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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

ललितानवावरणपूजाक्रमः १३१
स्तोत्र विभिन्न प्रकार की स्तुतियों के लिये प्रयुक्त शब्द है। वामकेश्वर-
तन्त्र के अनुसार गणेश, ग्रह-नक्षत्र आदि देवों की स्तुति, सहस्रनाम पाठ,
अपराध-क्षमापन स्तोत्र और अवकाश रहने पर 'सप्तशती' का पाठ भी किया
जा सकता है। इस तरह माँ परमाम्बा को सन्तुष्ट करना चाहिये।।२०।।
शक्तिपूजा
तद्रूपिणीमेकां शक्तिं बाल्योपचारैः सम्पूज्य तां मपञ्चकेन
सन्तर्प्य ।।२१।।
तद्रूपिणीं त्रिपुरसुन्दरीरूपिणीम्। एकवचनेन अद्वितीयां सौन्दर्येणेत्यर्थः।
बालया मन्त्रेण। उपचारैः यथासम्भवैः। मपञ्चकेन सन्तर्पणं तस्या इच्छायां
सत्यां ज्ञेयम्। अयं भावः सन्तर्प्येत्यनेन ज्ञापितः। तर्पणं तृप्तिसम्पादनम्।
शक्तिं सुवासिनीम् ।।२१।।
शक्तिपूजा का यह सन्दर्भ अपना स्वतन्त्र महत्त्व रखता है। शक्ति की पूजा
ही तो अब तक की गयी है। यहाँ इसके लिये तद्रूपिणीं लिखा है। तत् शब्द
माँ त्रिपुरसुन्दरी का वाचक है। उसके समान अनिन्द्य-सौन्दर्य-समन्विता, सर्व-
सुलक्षणा एक ऐसी नारी को हम 'सुवासिनी' शब्द से अभिहित कर सकते हैं।
'बाला' की पूजा में जो उपचार प्रयुक्त होते हैं। उन सभी उपचारों से
उसकी पूजा करनी चाहिये। बालात्रिपुरसुन्दरी का मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः' माना जाता
है। इसी मन्त्र से उस सुवासिनी को उपचारित करना श्रेयस्कर होता है। उसकी
दीक्षा आदि का विचार करने के उपरान्त गुरु यह सब विधि सम्पन्न करे, यही
उचित है।
मपञ्चक से सन्तर्पण के अधिकारी गुरु को ही यह विधि सम्पन्न करनी
चाहिये। इसमें सुवासिनी की इच्छा का भी ध्यान रखना चाहिये। दीक्षाविधि के
सूत्र २४ में मपञ्चक का प्रकरण आया हुआ है। इसके अप्राप्त होने की अवस्था
में प्रतिनिधि पदार्थ से यह क्रम सम्पन्न करना चाहिये।
कुलार्णवतन्त्र के अनुसार मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये मपञ्चक
कहलाते हैं। इन्हें महापातकनाशन माना जाता है। सूत्रकार द्वारा सूत्रोक्त इस विधि
के सन्दर्भ पर पूर्ण विचार करना आवश्यक है।।२१।।

१३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषप्रतिपत्तिमाह
शिष्टैः सार्धं चिदग्नौ हविःशेषं हुत्वा ।।२२।।
शिष्टैः सामयिकैः सह चिदग्नौ चिल्लक्षणेऽग्नौ हविःशेषं देवतोद्देशेन
संस्कृतार्पितशेषम्, हुत्वेत्यनेन तत्र केवलहोमबुद्धिरेव विधेया। इन्द्रियतृप्ति-
विषयीणीच्छा कदापि न कार्या ।।२२।।
सूत्र में शिष्ट शब्द का प्रयोग अवशिष्ट अर्थ में नहीं अपि तु उसी
अनुशासन में रहने वाले कुलाचारपालक के अर्थ में प्रयोग किया गया है। इसका
पर्याय सामयिक शब्द भी समयपालक अर्थात् कुलाचारविहित समय पालन के
लिये प्रतिबद्ध अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। ऐसे शास्त्रानुशासन के अनुयायियों
के साथ हविःशेष का चिदग्नि में हवन करना चाहिये। देवता को लक्ष्य कर
संस्कृत और अर्पित करने पर बची हुई राशि को हवि कहते हैं। इस हविःशेष
का चिदग्नि में हवन करने का विधान सूत्रकार निर्दिष्ट कर रहे हैं। होम बुद्धि
से भावनात्मक हवन करना ही लक्ष्य है। इसलिये यहाँ हवन करना प्रत्यक्ष होम
रूप हवन नहीं है। केवल चिदग्नि हवन का भावन मात्र है। इन्द्रिय-तृप्तिविषया
इच्छा की यहाँ कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिये। इस हवन में आणव, मायीय
और कार्ममलों का शमन हो जाता है। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और जीवतत्त्व का
शोधन भी हो जाता है। कुलाचार का प्रदर्शन मात्र करने में कुशल स्वेच्छाचारी
के आडम्बर से बचकर यह हवन करना चाहिये। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना
जाता है।।२२।।
देवीविसर्जनम्
खेचरीं बद्ध्वा क्षमस्वेति विसृज्य तामात्मनि संयोजयेद् इति
शिवम् ।।२३।।
खेचरीं बध्वा, बन्धनानन्तरं 'ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यद्यदाचरितं शिवे।
तव कृत्यमिति ज्ञात्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।' इति क्षमाप्य विसृजेत्। विसर्गो नाम
पूजार्थमाहूतायाः पुनः स्थानं प्रति नयनम्। एवं विसृज्य ताम् आत्मनि
हत्कमले योजयेत् स्थापयेत्। शिवमिति प्रकरणसमाप्तिद्योतकम्।।२३।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललितानवावरणपूजानाम
पञ्चमः खण्डः सम्पूर्णः ।।५।।

ललितानवावरणपूजाक्रमः १३३
खेचरी मुद्रा योगतन्त्रप्रसिद्ध एक ऐसी मुद्रा है, जिससे व्यक्ति सच्चे
अर्थ में विहङ्गम हो जाता है। श्रीमालिनीविजयोत्तरतन्त्र में इसकी विस्तृत
व्याख्या के साथ इसे परिभाषित किया गया है। इसकी विधि इस प्रकार
अपनायी जाती है—
१. पद्मासन बद्ध और पद्मासन सिद्ध होना आवश्यक है।
२. नाभि में मनरूपी अक्षेश्वर को मणिपूर में अवस्थित कर प्राण को दण्डाकार
रूप देते हुए, बिन्दु, नाद और ब्रह्मरन्ध्र 'ख' प्रदेश तक पहुँचाकर पुनः
स्पन्द रूप से शक्ति, व्यापिनी और समना तीन 'ख' पड़ावों को पार कर
'उन्मना' के चिदाकाश में पराशक्ति और परशिव के अभिमुख करने का
आचरण ही खेचर भाव को प्राप्त करना कहलाता है।
३. इससे आकाश में गतिशीलता की प्राप्ति हो जाती है।
४. इस आकाश-चारिता को परबोध-गगन संचार भी कहते हैं। त्रिशूलिनी,
करङ्किणी और ज्वालिनी आदि इसके कई भेद होते हैं।
खेचरी मुद्राबन्ध की सामरस्य दशा में अवस्थित होकर परमाम्बा का
विसर्जन करना चाहिये। यहाँ विसर्जन का अर्थ विदा करना नहीं अपि तु
स्वात्मरूपाधिष्ठान का प्रकल्पण माना जाता है। इस प्रकार के विसर्जन में सबसे
महत्त्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि, स्वात्म की सत्ता का जो आत्मकेन्द्ररूप हृदय
है, उसमें उसका योजन विशिष्ट रूप से विमृष्ट होना चाहिये। यह संयोजन ही
सामरस्य को भी सिद्ध करता है। यह एक अतीन्द्रिय दशा है। श्रीविद्या साधना
में निष्णात इस आयोजन-संयोजन से धन्य हो जाता है।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललितानवावरणपूजाक्रम नामक पञ्चम खण्ड परिपूर्ण ।।५।।
।। इति शिवम् ।।

