परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पराक्रमः २०५
'भृगु' शब्द 'स'वर्ण का द्योतक है। इसी तरह वर्ण सन्दर्भ में प्रयुक्त
'चतुर्दश' संख्या चौदहवें स्वर 'औ'कार की द्योतक है। 'षोडश' संख्या से
सोलहवें वर्ण विसर्ग का बोध होता है। तीनों मिलकर पराबीज 'सौः' का सङ्केत
करते हैं। स का हृदय में, औ का शिर पर, विसर्ग का शिखा में, पुनः स
का कवच में, औ का नेत्रत्रय में और विसर्ग का अस्त्र मन्त्र में प्रयोग करने
पर दो आवृत्ति हो जाती है। यह वर्ण षडङ्गन्यास माना जाता है। इसके उपरान्त
पूरे मूल से अर्थात् पराबीज से छः आवृत्ति होने पर मन्त्रषडङ्ग न्यास पूरा होता
है। इस तरह मन्त्र के वर्ण-वर्ण में जिस दिव्यता का शाश्वत उल्लास होता है,
उसे उपासक अपने शरीर में धारण कर दिव्यातिदिव्य हो जाता है॥१४॥
न्यस्तानां षडङ्गदेवीनां पूजामाह
उभाभ्यामर्चयित्वा ।।१५।।
मूलवर्णमूलाभ्यामित्यर्थः ।।१५।।
न्यस्त षडङ्ग देवियों का भावन कर पुनः मूल के वर्णों से और पुनः
मूल के साथ-साथ षडङ्ग देवियों का स्मरण करते हुए, पूर्ववत् न्यास का निर्देश
इस सूत्र में दिया गया है॥१५॥
अथ सुधादेवीपूजामाह
मूलमुच्चार्य तां चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशित-
हस्तद्वयां प्रसन्नां देवीं पूजयामि नमः स्वाहा इति सुधादेवीमभ्यर्च्य
तया सम्प्रोक्ष्य वरिवस्यावस्तूनि।।१६।।
मूलमुच्चार्येति। तया सुधादेव्या। वरिवस्यावस्तूनि पूजाद्रव्याणि।।१६।।
सुधा देवी की पूजा का निर्देश इस सूत्र में है। मूल का उच्चारण कर
श्रद्धा के चरम स्तरीय आवेश से आविष्ट होकर मूलवर्ण का उच्चारण कर सुधा
देवी का ध्यान करना चाहिये। यह ध्यानात्मक स्मरण बड़ा ही आकर्षक है। देवी
चिन्मयी है। वह आनन्दमयी है। प्रकाश और स्वातन्त्र्य ही चित् और आनन्द
माने जाते हैं। ऐसी प्रकाशानन्दमयी प्रसन्नमुद्रा में अपने दोनों हाथों में अमृत-
कलश और पिशित लिये हुए है। इतना स्मरण कर यह कहना चाहिये कि,
२०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘सौः चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशितहस्तां प्रसन्नां सुधादेवीं पूजयामि नमः
स्वाहा।’ उसी अमृत-कलश पवित्र जल का भावन करते हुए पूजाद्रव्य का
प्रोक्षण करना चाहिये।।१६।।
तत्त्वकदम्बस्य हृत्पद्मानयनम्
पूर्वं नाभौ सम्मुद्रितं चिदग्निविलीनं तप्तायोद्रववत् षट्त्रिंश-
तत्त्वकदम्बकं हृत्सरोजे समानीय।।१७।।
पूर्वं पात्रासादनात्पूर्वमित्यर्थः। तप्तायोद्रववत् तप्तसुवर्णद्रववत्। वेदे
निघण्टौ सुवर्णपर्याये अयःपदसत्त्वात् प्रकृतायःपदमपि सुवर्णवाचकम्। इत्थं च
पूर्वं नाभौ षट्त्रिंशत्तत्त्वानि एकीकृत्य चिदग्निना द्रवीभावः सम्पादितोऽस्ति।
ताननूद्य हृदये तद्रसस्य समानयनं विधीयते।।१७।।
पात्रासादन के पहले नाभि में सम्मुद्रित अर्थात् एकीकृत रूप से चिदग्नि
में विलीन ३६ तत्त्वों का समूह जो चैतन्य के चमत्कार से इस रूप में परिणत
हो गया है। उसको हृदयकमल में मयूराण्डरस के समान मकरन्दरस की तरह ध्यान
करना चाहिये। इस प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये, चित् रूप प्रकाश में
३६ तत्त्वों को सोने के पिघले द्रव की तरह रस रूप में परिणत करने का प्रकल्पन,
एक विशेष प्रक्रिया है। फिर उसे हृदय में लाना और उसका अनुभव करना एक
अलग स्थिति है। इस स्थिति में उपासक परा पूजा के योग्य होता है।।१७।।
अथ पराचक्रं वक्तुं प्रक्रमते
मूलजप्तैः कुसुमक्षेपैर्वक्ष्यमाणैश्च मन्त्रैरासनक्लृप्तिं कुर्यात्।
मूलादियोगपीठाय नम इत्यन्तानि तानि च पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाश-
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दोपस्थपायुपादपाणिवाग्घ्राणजिह्वाचक्षुस्त्वक्श्रोत्रा-
हङ्कारबुद्धिमनःप्रकृतिपुरुषनियतिकालरागकलाविद्यामायाशुद्धविद्येश्वर-
सदाशिवशक्तिशिवाः। एवं पराचक्रं कृत्वा।।१८।।
प्रथमं केवलमूलेनैकवारं कुसुमक्षेपः। ततो वक्ष्यमाणैरेकतत्त्वमन्त्रेण,
मूलादिना योगपीठाय नम इत्यन्तेनैकवारं कुसुमाक्षतक्षेपो वक्ष्यमाणैर्मन्त्रैः।
यथा तत्र तत्त्वमन्त्रस्वरूपम्—पृथिवियोगपीठाय नम इति। एवं शिवान्तेषु
पराक्रमः २०७
योज्यम्। एवं हृदये षट्त्रिंशद्वारं मूलेन निरुक्तषट्त्रिंशत्तत्त्वमन्त्रैश्च कुसुमानां
प्रक्षेप एव पराचक्रनिर्मितिरिति भावः। तानि चेत्यत्र लिङ्गव्यत्यय आर्षः।
षट्त्रिंशत्तत्त्वान्याह—पृथिवीति शिव इत्यन्तेन। यद्यपि तन्त्रान्तरे शिवादि-
