत्यं स्नानदन्तधावनविंशतिगण्डूषादि सर्वं निवर्त्तते॥२॥
सन्ध्या से लेकर अर्घ्यशोधन पर्यन्त सारे कार्य श्यामा की तरह किये
जाने चाहिये। सूत्रकार ने इसके बीच में आये न्यास का वर्जन कहकर मध्य
के अन्य कार्य ही करणीय हैं, ऐसा इङ्गित किया है॥२॥
सर्वसाधारणन्यासमाह
अनुक्तषडङ्गस्य षड्जातियुक्तमायया षडङ्गम्॥३॥
अनुक्तेत्यनेन अज्ञातमप्युपलक्षणीयम्। इत्थं च यस्य मन्त्रस्य
षडङ्गमुक्तम्, तेन स्वषडङ्गे श्यामाक्रमे न्याससमये न्यसेत्। यस्यानुक्तमज्ञातं वा
तत्र षड्जातियुक्तमायया षडङ्गन्यासः। षड्जातिमाया च 'हां हीं हूं हैं हौं हः'
इति क्रमेण षडङ्गेषु योज्यम्॥३॥
वृत्तिकार के अनुसार अनुक्त शब्द से अज्ञात अर्थ भी लगाना चाहिये।
इस प्रकार जिस मन्त्र का षडङ्ग कहा गया है, उस स्थान पर श्यामा क्रम
में अपने ६ अङ्गों पर न्यास करना चाहिये। जिसका षडङ्ग अनुक्त या अज्ञात
हो वहाँ षड्जातियुक्त माया (हां हीं हूं हैं हौं हः) से न्यास करना
चाहिये॥३॥
चक्रनिर्माणमाह
बिन्दुत्रिषडरनागदलचतुष्पत्रचतुरस्रमयं चक्रम्॥४॥
अष्टदलं चतुर्दलं, पद्मद्वयं शेषं स्पष्टम्॥४॥