श्यामाक्रमः
[ षष्ठः खण्डः ]
श्यामे सङ्गीतमातः परशिवनिलये मुख्यसाचिव्यभारो-
द्वाहे दक्षे दयापूरितनिजहृदये मामकीं दैन्यवृत्तिम्।
श्रीमत्सिंहासनेश्यां भववनपतितान् दावदग्धान् नमस्ते
त्रातुं पीयूषवर्षैः कथय परिकरं बद्धवत्यां विवेके ।।
श्यामोपास्तिविधिः
श्रीभगवान् परशुरामः श्यामाक्रमं विवक्षुः तस्यामुपासकाना-
मुपास्यत्वज्ञानोत्पत्तये, अङ्गीकृतश्रीविद्योपासनस्य 'यो वै स्वां
देवतामतियजते प्रस्वायै देवतायै च्यवते न परां प्राप्नोति पापीयान्
भवति' इति स्वीकृतैकदेवतौपास्तेरन्यदेवतोपासनमनिष्टजनकमिति यत्
प्रतिपादितं, तेन कलुषितचेतसां कालुष्यनिवृत्तये च आदौ तद्गुण-
स्वरूपं वर्णयति।
इयमेव महती विद्या सिंहासनेश्वरी साम्राज्ञी तस्याः प्रधान-
सचिवपदं श्यामा तत्क्रमविमृष्टिः सदा कार्या ।।१।।
इयम् वक्ष्यमाणा। महती निरवधिकमहत्त्ववती सिंहासनं परशिवः
स्वाधिष्ठानरूपत्वात् तस्य ईश्वरी तन्निष्ठसृष्टिस्थितितिरोधानसङ्कल्पनिर्वाहकत्री
साम्राज्ञी तस्याः प्रधानसचिवपदं साचिव्यरूपं धर्मपरं तस्य पदम् आश्रयः
श्यामा तस्या यः क्रमस्तस्य या विमृष्टिरनुसरणं तत्सदा कार्यम् ।।१।।

श्यामाक्रमः १३५

यह अनन्त माहात्म्यशालिनी विद्या शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित है। सिंहासन-
रूप शिव की ईश्वरी यही शक्ति है। सर्वाधिष्ठान शिव सर्वाधार हैं। अतः उन्हें
ही यहाँ सिंहासन कहा गया है। सिंह धर्मरूप भी होता है। अतः सिंह के आसन
को धर्म का आसन भी कह सकते हैं। धर्म सब का धारक है। शिव धर्ममय
हैं। ऐसे शिव की राजरानी होना ही साम्राज्ञी पद पर अधिष्ठित सिंहासनेश्वरी
होना है। ऐसी सर्वेश्वरी महादेवी के प्रधान सचिव पद अर्थात् प्रधान साचिव्य
रूप कार्य की पद अर्थात् आश्रय श्यामा है। उसी के क्रम का विमर्श अनवरत
करना चाहिये। यहाँ विमर्श करना उसके सृष्टि, स्थिति और संहार रूप कार्य
के उत्तरदायित्व के विचार और उसके अनुसरण अर्थ में प्रयुक्त है। श्रीविद्या की
उपासना में संलग्न उपासकों के उद्बोधन और उनकी श्यामा-क्रम की सतत
अनुसृति के लिये इस सूत्र की रचना की गयी है।।१।।
श्यामाया उपास्यतोपपत्तिः-ननु या साम्राज्ञी सर्वनियन्त्री
स्वतन्त्रा तां परित्यज्य किं तदनुवर्त्तिन्याः श्यामाया उपासनेनेत्या-
शङ्कायां तदुपासनमुपपादयिष्यन् प्रथमं लोकदृष्टान्तेन द्रढयति-
प्रधानद्वारा राजप्रसादनं हि न्याय्यम् ।।२।।
राजदर्शनोत्सुका आदौ प्रधानमुपसेव्य तद्द्वारा राजदर्शनं गृह्णन्ति।
तद्वदत्रापि तत्प्रधानभूतायाः श्यामायाः प्रथममुपासनं न्याय्यम्। अर्थात् यश्च
प्रधानदेवताकृपां साक्षात् सम्पादयितुमसमर्थः सः प्रथमं दीक्षां सम्पाद्य
श्रीगणपत्युपास्तिं कृत्वा ततः श्यामोपास्तिं वाराह्युपास्तिं परोपास्तिं च विधाय
तासां कृपां सम्पाद्य श्रीललितोपास्तिमारभेत। समर्थस्तु दीक्षोत्तरं गणपत्यु-
पास्त्यनन्तरं श्रीललिताक्रममारभेत ।।२।।
जिज्ञासु यह शङ्का करता है कि, सर्वनियन्त्री सर्वतन्त्रस्वतन्त्र जगदीश्वरी
को छोड़कर उसके अनुवर्त्तन में रहने वाली शक्तियों की क्या आवश्यकता?
भगवान् परशुराम उदाहरण के साथ उसका उत्तर दे रहे हैं कि, व्यवहार में यह
देखा जाता है कि, राजा के दर्शन के लिये लोग पहले मन्त्री आदि कर्मचारियों
को प्रसन्न करते हैं। उनकी कृपा से राजा का दर्शन करते हैं। उसी तरह भगवान्
परशुराम कहते हैं कि, 'पहले श्रीललिता की प्रधानसचिव श्यामा की उपासना