पृथिव्यन्तक्रमस्तत्त्वानाम्स्ति, तथापि प्रकृतेऽनेनैव क्रमेण मन्त्रैः पुष्प-
क्षेपोऽपूर्वसाधनमिति विपरीतपाठः। तत्स्वरूपं व्याख्यातं प्राक्॥१८॥
परा चक्र का यह निर्माण शिव संकल्प प्रकल्प का अनूठा उदाहरण है।
कुसुमक्षेप द्वारा आराध्य चक्र के निर्माण की योजना अन्यत्र दुर्लभ है। सर्वप्रथम
मूल मन्त्र का एक बार प्रयोग कर कुसुमक्षेप करने के उपरान्त सूत्रोक्त सभी
तत्त्वपीठों के मन्त्रों से कुसुमक्षेप करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार होंगे, जैसे—
१. ‘सौः पृथिवीयोगपीठाय नमः’ मन्त्र बोलकर कुसुमक्षेप करना चाहिये।
२. ‘सौः अप्योगपीठाय नमः’ (कुमुमक्षेप)।
[
२०८ परशुरामकल्पसूत्रम्
अकलङ्कः कलङ्कशून्यो यः शशाङ्कश्चन्द्रस्तत्तुल्याभा। मुद्रा चिन्मुद्रा,
पुस्तं पुस्तकम्। एतेन द्विबाहुत्वं स्पष्टम्। अत्र पुस्तकं वामहस्ते, गणपति-
प्रकरणलिखितयामलवचनात् परिशेषान्मुद्रा दक्षे।।२०।।
'निष्कलङ्क चन्द्रमा के समान सौन्दर्यसुधासामरस्यमयी त्रिनेत्रा चन्द्र-
कलाकलिता मुद्रापुस्तकधारिणी द्विबाहुसुशोभिता परमा कला मेरी रक्षा करे।' इस
विमृष्टि के स्तर पर माँ सदाशिवरूप चन्द्रकलाकलिता परमाम्बा का ध्यान करना
चाहिये।।२०।।
अथ पूजामाह
मूलादिमुच्चार्य प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका, मूलमध्यमुच्चार्य
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका मूलान्तमुच्चार्य प्रकाशविमर्शरूपिणी
पराभट्टारिकेति त्रिभिः देव्या मूलहृन्मुखेष्वभ्यर्च्य समस्तमुच्चार्य,
महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिकेति, दशवारमवमृश्य तामेव
देवीं कालाग्निकोटिदीप्तां ध्यात्वा।।२१।।
मूलादिं सकारम्। तत्र बिन्दुयोगोऽपि। एवं मूलद्वितीयम् औं। तृतीयं
विसर्गः। मन्त्रस्वरूपं तु—'सं प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि
नमः'। एवमन्यत्। देव्या मूलं मूलाधारम्। इदं पूजनं विशेषार्घ्यद्रव्येण
आवरणदेवतावत् स्वहृदये ज्ञेयम्। समस्तं सम्पूर्णं मूलमित्यर्थः।
श्रीपादुकेत्यादियोजनम् अत्रापि अवमृश्य पूजयित्वा।।२१।।
मूल अर्थात् पराबीज को उच्चरित कर उसका आदि अक्षर बिन्दुयुक्त
बोलकर और इसके बाद प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका प्रयोग कर 'श्रीपादुकां
पूजयामि नमः' लगाना चाहिये। इस तरह प्रथम मन्त्र स्वरूप—'सौः सं प्रकाश-
रूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है।
इसी तरह मूल के साथ मूलमध्य 'औ' को लगाकर विमर्शरूपिणी
पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः, मन्त्र बनता है। इसी क्रम में मूलान्त्य
अर्थात् विसर्ग (अः) को मूल के बाद बोलकर तीसरा मन्त्र 'सौः अः प्रकाश-
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है, इन तीनों से
क्रमशः मूलाधार, हृदय और मुख में पूजन करना चाहिये। यह पूजन
पराक्रमः २०९
विशेषार्घ्यद्रव्य से होता है। इसे अपने हृदय में ही सम्पन्न करना चाहिये।
तदनन्तर समस्त मन्त्र का उच्चारण कर ‘महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिका
श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र से देवी के मूल हृदय और मुख में दश बार
पूजन करना चाहिये। अवमर्शन का अर्थ पूजन ही होता है। ऐसी पूजित
वात्सल्यमयी करोड़ों कालानल की दीप्ति के समान अनन्त दीप्तिमन्त माँ का
ध्यान करना चाहिये।।२१।।
ततः कृत्यशेषमुपदिशति
तस्यां क्रियासमभिव्याहारेण वेद्यमखिलं हुत्वा ।।२२।।
तस्यां दीप्तौ हुत्वा हुतं भावयित्वा।।२२।।
कालाग्निकोटिदीप्तिरूप चिदग्नि में क्रियासमभिव्याहार क्रम से प्रत्येक वेद्य
का हवन करना चाहिये। प्रथम मन्त्र जैसे—‘सौः पृथिवीं जुहोमि स्वाहा’’ की
तरह सभी वेद्योँ का हवन करना चाहिये।।२२।।
मुखे अर्घ्यनिवेदनम्
मूलमुच्चार्य सामान्यपादुकया स्वमस्तकस्थाय गुरवे अर्घ्यं
निवेद्य ।।२३।।
सामान्यपादुकया दीक्षाप्रकरणे पठितगुरुपादुकामन्त्रेण।।२३।।
गुरुपादुका मन्त्र प्रथम खण्ड के सूत्र ४१ में दिया गया है। खण्ड दश
के सूत्र ३२ में भी श्रीपादुका के विषय में चर्चा है। इन सन्दर्भों के अर्थ को
ध्यान में रखते हुए गुरुदेव के दीक्षा नाम के पहले मूल अर्थात् पराबीज का
उच्चारण करते हुए ‘सौः स्वमस्तकस्थामुकानन्दनाथश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र
बोलकर गुरुदेव को अर्घ्य देना चाहिये।।२३।।
चिदग्नेरुद्दीपनम्
पुनश्चिदग्निमुद्दीप्तं विभाव्य ।।२४।।
गुरुदेव के अर्घ्य निवेदन के पश्चात् चिदग्नि के उद्दीप्त होने का विभावन