१३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
कर तब मुख्य उपास्या की उपासना उचित है।' व्याख्याकार अर्थ को विस्तार
देते हुए उपासकों को दो श्रेणियों में विभक्त कर रहे हैं—१. असमर्थ उपासक
और २. समर्थ उपासक। इनमें दोनों के लिये दीक्षा की पहली शर्त है। दीक्षा
के बाद दोनों के लिये गणपति की उपासना भी अनिवार्य आवश्यक है। इसके
बाद असमर्थ उपासक श्यामोपास्ति, वाराह्युपास्ति और परोपास्ति के क्रम से
ललितोपासना में लगे। वही समर्थ उपासक गणपति उपासना के तुरत बाद
श्रीललितोपासन में लगे, यही उत्तम पक्ष है।।२।।
एवमुपास्त्यधिकारिणं प्रदर्श्य उपास्तिप्रकरणं वक्तुं प्रक्रमते
ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय शयने स्थित्वैव श्रीपादुकां प्रणम्य प्राणा-
नायम्य मूलादिद्वादशान्तपर्यन्तं ज्वलन्तीं परसंविदं विचिन्त्य मनसा
मूलं त्रिशो जप्त्वा बहिर्निर्गत्य विमुक्तमलमूत्रो दन्तधावन-जिह्वा-
घर्षण-कफविमोचन-नासाशोधन-विंशतिगण्डूषान् विधाय ।।३।।
श्रीपादुकां गुरुपादुकाम्। शेषः स्पष्टार्थः।।३।।
इस सूत्र में प्रातः कृत्य के बिन्दुओं का उल्लेख है। इसे इस प्रकार जानना
और करना चाहिये—
१. ब्राह्ममुहूर्त्त में उठना चाहिये।
२. बिस्तर पर रहते हुए ही गुरुदेव की चरणपादुका को प्रणाम करना चाहिये।
३. प्राणायाम करना चाहिये।
४. मूलाधार से द्वादशान्त पर्यन्त प्रकाशमान परा संविद् का चिन्तन करना
चाहिये।
५. मूल मन्त्र का मन ही मन तीन बार जप करना चाहिये।
६. इसके बाद शय्यात्याग कर शौचाचार सम्पन्न करना चाहिये। इसमें सर्वप्रथम
मलोत्सर्ग, मूत्रोत्सर्ग, दन्तधावन, जिह्वाघर्षण, कफ-विमोचन, नासिका-
शोधन कार्य पूर्ण करने चाहिये। कम से कम २० बार कुल्ली करने से
मुख साफ हो जाता है। ये सारी क्रियायें नित्यकर्म में आती हैं।।३।।

श्यामाक्रमः १३७
मन्त्रभस्मजलस्नानेष्विष्टं विधाय वस्त्रं परिधाय ।।४।।
मन्त्रस्नानम् (दुर्गमार्गे, अशक्तस्य वा) भस्मस्नानम् (सर्वाङ्गेषु
शुद्धभस्मावलेपनं) जलस्नानम् (मुख्यस्नानम्) वस्त्रं परिधाय ।।४।।
स्नान के तीन प्रकार यहाँ दिये गये हैं—
१. मन्त्रस्नान—यह रास्ते आदि की कठिनाई को देखकर या असमर्थता में
स्वास्थ्य की दृष्टि से सम्पन्न किया जाता है।
२. भस्मस्नान— सम्प्रदायानुसार इसे करने का विधान है। गृहस्थ के लिये यह
नहीं है।
३. जलस्नान—सर्वोत्तम अशुचिता का निवारक स्नान है। इसे सभी करते हैं।
स्नान के बाद साफ शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजा में संलग्न होना चाहिये।।४।।
सन्ध्यां विधत्ते
सन्ध्यामुपास्य सवितृमण्डले देवीं सावरणां विचिन्त्य मूलेन
त्रिरर्घ्यं दत्त्वा यथाशक्ति सन्तर्प्य ।।५।।
ललिताङ्गभूतेऽपि क्रमे सर्वमाह्निकं निःशङ्कमनुष्ठेयम् ।।५।।
सन्ध्योपासना नित्य कार्य है। आह्निक कृत्य के रूप में प्रतिदिन इसे
सम्पन्न करना आवश्यक माना जाता है। सन्ध्योपासन के रूप में ही अन्त में
सूर्यमण्डल का दर्शन कर उसमें आवरणसहित माँ का चिन्तन करना चाहिये।
मूल मन्त्र से तीन बार अर्घ्य देना आवश्यक है। उसके बाद तर्पण करना
चाहिये। अर्घ्य तो मात्र तीन बार पर तर्पण शक्ति के अनुसार जितना करे, उतना
ही अच्छा माना जाता है।।५।।
सन्ध्यामुक्त्वा पूजां वक्तुमुपक्रमते
यागगृहं प्रविश्यासने आधारशक्तिकमलासनाय नम
इत्युपविश्य ।।६।।
इन तीन सूत्रों का एक क्रम है। इनके द्वारा यह निर्धारित किया गया
है कि—१. सर्वप्रथम सन्ध्या के सारे कार्य समाप्त कर यागस्थान में आकर

१३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मण्डप में प्रवेश करना चाहिये। उस समय उपासक प्रियदर्शन प्रतीत होता है।
प्रवेश भी आस्था का आसूत्रण माना जाता है।
२. प्रवेश करने के बाद आसन पर अवस्थित होने के लिये ‘आधार-
शक्तिकमलासनाय नमः’ इस मन्त्र का उच्चारण कर उसे प्रणाम कर उस पर
बैठना चाहिये।।६।।
अथ प्राणायामप्रकारमाह
समस्तप्रकटगुप्तसिद्धयोगिनीचक्रश्रीपादुकाभ्यो नम इति
शिरस्यञ्जलिमाधाय स्वगुरुपादुकापूजां च विधाय ।।७।।
तेन स्वमूर्ध्नि पुष्पाक्षतान् क्षिपेत् ।।७।।
३. तत्पश्चात् गुप्त और प्रकट सिद्धयोगिनी चक्र ‘श्रीपादुकाभ्यो नमः’ यह
मन्त्र बोलकर शिर पर अञ्जलि बाँधकर अपने गुरुदेव की पादुका को प्रणाम
करना चाहिये। गुरुपादुका की रहस्यात्मकता का सर्वदा ध्यान रखना दीक्षित
शिष्य के लिये आवश्यक है।।७।।
ऐं हः अस्त्राय फट् इत्यस्त्रमन्त्रेण अङ्गुष्ठादि-कनिष्ठान्तं
करतलयोः कूर्परयोर्देहे च व्यापकत्वेन विन्यस्य ।।८।।
व्यापकत्वलक्षणं पूर्वमुक्तम्। अङ्गुल्यादिभेदेन मन्त्रावृत्तिः। प्रतिप्रधान-
मिति न्यायात् ।।८।।
व्यापकविधि प्रत्येक साधक को गुरु द्वारा ज्ञात हो जाती है। अङ्गुष्ठ से
प्रारम्भ कर कनिष्ठापर्यन्त करतल करपृष्ठ में बाहु और हस्त के मध्य भाग
रूप कूर्पर में भी व्यापक विधि से विन्यास से शरीर में ऊर्जा की प्रतिष्ठा हो
जाती है और साधक ऊर्जस्वल व्यक्तित्व से ओत-प्रोत हो जाता है।।८।।
‘यं’ इति वायुं पिङ्गलयाऽऽकृष्य देहमुपविशोष्य, ‘रं’ इति
वायुमाकृष्य देहं दग्ध्वा, ‘वं’ इति वायुमाकृष्यामृतेन दग्धदेहभस्म
सिक्त्वा, ‘लं’ इति वायुमाकृष्य शिवचैतन्यमुत्पाद्य ।।९।।
‘यं’ इति वायुबीजत्वे शोषणकार्यक्षमत्वात्। वाय्वाकर्षणं तु तूष्णीमेव।
‘रं’ इति वह्निबीजेन देहदाहः। अमृतेन ‘वं’ इति अमृतबीजेन। दग्धभस्मसेचनं

श्यामाक्रमः १३९
पुनः शरीरोत्पादनार्थम्। 'लं' इति पार्थिवबीजेन सिक्तभस्मनि काठिन्य-
सम्पादनम्। ततस्तस्मिन् 'हंस' इति मन्त्रेण शिवचैतन्यसम्पादनम्।
एतावत्पर्यन्तं भूतशुद्धिं विधाय श्रीक्रमोक्तां प्राणप्रतिष्ठां च कुर्यात् ।।९।।
य,र,ल और व ये चारों अन्तःस्थ वर्ण कहलाते हैं। इन पर अनुस्वार
का प्रयोग इनमें आन्तरिक रूप से वर्त्तमान ऊर्जा को आन्दोलित और उच्छलित
कर देता है। इनका वैद्युतिक उल्लास इन्हें महत्त्वपूर्ण बना देता है।
अनुस्वारयुक्त 'य'कार वायुबीज, 'र'कार अग्निबीज, 'व'कार अमृत-(वरुण-
विष्णु) बीज और 'ल'कार पार्थिव-बीज बन जाता है। जैसे बीज से वृक्ष बनता
है और वृक्ष में तना, शाखा, प्रशाखा, पत्र, पुष्प और फल उत्पन्न होते हैं,
उसी तरह इन वर्ण बीजों से सम्बद्ध तत्त्वों का समुच्छलन होता रहता है।
इनके प्रयोग का सामर्थ्य साधक योगी प्राप्त कर लेता है। गुरु शिष्य को इसकी
शिक्षा देता है। इसके प्रयोग से शिष्य की भूतशुद्धि सम्पन्न हो जाती है।
इन वर्ण बीजों में ये ऊर्जायें कैसे समुद्भूत होती हैं। यह ज्ञान आवश्यक है।
यह तन्त्र का विषय है। बीजों का मानसिक संकल्प होना चाहिये। इन्हें बोलकर
नहीं कहना चाहिये।
यह प्राणचार की प्रक्रिया है। बीजमन्त्र बोलते हुए वायु का आकर्षण कैसे
होता है, इसकी विधि है। गुरु से इसे जानना चाहिये। वायु के आकर्षण में
इडा और पिङ्गला नाडियों का प्रयोग होता है। वाम नासिका वाली पिङ्गला होती
है और दक्षनासा में इडा का अवस्थान होता है।
'य' में अनुस्वार का प्रयोग वायु को ऊर्जस्वल बनाता है। इस बीज के
प्रयोग से शरीर को शुष्क बनाने का ध्यान करना चाहिये। मानो वह सूखे इन्धन
के समान हो गया हो अर्थात् जलांश का आकर्षण कर लिया गया हो।
इसके बाद अग्निबीज से देह-दाह की प्रक्रिया अपनानी चाहिये। देह
अग्निबीज के प्रयोग से भस्म हो गया है। इस ध्यान के उपरान्त वरुण बीज
से उसका सेचन करना चाहिये। अमृतसिञ्चन से पुनः शरीरोत्पादन की क्षमता
आती है। ऐसे अवसर पर ही पृथ्वी बीज का प्रयोग होना चाहिये। इससे भस्म
कठिन और शिवत्व संधारण के योग्य हो जाता है। तत्पश्चात् 'हंस' मन्त्र से
शरीर में शिवचैतन्य का सम्पादन करना चाहिये।

१४० परशुरामकल्पसूत्रम्
इस तरह शरीर शुचिता-सम्पन्न बन जाता है। भौतिकता दिव्यता से दिव्य
हो जाती है। यह प्रक्रिया एक प्रकार से भूतशुद्धि की प्रक्रिया ही मानी जाती
है। अब इसमें प्राण की प्रतिष्ठा भी कर देनी चाहिये। प्राण-प्रतिष्ठा का विधान
श्रीक्रम के अनुसार होना चाहिये॥९॥
मूलमेकश उच्चार्य, वायुमाकृष्य त्रिशः उच्चार्य, कुम्भयित्वा
सकृदुच्चार्य रेचयेत्। एवं रेचकपूरककुम्भकं त्रिधा, सप्तधा, दशधा,
षोडशधा वा विरच्य तेजोमयतनुः ।।१०।।
एकश एकवारम्। रेचकपूरककुम्भकमिति व्युत्क्रमः। क्रमस्तु पूर्वपाठानु-
सारेण। संख्यावृद्धौ फलाधिक्यम्। तेजोमयतनुिरित्यनेन प्राणायामक्रियायाः
पापशोधकत्वं सूचितम् ।।१०।।
मूल का उच्चारण इस अवसर पर मात्र एक बार करके वायु का आकर्षण
करना चाहिये। तीन बार उच्चारण कर कुम्भक और दो बार उच्चारण करते
हुए रेचन करना उचित है। सूत्र में पहले रेचक पुनः पू

श्यामाक्रमः १४१
कर लेना चाहिये। बाला मन्त्र ‘ऐं क्लीं सौः’ के साथ ही मातृका न्यास होना
चाहिये। श्रीक्रम के अनुसार ही यहाँ अर्थात् इस क्रम में भी मातृका न्यास किया
जाता है।
मूल अर्थात् मूलाधार, हृत् अर्थात् अनाहत और मुख अर्थात् विशुद्ध को
उद्बोधक प्रधान अङ्ग माना जाता है। इन तीनों स्थानों का अप्रतिम महत्त्व है।
इनमें क्रमशः रति, प्रीति और मनोभव मन्त्रों का न्यास उपासना की दृष्टि से
और भी महत्त्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया में सारा शारीरिक विज्ञान, मनोविज्ञान और
सृष्टि-विज्ञान निहित है। इसे इस तरह करना चाहिये—
१. ऐं क्लीं सौः रत्यै नमः मूलाधारे।
२. ऐं क्लीं सौः प्रीत्यै नमः हृदये। और
३. ऐं क्लीं सौः मनोभवाय नमः मुखे। इस तरह इस सूत्र के अनुसार न्यास
पूरा होता है॥११॥
मूलं सप्तदशधा खण्डयित्वा षट् ब्रह्मविले, त्रीणि ललाटे,
चत्वारि भ्रूमध्ये, दक्षवामेक्षणयोः षट् चाष्टौ, सप्तास्ये, दक्षवाम-
श्रुतिकण्ठेष्वेकेकं, दक्षवामांसयोरष्टौ च दश, दक्षवामस्तनयोरष्टा-
वष्टौ, नव नाभौ, द्विः स्वाधिष्ठाने, षडाधार एवं विन्यस्य ।।१२।।
खण्डयित्वा विभज्य। आदिमषड्वर्णानि नमोऽन्तानि उच्चार्य ब्रह्मरन्ध्रे
न्यसेत्। एवमग्रेऽपि। दक्षवामेक्षणयोः षट्चाष्टौ इत्यत्र दक्षनेत्रे षड्वर्णाः
क्रमप्राप्ता वामनेत्रे अष्टौ यथासंख्यं योज्यम्। एवमेव दक्षवामांसयोः इत्यादौ
द्रष्टव्यम्। सर्वत्र त्रितारीकुमारीयोगः कार्यः। स्वाधिष्ठानं षड्दलकमलं
गुह्यस्थानस्थम्। आधारो मूलाधारः, स पूर्वं व्याख्यातः। अयं चतुर्थो
न्यासः ।।१२।।
सूत्र के अनुसार मूल को १७ भागों में विभक्त करना चाहिये। यह
विभाजन वर्णों का विभाजन होता है। क्रमशः छः ब्रह्मरन्ध्र में, तीन ललाट में,
चार भ्रूमध्य में, छः दाहिनी आँख में, आठ बायीं आँख में, सात मुख में,
एक बायें कान में, एक दायें कान में, एक कण्ठ में, आठ दायें कन्धे पर,
दश बायें कन्धे पर, आठ-आठ दाहिने और बायें स्तनों पर, नौ नाभि में दो