करना आवश्यक माना जाता है।।२४।।
२१० परशुरामकल्पसूत्रम्
ओघत्रयाभ्यर्चनम्
दिव्यौघं तिस्रः पादुकाः, सिद्धौघं तिस्रः, मानवौघमष्टाव-
भ्यर्च्य ।। २५ ।।
दिव्यौघसिद्धौघमानवौघानामर्चनम् आवरणदेवतावदर्चनम्। विशेषार्घ्य-
द्रव्येण स्वहृदय एव कार्यम् ।। २५ ।।
दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ की पूजा क्रमशः तीन, तीन और आठ
की संख्या के कारण पृथक्-पृथक् इतने ही मन्त्रों से की जाती है। जैसे—
१. दिव्यौघ—इस पूजा में तीन पूज्य परिगणित हैं। अघोरानन्दनाथ,
श्रीकण्ठानन्दनाथ के पहले पराभट्टारिका की पूजा की जाती है। जैसे—
अ. सौः पराभट्टारिका-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
आ. अघोरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
इ. श्रीकण्ठानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. सिद्धौघ—शक्तिधर, क्रोध, त्र्यम्बक ये तीन नाथ इसमें परिगणित हैं। इनके
मन्त्र भी पूर्ववत् बनाने चाहिये। उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—
‘सौः शक्तिधरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’। इसी प्रकार दोनों शेष
नाथों की पूजा करनी चाहिये।
३. मानवौघ—१. सौः आनन्दानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी तरह
२. प्रतिभादेव्यम्बानन्द, ३. वीरानन्द, ४. संविदानन्द, ५. मधुरा-
देव्यम्बानन्दनाथ, ६. ज्ञानानन्द, ७. श्रीरामानन्द, ८. योगानन्दनाथ सबके साथ
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाकर पूजा करनी चाहिये। यह तीनों ओघों
की पूजा है।। २५ ।।
दिव्यौघादीनाह
पराभट्टारिकाऽघोरश्रीकण्ठ-शक्तिधर-क्रोध-त्र्यम्बकनन्द-
प्रतिभादेव्यम्बा-वीर-संविदानन्द-मधुरादेव्यम्बा-ज्ञान-श्रीराम-योगा
इति परापादुकाः ।। २६ ।।
पराक्रमः २११
१. पराभट्टारिका, अघोरा, श्रीकण्ठ इति दिव्यौघः।
२. शक्तिधरः, क्रोधः, त्र्यम्बक इति सिद्धौघः।
३. आनन्दः, प्रतिभादेव्यम्बा, वीरः, संविदानन्दः, मधुरादेव्यम्बा, ज्ञानः,
श्रीरामः, योग इति मानवौघः।।२६।।
सूत्र २५ के अर्थ के साथ दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के क्रमशः
तीन, तीन, आठ अर्चनीय नाथों के नाम दे दिये गये हैं। मन्त्रों की योजना
भी वहीं द्रष्टव्य है।।२६।।
बलिदानम्
ततः कलामनुना बलिं निवेद्य ।।२७।।
ततः अर्चनानन्तरम्। कलामनुना 'सौः' इत्यनेन 'पातु मां परमा कला'
इत्यत्र परायाः कलापदवाच्यत्वं निर्णीतम्। अतस्तन्मनुरसावेव भवितुमर्हति।
बलिदाने धर्माः श्रीक्रमोक्ता ग्राह्याः, साजात्यात्। अत्र जपस्य उपासनाकालस्य
वाऽनुक्तेरयं प्रयोगः सकृदेव। यद्वा, श्यामावार्त्तालीसाहचर्यात् जपसङ्ख्या
अनुक्ता तत्रत्या ग्राह्या। तावज्जपपर्यन्तोपास्तिः। अत एवाग्रे सूत्रकारो जपकालं
वक्ष्यति।।२७।।
ततः अर्थात् परादेव्यम्बा के अर्चन के उपरान्त ही बलिकर्म करना चाहिये।
इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये—
१. बलि कलामन्त्र से होनी चाहिये।
२. कला पराम्बा को भी कहते हैं। यही मन्त्र 'सौः' है।
३. 'पातु मां परमाकला' के उद्धरण में पराम्बा को ही परमा कला कहते हैं।
४. बलिदान श्रीक्रम के अनुसार करना चाहिये।
५. जप और उपासना के समय अनुक्त हैं। अतः ये कार्य एक बार ही करणीय हैं।
६. जपसंख्या श्यामावार्त्तालीवत् होनी चाहिये।।२७।।
हविःशेषस्वीकारः
हविःशेषमात्मसात्कुर्यात्। इति शिवम् ।।२८।।
२१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषमात्मसात्कारः श्रीक्रमवत्। आत्मसात्कुर्यात् इत्येवोक्त्या अत्र
सामयिकाभावः सूचितः। शिवमिति व्याख्यातमेव।।२८।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ
सौभाग्योदयनाम्न्यां (मुख्यांशमात्रायां) पराक्रमो
नामाष्टमः खण्डः सम्पूर्णः ।।८।।
हविःशेष स्वीकार करने के पहले 'सौः' मन्त्र से आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व
और शिवतत्त्व का शोधन करना चाहिये। परापूजा की हवि स्वयं या
स्वसन्ततिक्रमस्थ व्यक्ति को ही देनी चाहिये, दूसरे को नहीं। इति शिवम्।।२८।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का पराक्रम नामक अष्टम खण्ड परिपूर्ण ।।८।।
।। इति शिवम्।।
होमविधिः
[ नवमः खण्डः ]
अथ गणपतिक्रमे नित्यहोमप्रसक्तौ ललिताऽऽदिपुरश्चरणाङ्गहोमस्य
अन्यत्र काम्यहोमस्य वा प्रसक्तौ तदितिकर्त्तव्यताज्ञानस्यावश्यकतया तदर्थं
होमविधिं वक्तुमारभते—
अथ स्वेष्टमन्त्रस्य होमविधानं व्याख्यास्यामः ।।१।।