१४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
स्वाधिष्ठान में, छः मूलाधार में न्यास करना चाहिये। उदाहरण रूप में इसे इस
तरह विभाजित करना चाहिये— .
१. ब्रह्मरन्ध्र—६ वर्ण ऐं क्लीं सौः 'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः' नमः ब्रह्मरन्ध्रे।
इसमें छः वर्ण न्यस्त हैं। नमः का योग भी है।
२. ललाट—३ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'ओम् नमो नमः' ललाटे। इसमें तीन
वर्णों का योग है। योग सबमें है।
३. भ्रूमध्य—४ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'भगवति' नमः भ्रूमध्ये इसमें चार वर्णों
का योग है। त्रितारी का प्रथम प्रयोग भी सबमें करना चाहिये।
४. दक्षनेत्र—६ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि नमः, दक्षनेत्रे।
५. वामनेत्र—आठ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वजनमनोहारि नमः' वामनेत्रे।
६. आस्य—सात वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वमुखरञ्जिनि' नमः आस्ये।
७. दक्षश्रोत्र—एक वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'क्लीं' दक्षश्रोत्रे।
८. वामश्रोत्र—एक वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'ह्रीं' नमः वामश्रोत्रे।
९. कण्ठ—एक वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'श्रीं' नमः, कण्ठे।
१०. दाहिना स्कन्ध—आठ वर्णों का योग ऐं क्लीं सौः 'सर्वराजवशङ्करि' नमः
दक्षस्कन्धे।
११. बायाँ स्कन्ध—दश वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वस्त्रीपुरुषवशङ्करि' नमः वाम-
स्कन्धे।
१२. हृदये—दश वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वदुष्टमृगवशङ्करि' नमः हृदये।
१३. दाहिना स्तन—आठ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वसत्त्ववशङ्करि' नमः
दक्षस्तने।
१४. बायाँ स्तन—आठ वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सर्वलोकवशङ्करि' नमः वामस्तने।
१५. नाभि—नव वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'अमुकं मे वशमानय' नमः नाभौ।
१६. स्वाधिष्ठान—दो वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'स्वाहा' नमः स्वाधिष्ठाने।
१७. मूलाधार—छः वर्णयोग ऐं क्लीं सौः 'सौः क्लीं ऐं श्रीं ह्रीं ऐं' नमः
मूलाधारे। चतुर्थ न्यास में मूलमन्त्र का इस प्रकार सत्रह विभाजन हो जाता

श्यामाक्रमः १४३
है। पूरा मूल-मन्त्र इस न्यास में आ गया है। अलग लिखने की
आवश्यकता नहीं है॥१२॥
पञ्चमं न्यासमाह
पुनराधारादिब्रह्मबिलपर्यन्तं सप्तदशखण्डानुक्तस्थानेषु
विन्यस्य ।।१३।।
पूर्वस्माद्वैलक्षण्यं मूलाधारादिस्थानवैपरीत्यमात्रम्। अयं पञ्चमो
न्यासः ।।१३।
चतुर्थ न्यास को ऊपर अनुलोम क्रम से दिखलाया गया है। इसे ही
विलोम क्रम से मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक उन्हीं खण्डों को उसी क्रम से न्यस्त
करना चाहिये। यही इस न्यास की विलक्षणता है। इस प्रकार यह पाँचवाँ न्यास
पूरा होता है॥१३॥
मन्दिरार्चनम्
अमृतोदधिमध्यरत्नद्वीपे मुक्तामालाद्यलङ्कृतं चतुर्द्वारसहितं
मण्डपं विचिन्त्य तस्य प्रागादिचतुर्द्वारिषु सां सरस्वत्यै, लां लक्ष्म्यै,
शं शङ्खनिधये, पं पद्मनिधये नमः, लां इन्द्राय वज्रहस्ताय
सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय सपरिवाराय नमः, रां अग्नये शक्ति-
हस्ताय तेजोऽधिपतये महिषवाहनाय सपरिवाराय नमः, क्षां निर्ऋतये
खड्गहस्ताय रक्षोऽधिपतये नरवाहनाय सपरिवाराय नमः, वां
वरुणाय पाशहस्ताय जलाधिपतये मकरवाहनाय सपरिवाराय नमः,
यां वायवे ध्वजहस्ताय प्राणाधिपतये रुरुवाहनाय सपरिवाराय नमः,
सां सोमाय शङ्खहस्ताय नक्षत्राधिपतये अश्ववाहनाय सपरिवाराय
नमः, हां ईशानाय त्रिशूलहस्ताय विद्याधिपतये वृषभवाहनाय
सपरिवाराय नमः, ओम् ब्रह्मणे पद्महस्ताय सत्यलोकाधिपतये
हंसवाहनाय सपरिवाराय नमः, श्रीं विष्णवे चक्रहस्ताय नागाधिपतये
गरुडवाहनाय सपरिवाराय नमः, ॐ वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः,
इत्येकादशदिक्षु एकादशदेवानर्चयेत् ।।१४।।

१४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एकादशदिशश्च चतस्रो दिशः, चतस्रोऽवान्तरदिशः, ऊर्ध्वम्, अधः
समस्तं चेति ज्ञेयाः। शेषं स्वयमूह्यम् ।।१४।।
साधक का सारा अङ्ग-प्रत्यङ्ग मन्त्रन्यास से प्रकाशमान हो रहा है। वह
प्रसन्न है। मन्त्र से दीप्त मुखमण्डल पर मान्त्रिक आभा है। उसके हृदय में भक्ति
का उद्रेक है। वह माँ के महनीय मन्दिर का चिन्तन कर रहा है। वह सोचता
है। अमृत का महोदधि लहरा रहा है। उसके बीचोंबीच रत्नों से बना एक
मणिद्वीप सुशोभित है। उसी द्वीप पर वह एक मातृमण्डप का प्रकल्पन कर
रहा है। वह मण्डप मुक्ताओं की मालाओं आदि से अलङ्कृत कर दिया गया
है। पूरी तरह सजा दिया गया है। उस मण्डप में चार द्वार हैं। साधक चारों
द्वारों की पूजा के क्रम में सर्वप्रथम पूर्व द्वार में 'सां' इस बीजमन्त्र के साथ
सरस्वती को नमस्कार करता है। इस बीजमन्त्र के पूर्व त्रितारी प्रयोग आवश्यक
है। पुनः 'लां' बीज के साथ 'लक्ष्म्यै नमः', 'शां' बीज के साथ 'शङ्खनिधये
नमः' और 'पं पद्मनिधये नमः' से सामान्य पूजन सम्पन्न करने के उपरान्त पूर्व
आदि द्वार पर नियत क्रम से पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये।
१. पूर्वादिक्-पूजन-मन्त्र—ऐं क्लीं सौः लगाकर 'लां-इन्द्राय वज्रहस्ताय
सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से इन्द्र का पूजन
करना चाहिये।
२. अग्निकोण—'ऐं क्लीं सौः रां अग्नये शक्तिहस्ताय तेजोऽधिपतये
अजवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से अग्निकोण में अग्नि की पूजा
करनी चाहिये।
३. दक्षिण—'ऐं क्लीं सौः टां यमाय दण्डहस्ताय प्रेताधिपतये महिषवाहनाय
सपरिवाराय नमः' मन्त्र से यम की पूजा की जाती है।
४. नैऋत्यकोण—ऐं क्लीं सौः बीज के साथ 'क्षां निर्ऋतये खड्गहस्ताय
रक्षोऽधिपतये नरवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से पूजा करनी
चाहिये।
५. पश्चिम—ऐं क्लीं सौः बीज लगाकर 'वां वरुणाय पाशहस्ताय जलाधिपतये
मकरवाहनाय सपरिवाराय नमः' मन्त्र से वरुण की पूजा करनी चाहिये।

श्यामाक्रमः १४५
६. वायव्यकोण—'यां वायवे' के पहले त्रितारी का प्रयोग कर 'ध्वंजहस्ताय
प्राणाधिपतये रुरुवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से वायु की पूजा
करने का विधान शास्त्रविहित है।
७. उत्तर दिशा—सोम की पूजा की जाती है। इसके मन्त्र में भी पहले त्रितारी
का प्रयोग किया जाता है। मूल मन्त्र इस प्रकार है—
“सां सोमाय शङ्खहस्ताय नक्षत्राधिपतये अश्ववाहनाय सपरिवाराय नमः”
८. ईशानकोण—ईशान भगवान् की पूजा का विधान है। मूल मन्त्र इस प्रकार
है—'ऐं ह्रीं सौः हां ईशानाय त्रिशूलहस्ताय विद्याधिपतये वृषभवाहनाय
सपरिवाराय नमः'।
९. ईशान और पूर्वदिशा के मध्य में—ब्रह्मा का अवस्थान ब्रह्माण्डमण्डल
में निर्धारित है। ब्रह्मा के मूल मन्त्र के पहले भी त्रितारी प्रयोग कर 'ॐ
ब्रह्मणे पद्महस्ताय लोकाधिपतये हंसवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से
ब्रह्मा की पूजा की जाती है।
१०. इसी तरह 'अनन्त' नामक विष्णु का अवस्थान निऋति और वरुण के
मध्य में निर्धारित है। तन्त्रशास्त्र के अनुसार अनन्त ही सितेतर सृष्टि के
कारक देव हैं। इनकी कार्यित्री देवी ही माया है। माया और अनन्त कृपा
कर साधक को शुद्ध अध्वा में प्रवेश देने के लिये 'निरोधिका' का अवरोध
हटाते हैं। इनकी पूजा भी उसी दिग्भाग में करनी चाहिये। मन्त्र इस प्रकार
है—'ऐं ह्रीं सौः श्रीं विष्णवे नमः चक्रहस्ताय नगाधिपतये गरुडवाहनाय
सपरिवाराय नमः” इस प्रकार ये दिव्य दिशाधिपति अपने-अपने दिक्-
क्षेत्रों की रक्षा करते हैं। ये दिव्य देव परमेश्वर परमशिव की रश्मियों के
प्रतीक हैं। इनकी पूजा से अर्चक की रक्षा अनायास होती रहती है। माँ
का मन्दिर विश्व के केन्द्र भाग में अवस्थित है। अतः उस मन्दिर के चारों
भागों की दिक्शक्तियों की पूजा होती है। यह मन्दिरार्चन नहीं अपितु मन्दिर
के चतुर्दिक् नियुक्त दिगधिपतियों का ही अर्चन है।
इतनी पूजा करने के बाद वास्तु देवता का स्मरण भी शास्त्रकार इस
सूत्र के माध्यम से कर रहे हैं। वास्तु शिल्प विश्वनिर्मिति का प्रतीक होता है।
एक तरह से सभी दिक्शक्तियों का केन्द्र होता है। उसके पूजन का मन्त्र—

१४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
'ॐ वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः' बोलकर उनका अर्चन करना चाहिये। यहाँ यह
ध्यान देने की बात है। इस सूत्र के अनुसार चार पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और
उत्तर मुख्य दिशायें हैं। इसी तरह अग्निकोण, नैऋत्यकोण, वायव्यकोण और
ईशानकोण मुख्य ४ कोण माने गये हैं। नैऋत्य और पश्चिम के मध्य कोण
को अनन्त कोण कहते हैं। इसी तरह ईशान और पूर्व के मध्य में ब्रह्मकोण
माना गया है। इन दोनों को अधः और ऊर्ध्व भी मान सकते हैं। इस तरह
दश दिशायें हो जाती हैं। ग्यारहवीं दिशा वास्तु केन्द्र को समस्त दिशाओं के
केन्द्र रूप में मान्य कर लेने से दिशाओं की संख्या ग्यारह हो जाती है। यह
मन्दिर के बाहर और भीतर सर्वत्र अवस्थित है॥१४॥
श्यामाक्रमे सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषयोगमाह
श्यामाक्रमे मन्त्राणामादौ त्रितारीकुमारीयोगः कुमारीयोगो वा।
त्रितारी पूर्वोक्ता कुमारी बाला शेषमुत्तानम् ॥१५॥
अर्थः स्पष्टः ॥१५॥
श्यामा-क्रम के मन्त्रों में यह आदेश है कि, आदि में त्रितारी का प्रयोग
करना अनिवार्य है। अथवा कुमारी प्रयोग भी कर सकते हैं। जहाँ तक त्रितारी
का प्रश्न है, इसके सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है (त्रितारी वाङ्माया-
कमलाः १) कुमारी बाला को कहते हैं। बाला के मन्त्र में वाग्भव, काम और
परा २ मन्त्रों का योग प्रयुक्त होता है॥१५॥
कर्तुरङ्गभूतान् काँश्चिद् गुणानाह
गन्धद्रव्येण लिप्ताङ्गस्ताम्बूलामोदितवदनः प्रसन्नमनाभूत्वा ।।१६।।
इस सूत्र की वृत्ति नहीं लिखी गयी है। पूरा सूत्र सरल है। अर्थ अनायास
ही व्यक्त हो रहा है। वस्तुतः इस पूजा में संलग्न साधक को अपने व्यक्तित्व
के उत्कर्ष का सर्वदा ध्यान रखना चाहिये। राजराजेश्वरी की अर्चना में अवस्थित
रहने की पूरी तैयारी में शरीर की साज-सज्जा का ध्यान साधक को अवश्य
रखना चाहिये। इसके लिये सुगन्धित द्रव्यों के प्रयोग, ताम्बूल से मुखशुद्धि और