अथेति पूर्वक्रान्तविच्छेदाद्योतकः। स्वेष्टमन्त्रस्येत्यनेन, अग्रे
सौरवैष्णवादिसर्वसाधारणोपासनाया वक्ष्यमाणत्वाद् अत्रापि सर्वसाधारणो
होमविधिरिति ज्ञापितः।।१।।
अथ शब्द पूर्व में उपक्रान्त विषय के अन्त और नूतन विषय के उपक्रम
का सूचक माना जाता है। सूत्र में निर्दिष्ट स्वेष्टमन्त्रोपासना के प्रयोग में होम
का विधान सभी सम्प्रदायों में है। जैसे सौर सूर्यमन्त्र-जपान्त में होम करते हैं,
इसी तरह वैष्णवादि सम्प्रदायों में भी यही क्रम अपनाया जाता है। इसे
सर्वसाधारण उपासना क्रम में स्वीकृत विधि कहते हैं। इसी आधार पर इस होम-
विधान को भी सर्वसाधारण होम विधान मानना चाहिये।।१।।
ततस्तद्विधिमाह
चतुरस्रं कुण्डमथवा हस्तायाममङ्गुष्ठोन्नतं स्थण्डिलं कृत्वा।।२।।
कुण्डमित्यनेन तन्त्रान्तरोक्तमेखलायोनिखातादिमतिदिष्टं नाम्ना। चतुरस्रं
नित्यम्। प्रजादिकामनायां योनिकुण्डादिकमपि। सूत्रानुयायिनां न मण्डप-
विचारः। अनुक्तत्वाद् असूचितत्वाच्च। आयामो विस्तारः।।२।।
२१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
सूत्र में चतुरस्र शब्द के प्रयोग पर बल दिया गया है। अर्थात् सभी प्रकार
के उपक्रमों में कुण्ड चतुरस्र ही होना चाहिये। नैमित्तिक और काम्य प्रयोगों में
कभी इसका अपवाद भी पाया जाता है, जैसे पुत्रसन्तति परम्परा की कामना
में योनिरूप ही कुण्ड बनाया जा सकता है। सूत्रानुसारी निर्देश के अनुयायी
विद्यावान् विद्वान् यह भी मानते हैं कि, इसमें मण्डप की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि सूत्र में मण्डप की चर्चा नहीं है। अन्यत्र भी इसका निर्देश नहीं है,
न सूचना ही है।।२।।
सामान्योदकेनावोक्षणम्
सामान्यार्घ्यमुपशोध्य तेनावोक्ष्य ।।३।।
तत्तत्क्रमोक्तविधिना सामान्योदकं निर्मायेत्यर्थः। यदि पूजाङ्गहोमः, तदा
पूजायां कॢप्तेनैव कार्यसिद्धौ न निर्माणम्, अन्यत्र निर्माणमिति ज्ञेयम् ।।३।।
जिस क्रम की पूजा का विधान हो, उसमें सामान्य जल लेकर उसे शुद्ध
कर उससे पूजा द्रव्य का उच्छन करना चाहिये। किसी पूजा के अङ्गरूप में यदि
होम का विधान किया गया हो, तो जो जल प्रयुक्त हो रहा है, उसी से अवोक्षण
होना चाहिये।।३।।
रेखासु ब्रह्मादिदेवतार्चनम्
प्राचीरुदीचीस्तिस्रस्तिस्रो रेखा लिखित्वा ।।४।।
पूर्व और उत्तर तीन-तीन रेखायें खींचनी चाहिये। प्रथम प्रागग्र रेखा और
प्रथम उदगग्र के क्रम से इन पर देवों का आवाहन करने का विधान शास्त्र
में निर्दिष्ट है।।४।।
तासु रेखासु ब्रह्मयमसोमरुद्रविष्ण्विन्द्रान् षट्तारी नमः
सम्पुटितानभ्यर्च्य¹ ।।५।।
षट्तारी कुमारी प्रथमं ततो ब्रह्मणे नम इति। एवञ्च षट्तारनमः-
सम्पुटिता भवन्ति। एवमेव यमायेत्यादौ योज्यम्। नमःसम्पुटितानित्यनन्तरं
१. श्रीक्रम-सूत्र. ८।
होमविधिः २१५
पठित्वेति शेषः। अभ्यर्च्य इत्यस्य कर्मकाङ्क्षायां मन्त्रलिङ्गाद् देवता
योज्याः ।।५।।
उन रेखाओं पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्रम से ब्रह्मा, यम और सोम
की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह उदगग्र रेखाओं पर क्रमशः रुद्र, विष्णु और
इन्द्र की पूजा की जाती है। पूजा के मन्त्र देव नामों को त्रितारी और कुमारी
के बाद नमः से सम्पुटित करके बनाते हैं। जैसे—'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः
ब्रह्मणे नमः' इस मन्त्र से ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये।।५।।
सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः, स्वस्तिपूर्णाय शिरसे स्वाहा, उत्तिष्ठ
पुरुषाय शिखायै वषट्, धूमव्यापिने कवचाय हुम्, सप्तजिह्वाय
नेत्रत्रयाय वौषट्, धनुर्धराय अस्त्राय फट् इति षडङ्गं विधाय तेन
षडङ्गेन कुण्डमभ्यर्च्य ।।६।।
उक्तषण्मन्त्रैः स्वदेहे हृदयादिषडङ्गन्यासानन्तरं कुण्डे तैरेव मन्त्रैः
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गयुवतीः पूजयेत्।।६।।
सूत्र में छः मन्त्र निर्दिष्ट हैं। इन मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिये। इन्हीं
मन्त्रों से कुण्ड-मध्य और ऊर्ध्वादि चतुर्दिक् कुण्डशक्तियों की अर्चना करनी
चाहिये।।६।।
ततोऽग्निचक्रनिर्माणादिकमाह
तत्राष्टकोणषट्कोणत्रिकोणात्मकम् अग्निचक्रं विलिख्य
पीतायै, श्वेतायै, अरुणायै, कृष्णायै, धूम्रायै, तीव्रायै, स्फुलिङ्गिन्यै,
रुचिरायै, ज्वालिन्यै नम इति त्रिकोणमध्ये वन्हेः पीठशक्तीः
सम्पूज्य—तं तमसे, रं रजसे, सं सत्त्वाय, आम् आत्मने, अम्
अन्तरात्मने, पं परमात्मने, ह्रीं ज्ञानात्मने नम इति तत्रैवा-
भ्यर्चयेत् ।।७।।
कुण्डे स्थण्डिले वा अष्टकोणादिनिर्माणं प्रवेशरीत्या कार्यम्,
त्रिकोणस्याभ्यन्तरे भूरिदर्शनात्। पीतायै इत्यादितो ज्ञानात्मने नम इत्यन्तं
स्पष्टम्। तत्रैव त्रिकोण एव। क्रमस्तु स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।।७।।
२१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
यह होमकुण्ड और स्थण्डिल दोनों स्थानों पर किया जा सकता है। कुण्ड
में होम करना हो, तो उसमें या स्थण्डिल (वेदी) पर करना हो तो उस पर
ही प्रवेश क्रम के अनुसार अष्टकोण, षट्कोण या त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का
निर्माण करना चाहिये। प्रचलन त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का ही है। यह आचार्य
पर निर्भर करता है कि, होम के अनुसार अग्निचक्रों का निर्माण करे। कुण्ड
और स्थण्डिल के आकार-प्रकार पर भी यह निर्भर करता है।
त्रिकोण के मध्य में अग्नि देवता की नौ पीठशक्तियों की स्थापना और
पूजा करनी चाहिये। उनके नाम क्रमशः हैं—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा,
धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा और ज्वालिनी। तत्पश्चात् उसी त्रिकोण में
तमस्, रजस्, सत्त्व, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की इनके
आदि अक्षरों का बिन्दुयुक्त बीज बनाकर इनके चतुर्थ्यन्त रूप के साथ मन्त्रात्मक
उच्चारण कर पूजा करनी चाहिये। जैसे—
१. तं तमसे नमः अभ्यर्चयामि तर्पयामि नमः।
२. रं रजसे नमः, ३. सं सत्त्वाय नमः, ४. आम् आत्मने नमः, ५. अं
अन्तरात्मने नमः, ६. पं परमात्मने नमः। ७. ज्ञानात्मा के पहले ह्रीं बीजमन्त्र
लगाते हैं। जैसे—ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इन सरल मन्त्रों से ही इन पीठशक्तियों
की पूजा सम्पन्न होती है॥७॥
एवं पीठशक्तिपूजामुक्त्वा ततोऽग्निप्रतिष्ठामुपदिशति
ततो जनयिष्यमाणवह्नेः पितरौ वागीश्वरीवागीश्वरौ पीठेऽभ्यर्च्य
तयोर्मिथुनीभावं भावयित्वा ‘ह्रीं वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः’ इति
ध्यात्वा॥८॥
पीठे त्रिकोणात्मके अभ्यर्चितदेवताविशिष्टे तयोर्वागीश्वरीवागीश्वरयो-
र्मिथुनीभावं मैथुनकर्म मनसा भावयित्वा। ध्यात्वेति ध्यानं कामेश्वरीकामेश्वरवत्
तदभिन्नत्वात्॥८॥
इसी त्रिकोणात्मक पीठ में, जिसमें पहले अग्नि-शक्तियों और शक्तिमन्तों
की पूजा की जा चुकी है, उसी में अग्नि की प्रतिष्ठा करनी होती है। अग्नि
होमविधि: २१७
अभी उत्पन्न नहीं किया गया है। परशुरामकल्पसूत्र के अनुसार अग्नि के माता-
पिता वागीश्वरी और वागीश्वर माने जाते हैं। इन दोनों का मैथुनभाव सम्पन्न होने
पर अग्नि का जन्म स्वाभाविक माना जा सकता है। अतः इनके इसी भाव का
मन ही मन भावन करना चाहिये। इसके पहले उसी पीठ में इन दोनों की पूजा
भी कर लेनी चाहिये। मनसा भावन करने के बाद इनसे सम्बद्ध 'ह्रीं
वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः' इस मन्त्र को बोलते हुए दोनों का ध्यान करना
चाहिये।।८।।
संविदग्निपातनम्
अरणेः सूर्यकान्ताद् द्विजगृहाद्वा वह्निमुत्पाद्य मृत्पात्रे ताम्रपात्रे
वा आग्नेय्यामैशान्यां नैर्ऋत्यां वा निधाय, अग्निशकलं क्रव्यादांशं
नैर्ऋत्यां विसार्य निरीक्षणप्रोक्षणताडनावकुण्ठनादिभिर्विशोध्य ॐ
वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय स्वाहा इति
मूलाधारोद्गतं संविदं ललाटनेत्रद्वारा निर्गमय्य तं बाह्याग्नियुक्तं
पातयेत् ।।९।।
अरणिः प्रसिद्धः। द्विजगृहेभ्यः पचनाग्निस्तस्यानयनमेव तदुत्पादनम्।
पात्रनियममाह—मृत्पात्र इति। स्थापनदेशनियममाह—आग्नेय्यामिति।
क्रव्यादांशं अमेध्यांशम् इत्यर्थः, 'य एतान् क्रव्यात् तमपहृत्य मध्येऽग्नौ
कपालमुपदधाति' इति श्रुतेः। विसार्य बहिर्निरस्य। निरीक्षणं स्वनेत्राभ्याम्।
प्रोक्षणं सामान्यार्घ्योदकेन। ताडनम् अभिघाताख्यः संयोगविशेषः। अवकुण्ठनं
पूर्वदर्शितमुद्रा। आदिपदेन धेनुयोनी। स्थलान्तरे अवकुण्ठनसहपाठात्। एतै-
र्विशोध्य संस्कृत्य। तस्मिन् पात्रे चिदग्न्यावाहनप्रकारमाह—ॐ वैश्वानरेति।
ललाटनेत्रद्वारा भ्रूमध्यद्वारा। निर्गमय्य निर्गमनं विभाव्य। तं चिदग्निं बाह्या-
ग्नियुक्तम्। इत्यनेन चिदग्नेः प्राधान्यं सूचितम्, भृत्ययुक्तराजेतिवत्। पातयेद्
इत्यस्मात् पूर्वं पूर्वनिर्मिताग्निचक्रे इति शेषः।।९।।
वागीश्वरी और वागीश्वर की कृपा से ही अग्नि अरणि से उत्पन्न होता