श्यामाक्रमः १४७
प्रसन्न मुद्रा यह सब अत्यन्त आवश्यक कर्त्तव्य है। इस तरह पूरी तरह अपने
को योग्य बनाकर पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये।।१६।।
श्यामाचक्रलेखनप्रकारमाह
सुवर्णरजतताम्रचन्दनमण्डलेषु बिन्दुत्रिकोणपञ्चकोणाष्टदल-
षोडशदलाष्टदलचतुर्दलचतुरस्त्रात्मकं चक्रराजं विलिख्य ।।१७।।
मण्डलेषु फलकेषु। पञ्चकोणं पञ्चास्रकुण्डाकारम्। निर्माणं बिन्दुमारभ्य
निर्गमनरीत्या ज्ञेयम् ।।१७।।
यन्त्र रचना फलक पर करनी चाहिये। सूत्र में फलक के लिये भी मण्डल
शब्द का प्रयोग किया गया है। फलक के लिये १. स्वर्ण, २. रजत, ३. ताम्र
और ४. चन्दन गृहीत हैं। यन्त्र रचना मध्य बिन्दु से प्रारम्भ करनी चाहिये।
उसका क्रम इस प्रकार है—
सर्वप्रथम बिन्दु का निर्धारण करना चाहिये। उसी स्थान से माप के
अनुसार समान दूरी का ध्यान रखते हुए समत्रिकोण की रचना करनी चाहिये।
उसके बाद पाँच कोणों वाले समपञ्चभुज की रचना करनी चाहिये। समपञ्चभुज
के पञ्चकोण के चतुर्दिक् वृत्ताकार अष्टदल कमल, उसके ऊपर पुनः वृत्ताकार
षोडशदल कमल, इसके अतिरिक्त वृत्ताकार पुनः अष्टदल और उसके साथ पुनः
चतुर्दल कमलों की रचना करनी चाहिये। इसे ईशान-अग्नि, अग्नि-नैऋति-वायु-
ईशान के चतुरस्र चारों ओर के कोणों वाला चतुर्भुज निर्मित करने से यन्त्र
पूरा हो जाता है।।१७।।
सामान्यार्घ्यविधिमाह
मूलेन त्रिवारजप्तेन शुद्धजलेन चतुरस्र-वृत्त-षट्कोण-
त्रिकोणबिन्दुना प्रवेशेन मत्स्यमुद्रया विधाय, 'अं आत्मतत्त्वाय
आधारशक्तये वषट्' इत्याधारं प्रतिष्ठाप्य, धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी
ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिनी सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यवाहा
कव्यवाहेत्यग्निकला अभ्यर्च्य, उं विद्यातत्त्वाय पद्मासनाय वौषट् इति
पात्रं प्रतिष्ठाप्य, तपिनी, तापिनी धूम्रा मरीचिर्ज्वालिनी रुचिः सुषुम्ना

१४८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भोगदा विश्वा बोधिनी दारिणी क्षमा इति पात्रे सूर्यकला अभ्यर्च्य,
‘मं शिवतत्त्वाय सोममण्डलाय नमः’ इति शुद्धजलमापूर्य, अमृता
मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टि रतिः धृतिः शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना
श्रीः प्रीतिरङ्गदा पूर्णा पूर्णामृता चेति चन्द्रकला अभ्यर्च्य
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि विन्यस्य अस्त्रेण संरक्ष्य
कवचेनावकुण्ठ्य धेनुयोनी प्रदर्श्य मूलमन्त्रेण सप्तशोऽभिमन्त्र्य
तज्जलविप्रुड्भिः यागगृहं पूजोपकरणानि चावोक्ष्य ।।१८।।
प्रवेशेन प्रवेशरीत्या। मत्स्यमुद्राया मण्डलादिप्रकल्पने प्रसिद्धा।
आधारलक्षणं वर्तुलं त्रिकोणादि तन्त्रोक्तम्। नमोऽन्तैश्चतुर्थ्यन्तैरेतैर्नामभिः।
वह्निकलापूजनमाधारे। पात्रं प्रतिष्ठाप्य इति निरुक्तस्थापिताधारे। वह्न्यादि-
कलानामभ्यर्चनं पश्चिमादि-प्रादक्षिण्येन। प्रमाणं (श्रीक्रमोक्त २३ सूत्रभाष्ये)
प्राग् उक्तम्। धेनुः धेनुमुद्रा। इयं लोके बहुरूढा। योनिस्तु पूर्वमुक्ता। सप्तशः
सप्तकृत्वः। तज्जलविप्रुड्भिः सामान्यार्घ्यविप्रुड्भिः ।।१८।।
श्यामा विद्या के मूल मन्त्र को तीन बार जप लेने से जल अभिमन्त्रित
एवं शुद्ध हो जाता है। यही शुद्ध जल सामान्य अर्घ्य के लिये प्रयोग में लाना
चाहिये। जिस समय अर्चक गुरु के आदेश से याग गृह में प्रवेश करता है, उस
समय निर्धारित विधि का ही निर्देशानुसार पालन करता है। पुष्पों को चक्रादि पर
बिखेर कर सामान्यार्घ्य जल प्रोक्षण से चतुरस्र पावन और दिव्य बनता है। पुनः
षट्कोण, त्रिकोण आदि पर जल प्रक्षेप करते हुए बिन्दु तक यही क्रिया करनी
चाहिये और साधक करता है। वहीं मत्स्य मुद्रा का प्रदर्शन भी आवश्यक माना
जाता है।
इतना करने के बाद ‘अं आत्मतत्त्वाय आधारशक्तये वौषट्’ इस मन्त्र से
आधार की प्रतिष्ठा करनी चाहिये। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि, बाला बीज
का प्रयोग इस मन्त्र के पहले कर लें। आधार पर ही १. धूम्रा, २. अर्चिः,
३. ऊष्मा, ४. ज्वलिनी, ५. ज्वालिनी, ६. विस्फुलिङ्गिनी, ७. सुश्रीः,
८. सुरूपा, ९. कपिला १०. हव्यवाहा और ११. कव्यवाहा इन अग्निकलाओं
की पूजा करनी चाहिये।