है। अरणि न हो तो सूर्यकान्त मणि से अग्नि उत्पन्न करना चाहिये। यह
२१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भी सम्भव न हो, तो ब्राह्मण के घर से अग्नि ले आना चाहिये। अग्नि
को मृत्पात्र अथवा ताम्रपात्र में लाना चाहिये। अग्नि लाकर अग्नि, ईशान
या नैऋत्य में रखना चाहिये। उसमें से श्रुति-परम्परानुसार अमेध्य अंश को
क्रव्याद कोण में फेंककर कुण्ड में रखने के पहले उसका निरीक्षण, प्रोक्षण,
ताडन, अवकुण्ठन तथा धेनु और योनि मुद्रा विधियों से उसका विशोधन
भी कर लेना चाहिये।
तत्पश्चात् 'ॐ वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय
स्वाहा' इस मन्त्र से मूलाधार चक्र से उद्गत संवित् रूप चिदग्नि को भ्रूमध्यनेत्र
द्वारा निकाल कर उस बाह्य अग्नि में मिलाकर कुण्ड में उसका संपात करना
चाहिये।।९।।
इन्धनैराच्छादनम्
कवचमन्त्रेण इन्धनैराच्छाद्य ।।१०।।
कवचमन्त्रेण 'हुं' इत्यनेन।।१०।।
कवचमन्त्रेण इस तृतीयान्त प्रयोग से यह प्रतीत होता है कि, इस बीज
मन्त्र में आच्छादन के साधकतमत्व की व्याप्ति है। इसके द्वारा आच्छादित होना
एक रहस्यभरा आध्यात्मिक प्रयोग है।।१०।।
अथोपस्थानमाह
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
सुवर्णवर्णमनिलं समिद्धं विश्वतोमुखम्।। इत्युपस्थाय ।।११।।
उपस्थानं नाम अग्नेरपरभागे कृताञ्जलेस्तिष्ठतो मन्त्रपाठः ।।११।।
'मैं प्रज्वलित अग्नि की वन्दना कर रहा हूँ। अग्नि जातवेद (जातवेदस्)
है। यह ज्ञानरूप है। यह हुताशन है। दी हुई आहुतियों का प्राशन कर देवताओं
तक पहुँचाता है। यह सोने के समान सुन्दर है। इसे अनल कहते हैं। अच्छी
तरह प्रज्वलित है और चारों ओर से इन्धन को ग्रास बनाकर आत्मसात् करता
है।' इस श्लोकरूप मन्त्र से इस तरह प्रार्थना करते हुए उसके पास अञ्जलिबद्ध
बैठने की मुद्रा का नाम ही उपस्थान है।।११।।
अष्टम से दशम खण्ड: होम, प्रायश्चित्त, कौल-धर्म एवं कल्पसूत्र उपसंहार
होमविधिः २१९
भूमौ मृण्मयपात्रे पूर्वम्, आग्नेयान्यतमदिक्षु स्थापिताग्नेः कुण्डे
प्रक्षेपार्थम् उत्थापने मन्त्रमाह—
'उत्तिष्ठ हरितपिङ्गल लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय मे देहि
दापय स्वाहा' इति वह्निमुत्थाप्य ।।१२।।
एतेन ॐ वैश्वानरेति, बहिर्निर्गमय्य कुण्डे प्रक्षेपात् प्राग् अर्थक्रमेण
पाठक्रमं बाधित्वा प्रयोगानुष्ठानकाले पाठः, उत्थापनस्य प्रक्षेपपूर्व-
कालिकत्वात्।।१२।।
यह मन्त्र अग्नि के उत्थापन का है। उत्थापन वह क्रिया है, जो प्रक्षेप
के पहले सम्पन्न होती है। शास्त्र में एक नीति ऐसे अवसरों पर अपनायी जाती
है। वह है—'पाठक्रमेण अर्थक्रमो बलीयान्'। इसलिये इस मन्त्र से अग्नि को
उठाकर ॐ वैश्वानर (सूत्र-९) इस मन्त्र से प्रक्षेप करना उचित है। मन्त्र का
अर्थ स्पष्ट है।।१२।।
प्रज्वालनमन्त्रमाह
चित्पिङ्गल हन हन दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा इति
प्रज्वाल्य ।।१३।।
प्रज्वालनं वेणुधमन्या 'मुखेनाग्निं नोपधमेत्' इति श्रुतेः।।१३।।
बाँस की धमनी (फोंफी) अर्थात् पतले बाँस की एक पर्वमयी या गाँठों
के भीतर छेद कर २-३ पर्वमयी भी बनायी जाती है। उसी से आग को प्रज्वलित
किया जाता है। श्रुति कहती है कि, अग्नि को मुह से नहीं फूँकना चाहिये।
इसी परम्परा के अनुसार आग को धमनी से प्रज्वलित करना उचित है। मन्त्रार्थ
स्पष्ट है।।१२।।
उत्पन्नाग्नेः संस्कारानाह
षट्तारवाचो नमोमन्त्रेण पुंसवनसीमन्तजातकर्मनामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनगोदानविवाहकर्माण्यमुकाग्नेरमुककर्म कल्पयामि
नम इति विधाय ।।१४।।
२२० परशुरामकल्पसूत्रम्
षट्तारवाच उक्ताः। नमोमन्त्रेण नमोऽन्तमन्त्रेण। स्वयमेव नमोऽन्तमन्त्रं
विवृणोति—अमुकेत्यादिना। इत्थं च प्रथमं षट्तारी तत ऐं, तत
इष्टदेवतानाम, ततोऽग्निशब्दः, षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम, ततोऽग्निशब्दः
षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम द्वितीयान्तं, ततः कल्पयामीति।।९४।।
कुण्ड में प्रज्वलित अग्नि का संस्कार भी आवश्यक होता है। सूत्र में
पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, उपनयन, गोदान और
विवाह का सनामग्रहण उल्लेख है। इन संस्कारों के लिये मन्त्र का प्रयोग करना
आवश्यक है। सूत्रकार मन्त्र का निर्देश भी कर रहे हैं। उनके अनुसार सर्वप्रथम
षट्तारी का प्रयोग करना चाहिये। षट्तारी में त्रितारी और कुमारी दोनों आते
हैं। कई अवसरों पर इनके प्रयोग किये गये हैं। वस्तुतः त्रितारी में 'ऐं ह्रीं श्रीं'
ये बीजत्रितय आते हैं। इसी तरह कुमारी में 'ऐं क्लीं सौः' ये तीन बीज आते
हैं। इन दोनों को मिलाकर षट्तारी बीज मन्त्र बनते हैं। पहले षट्तारी इसके
बाद वाग्भव बीज 'ऐं' और इसके बाद अग्नि में षष्ठी विभक्ति लगाकर पुंसवन
आदि संस्कारों के नाम लेने चाहिये। उसके बाद 'कर्म कल्पयामि नमः' बोलकर
संस्कार सम्पन्न करना चाहिये। इस तरह 'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं हुताशनस्य
पुंसवनकर्म कल्पयामि नमः' यह मन्त्र बनता है। इसी क्रम में सभी संस्कारों
के मन्त्र बनते हैं। इनसे अग्नि का संस्कार होता है।।९४।।
परिषेचनादि
परिषिच्य परिस्तीर्य परिधाय ।।९५।।
परिषिच्य अनुक्तत्वादीशानीमारभ्य प्रदक्षिणं समन्तात् सामान्या-
र्घ्योदकेन। परिस्तीर्य परिस्तरणे एकैकदिशि चत्वारो दर्भाः, 'अग्निं
षोडशभिर्दर्भैः परितस्तु परिस्तरेत्' इति वचनात्। परिधाय श्रौतोक्तधर्मक-
समिद्भिः प्राग्वर्जं त्रिषु। क्रमादिकं काष्ठनियमः श्रौतात् ज्ञेयः।।९५।।
सूत्रकार ने परिषेचन, परिस्तरण और परिधान रूप तीन कार्यों का निर्देश
दिया है। इसमें विधि अनुक्त है। अतः गुरुपरम्परा के ही अनुसार ये तीनों कार्य
सम्पन्न करने चाहिये—
१. परिषेचन—ईशानकोण से सामान्य अर्घ्यजल से करना उचित है। इसमें
प्रदक्षिण क्रम अपनाने का निर्देश वृत्तिकार ने दिया है।
होमविधिः २२१
२. परिस्तरण—श्रुति का वचन है कि, चारों ओर मिलकर १६ दर्भों से अग्नि
का परिस्तरण होना चाहिये। इसलिये चार-चार दर्भ चारों ओर परिस्तृत
करना चाहिये। इसके बाद पूजा की जानी चाहिये।
३. परिधाय—इस प्रक्रिया में स्रुक्, स्रुवा इत्यादि का रखना, स्थाली आदि
की प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये। साथ ही कुण्ड में समिधाओं की किस
प्रकार व्यवस्था हो, इसको ध्यान में रखना चाहिये। यज्ञ में ये विधियाँ
प्रचलित हैं ॥१९५॥
साधिताग्नेर्ध्यानम्
त्रिनयनमरुणाभं बद्धमौलिं सुशुक्लां
शुकमरुणमनेकाकल्पमम्भोजसंस्थम् ।।
अभिमतवरशक्तिस्वस्तिकाभीतिहस्तं
नमत कनकमालालङ्कृतांसं कृशानुम् ।।
इति ध्यात्वा ।।१९६।।
यह अग्नि के ध्यान का मन्त्रात्मक श्लोक स्वयं ग्रन्थकार की स्वोपज्ञ
रचना है। इससे अग्नि का ध्यान करना चाहिये। इसका अर्थ इस प्रकार है—
तीन नेत्रों वाले, ताम्रवर्णी, बद्धमौलि, शुक्ल अंशुकधारी, सुन्दर, अरुण कमल
में अवस्थित, अभीष्टवरमुद्रा, शक्ति, स्वस्तिक और अभय मुद्रा में विराजमान
स्कन्ध पर शोभमान स्वर्णहार समन्वित हुताशन अग्निदेव को सभी प्रणति
निवेदन करें।।१९६।।
पूर्वकल्पिताग्निचक्राष्टकोणादिषु देवतास्थापनमाह
अष्टकोणे जातवेदसे सप्तजिह्वाय, हव्यवाहाय अश्वोदराय
वैश्वानराय कौमारतेजसे विश्वमुखाय देवमुखाय नमः, इति षट्कोणे
षडङ्गं, त्रिकोणे अग्निमन्त्रेण अग्निं पूजयित्वा ।।१९७।।
अष्टकोणे अनुक्तत्वात् प्रागादिप्रादक्षिण्यक्रमः। षट्कोणेऽपि तथैव।
अग्निमन्त्रेण 'अग्निं प्रज्वलितम्' इत्युपस्थापनमन्त्रेण, अग्निलिङ्गस्य
स्पष्टत्वात्। पूजने च पञ्चोपचारैर्मन्त्रावृत्त्या ज्ञेयम् ।।१९७।।
२२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
आठ कोणों में कहाँ किसकी पूजा की जाय, इसका स्पष्ट निर्देश नहीं
है। अतः परम्परा के अनुसार आचरण करना चाहिये। पूरब से अग्नि होते हुए
ईशान तक के क्रमिक कोणों में पूजा का प्रचलन है। षट्कोण में भी यही क्रम
अपनाना चाहिये। इसमें षडङ्ग पूजन करना होता है। त्रिकोण में अग्नि मन्त्र से
पूजा की जाती है। पूजन में पञ्चोपचार विधि अपनायी जाती है।।१७।।
सप्तजिह्वाहुतीराह
हिरण्यायै, कनकायै, रक्तायै, कृष्णायै, सुप्रभायै, अतिरक्तायै,
बहुरूपायै नम इत्यग्नेः सप्तजिह्वासु मूलशुद्धेनाज्येन सप्ताहुतीः
कुर्यात् ।।१८।।
नम इति सर्वत्रानुषज्यते। मूलशुद्धेन मूलाभिमन्त्रणेन संस्कृतेन।
अभिमन्त्रणं संख्यानुक्तेः सकृन्मूलेन। नमःपदोत्तरं स्वाहायोगः, होमरूप-त्वात्।
'स्वाहा होमे तर्पणे तु तर्पयामीति योजयेत'। इति योगिनीतन्त्र-
वचनात् ।।१८।।
अग्नि की सात जिह्वायें प्रसिद्ध हैं। इनके नाम क्रमशः हिरण्या, कनका,
रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता, बहुरूपा हैं। इन सातों जिह्वाओं में मूलमन्त्र
से अभिमन्त्रित आज्य (शुद्ध घी) से सात आहुतियाँ दी जानी चाहिये।
आहुति देते समय सूत्र में लिखित नमः शब्द के बाद 'स्वाहा' अवश्य
जोड़ना चाहिये। एक नियम है कि, होम में स्वाहा और तर्पण में तर्पयामि क्रिया