श्यामाक्रमः १४९
इसके बाद पात्र की प्रतिष्ठा का विधान आता है। पात्र आधार पर ही
प्रतिष्ठापित होता है। इसका मन्त्र बाला के साथ इस प्रकार बोलकर प्रयोग करना
चाहिये—‘ऐं क्लीं सौः उं विद्यातत्त्वाय पद्माननाय वौषट्’। इस मन्त्र से पात्र की
प्रतिष्ठा कर उसमें सूर्य की कलाओं का अर्चन करना चाहिये। उनकी कलायें
१. तपिनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७.
सुषुम्ना, ८. भोगदा, ९. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी और १२. क्षमा
इस क्रम से बारह मानी जाती है। इस तरह पात्र में इन कलाओं की समन्त्रक
पूजा पूरी होती है।
अब पात्र में शुद्ध जल भर लेते हैं। उसमें रहस्यरूप से ॐकार के तृतीयाक्षर
बीज में विद्यमान शिवरूप सोमतत्त्व की पूजा बाला के साथ की जाती है। पूरा
मन्त्र बनता है—‘ऐं क्लीं सौः मं शिवतत्त्वाय सोममण्डलाय नमः’। इससे सोम
की १. अमृता, २. मानदा, ३. पूषा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति,
८. शशिनी, ९. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री १३. प्रीति,
१४. अङ्गदा, १५. पूर्णा, १६. पूर्णामृता नामक कलाओं का अभ्यर्चन होता है।
इतनी प्रक्रिया के बाद अग्निकोण और ईशानकोण में मौलि स्थान का प्रकल्पन
कर तथा नैर्ऋत्य और वायव्य में अधोभाग का प्रकल्पन कर इसी तरह इनके मध्य
में अर्थात् १. अग्नि-ईशान के मध्य पूर्व दिशा में २. असुर और वायु के मध्य
पश्चिम दिशा में एवं ३. अग्नि, असुर मध्य दक्षिण दिशा में और ४. वायव्य और
ईशान के मध्य उत्तर दिशा में भी षडङ्गविन्यास आवश्यक है। षडङ्ग १. हृदय,
२. शिर, ३. शिखा, ४. कवच, ५. नेत्रत्रय और ६. अस्त्र हैं। इनमें बाला जोड़कर
न्यास करना चाहिये। जैसे ‘ऐं क्लीं सौः हृदयाय नमः हृदयशक्तिं (पादुकां) पूजयामि
तर्पयामि नमः’ मन्त्र हृदय अङ्ग में प्रयुक्त होता है। इसी तरह सभी अङ्गों में करना
चाहिये। इसके बाद अस्त्र मन्त्र से संरक्षण, कवच मन्त्र से अवकुण्ठन, धेनु और
योनि दोनों मुद्राओं का प्रदर्शन आवश्यक है। पुनः मूल मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित
कर सामान्य अर्घ्य के जल से याग-गृह, पूजा के उपकरण आदि का सम्प्रोक्षण
करना चाहिये।।१८।।
विशेषार्घ्यविधिः
ताभिरीकाराङ्कितत्रिकोणवृत्तचतुरस्रं मण्डलं विधाय तस्मिन्
पुष्पाणि विकीर्य पूर्ववदाधारं प्रतिष्ठाप्य अग्निकला अभ्यर्च्य पात्रं

१५० परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रतिष्ठाप्य तस्मिन् पात्रे 'ह्रीं ऐं महालक्ष्मीश्वरि परमस्वामिनि ऊर्ध्व-
शून्यप्रवाहिनि सोमसूर्याग्निभक्षिणि परमाकाशभासुरे आगच्छागच्छ
विश विश पात्रं प्रतिगृह्ण प्रतिगृह्ण हुं फट् स्वाहा' इति पुष्पाञ्जलिं
विकीर्य सूर्यकला अभ्यर्च्य,
ब्रह्माण्डाखण्डसम्भृतमशेषरससम्भृतम्।
आपूरितं महापात्रं पीयूषरसमावह।।
इत्यादिममापूर्य द्वितीयं निक्षिप्य अकथादित्रीरेखाङ्कितकोणत्रये
हलक्षान् मध्ये हंसं च विलिख्य, मूलेन दशधा अभिमन्त्र्य चन्द्रकलाः
अभ्यर्च्य अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु षडङ्गानि विन्यस्य, अस्त्रेण
संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य धेनुयोनी प्रदर्शयेत् ॥१९॥
ताभिः सामान्यार्घ्योदकसम्बन्धिभिः अद्भिः, ईकाराङ्कितेति त्रिकोण-
विशेषणम्। त्रिकोणमध्ये ईकारं लिखेद् इति भावः। इदं न पूर्ववत् प्रवेशरीत्या
निर्माणामिप्रायकम्; किन्तु निर्गमरीत्या त्रिकोणमारभ्य चतुरस्रावसानपाठात्
त्रिकोणं सर्वान्तः चतुरस्रं सर्वस्माद् बहिरिति प्रायोदिष्टत्वात्। पूर्ववदिति
सामान्यार्घ्याधारवदित्यर्थः। अग्निकलाः धूम्रार्चिरादीः अभ्यर्च्य पात्रं प्रतिष्ठाप्य
इत्यत्रापि पूर्ववदनुवर्त्तते, योग्यत्वात्। तेन पात्रप्रतिष्ठापने पूर्वमन्त्रलाभः
आदिमद्वितीयौ प्रोक्तौ अत्र सूत्रे, तेन नात्र तृतीयचतुर्थपञ्चमाः, अनुक्तत्वात्।
गणपतिक्रम इव मध्यमं चेतिवत् चकारोऽस्ति, अग्रे मपञ्चकमुररीकृत्येति वा
लिङ्गमस्ति, येन तल्लाभो भवेत्। तस्माद् यावदुक्तम्। अश्च कश्च थश्च ते आदौ
यासां ताः त्रिरेखाः। अवर्णमारभ्य विसर्गान्ता एका वर्णमयी रेखा ततः
कादितान्ता, ततः थादिसान्तेति भावः। विशेषस्यानुक्तत्वात् स्वाग्रादि-
प्रादक्षिण्येने हलक्षान् त्रीन् वर्णान् त्रिषु विलिख्य मध्ये हंस इति उत्तरसंस्थं
लिखित्वा इदं सर्वं पात्रस्थद्रव्ये तत्संस्काररूपं लेखनम्। इत्थं च ईदृशलेखेन
द्रव्यसंस्कारं भावयेद् इति तदर्थः। दशधा—एतदनन्तरं आवर्त्तितमूलेनेत्यस्य
विशेषणम्। धेनुयोनी प्रदर्शयेद् इति धेनुमुद्रां प्रदर्श्य योनिमुद्रया प्रणमेत्।
एतदर्घ्यसंशोधनमिति क्वचित्पुस्तके पाठः ॥१९॥