का योग करना चाहिये। यह योगिनीतन्त्र का निर्देश है।।१८।।
कर्मशेषमुपदिशति सूत्रान्तरेण
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरग्नेस्त्रिधाहुतिं विधाय ।।१९।।
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरिति पूर्वपठितैस्त्रिभिर्मन्त्रैरित्यर्थः। त्रिधात्रिवारम्।
अनेन कर्माभ्यासः, नाहुतिभेदः। वैश्वानरादिमन्त्रत्रये स्वाहाकारोऽस्ति।
तथाप्यन्यस्वाहाकारो होमकाले योज्यः। तदुक्तं शक्तिसङ्गमतन्त्रे—"मन्त्रान्ते या
वह्निजात्या सा तु मन्त्रस्वरूपिणी। तदन्ते प्रत्युञ्जीत सा होमाङ्गतया
मता"।।१९।।
होमविधिः २२३
इसी खण्ड के ९-१२ और १३वें सूत्रों में पठित तीन मन्त्रों से तीन
बार आहुति देनी चाहिये। त्रिधा का तात्पर्य भेदमयी आहुति नहीं, अपि तु
आहुतिरूप कर्म का अभ्यास मात्र है। एक विशेष तथ्य की ओर वृत्तिकार ने
ध्यान आकृष्ट किया है। वह यह कि, उक्त तीनों मन्त्र स्वाहान्त मन्त्र हैं। शक्ति-
संगम-तन्त्र कहता है कि, मन्त्रोक्त स्वाहा शब्द मन्त्र के अङ्ग हैं। आहुति करते
समय स्वाहा पृथक् प्रयोग भी आहुति के अङ्गरूप में उचित है॥१९॥
अथ इष्टदेवतावाहनमाह
बहुरूपजिह्वायामिष्टां देवतामावाह्य पञ्चोपचारैरुपचर्य ॥२०॥
आवाहनं पूजाप्रकरणोक्तसरण्या। पञ्चोपचारैर्गन्धादिभिः ॥२०॥
वस्तुतः जहाँ तक पाँच उपचारों का प्रश्न है— ये गन्ध, पुष्प, धूप,
दीप, नैवेद्य में ही चरितार्थ हो जाते हैं॥२०॥
चक्रदेवीनामाहुतयः
सर्वासां चक्रदेवीनामेकाहुतिं हुत्वा, नमोऽन्तान् पादुकान्तान्
शेषान् मन्त्रान् स्वाहान्तान् विधाय जुहुयात्॥२१॥
सर्वासामिति तत्तदावरणदेवताषडङ्गौघत्रयनित्याऽऽदीनां मध्ये यस्मिन्
पूजाप्रकरणे यावत्यो विहितास्तासां सर्वासामित्यर्थः। द्रव्यानुक्तत्वाद् आज्यम्।
नमोन्तान् इति ये च नमोऽन्ता बाणमन्त्रा वशिन्यादिमन्त्राश्च पादु-कान्ता मन्त्रा
गुरुपादुकामन्त्रादयः, एतदुभयभिन्नाः केवलं नाम्नैवोद्धृताः। अणिमासिद्ध्यादयः
शेषाः, एतान् सर्वान् स्वाहान्तान् कृत्वा तेन होतव्य-मित्यर्थः। श्रीक्रमे
पञ्चदशनित्यानन्तरं सर्वरोगहरचक्रे कामेश्वर्याद्यनन्तरं मूलेन पूजनवन्न होमः।
तेन तस्याः प्रधानदेवतारूपत्वेन तस्या आहुतेर्वक्ष्यमाणत्वात् ॥२१॥
सभी चक्र-देवियों के लिये (सप्तमसूत्रोक्त) एक-एक आहुति देने का
निर्देश सूत्रकार दे रहे हैं। पुनः नमः अन्त वाले बाणमन्त्र और पादुकान्त
शेष मन्त्रों के साथ स्वाहा लगाकर हवन करना चाहिये। ये दो प्रकार के
भेदयुक्त मन्त्र यहाँ निर्दिष्ट हैं। इन्हीं मन्त्रों से स्वाहान्त बनाकर हवन करना
चाहिये॥२१॥
२२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवमग्निसंस्कारानुक्त्वा प्रधानहोमधर्मानुपदिशति
अथ प्रधानदेवतायै दशाहुतीर्जुहुयात् ॥२२॥
अथेत्यनेन अङ्गदेवताहोमविच्छेदः सूचितः। एतावत्पर्यन्तं सर्वप्रयोग-
साधारणम्। पुरश्चरणाङ्गहोमः काम्यहोमो वा सर्वोऽप्येतदुत्तरं भवति ॥२२॥
अथ अव्यय का प्रयोग पूर्ववर्ण्य के विच्छेद और नव वर्णनीय के आरम्भ
का सूचक है। इस सूत्र में अङ्गदेवताओं से सम्बद्ध होम की समाप्ति की सूचना
और प्रधान देवता को दश आहुति देने का निर्देश है। पुरश्चरणाङ्ग होम या काम्य
होम इसके बाद ही होते हैं॥२२॥
काम्यहोमविधिः
यदि काम्यमीप्सेदभीष्टदेवतायै विज्ञाप्य सङ्कल्पं कृत्वैतावत्कर्म-
सिद्ध्यर्थमेतावदाहुतीः करिष्यामीति ॥२३॥
विज्ञाप्य प्रार्थ्य, एतावत्कार्यसिद्ध्यर्थम् अमुकफलसिद्ध्यर्थम् एता-
वत्कर्मामुकसंख्याकाहुतीः, कार्यतारतम्येन आहुतिसंख्यातारतम्यं ज्ञेयम्॥२३॥
काम्य कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होने पर इसकी सूचना इष्टदेवता को
देनी चाहिये। बिना प्रार्थना के काम्यकर्म नहीं करना चाहिये। आज्ञा लेकर
सर्वप्रथम संकल्प करना उचित है। काम्यकर्मों में फलाकांक्षा स्वाभाविक है।
फलानुसार आहुति की संख्या का निर्धारण करना पड़ता है। इस तारतम्य के
अनुसार काम्यकर्म करे॥२३॥
ससाधनं होमं विधत्ते
तिलाज्यैः शान्त्या, अन्नेनान्नायामृताय, समिच्चूतपल्ल-
वैर्ज्वरशमाय, दूर्वाभिरायुषे, कृतमालैर्धनाय, उत्पलैर्भोगाय,
बिल्वदलैराज्याय, पद्मैः साम्राज्याय, शुद्धलाजैः कन्यायै, नन्द्यावर्त्तैः
कवित्वाय, वञ्जुलैः पुष्ट्यै, मल्लिकाजातीपुन्नागैर्भाग्याय, बन्धूक-
जपाकिंशुकबकुलमधुकैरैश्वर्याय, लवणैराकर्षणाय, कदम्बैः
सर्ववश्याय, शालितण्डुलैर्धान्याय, कुङ्कुमगोरोचनादिसुगन्धैः
सौभाग्याय, पलाशपुष्पैः कपिलाघृतैर्वा तेजसे, धत्तूर-