परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १३७
मन्त्रभस्मजलस्नानेष्विष्टं विधाय वस्त्रं परिधाय ।।४।।
मन्त्रस्नानम् (दुर्गमार्गे, अशक्तस्य वा) भस्मस्नानम् (सर्वाङ्गेषु
शुद्धभस्मावलेपनं) जलस्नानम् (मुख्यस्नानम्) वस्त्रं परिधाय ।।४।।
स्नान के तीन प्रकार यहाँ दिये गये हैं—
१. मन्त्रस्नान—यह रास्ते आदि की कठिनाई को देखकर या असमर्थता में
स्वास्थ्य की दृष्टि से सम्पन्न किया जाता है।
२. भस्मस्नान— सम्प्रदायानुसार इसे करने का विधान है। गृहस्थ के लिये यह
नहीं है।
३. जलस्नान—सर्वोत्तम अशुचिता का निवारक स्नान है। इसे सभी करते हैं।
स्नान के बाद साफ शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजा में संलग्न होना चाहिये।।४।।
सन्ध्यां विधत्ते
सन्ध्यामुपास्य सवितृमण्डले देवीं सावरणां विचिन्त्य मूलेन
त्रिरर्घ्यं दत्त्वा यथाशक्ति सन्तर्प्य ।।५।।
ललिताङ्गभूतेऽपि क्रमे सर्वमाह्निकं निःशङ्कमनुष्ठेयम् ।।५।।
सन्ध्योपासना नित्य कार्य है। आह्निक कृत्य के रूप में प्रतिदिन इसे
सम्पन्न करना आवश्यक माना जाता है। सन्ध्योपासन के रूप में ही अन्त में
सूर्यमण्डल का दर्शन कर उसमें आवरणसहित माँ का चिन्तन करना चाहिये।
मूल मन्त्र से तीन बार अर्घ्य देना आवश्यक है। उसके बाद तर्पण करना
चाहिये। अर्घ्य तो मात्र तीन बार पर तर्पण शक्ति के अनुसार जितना करे, उतना
ही अच्छा माना जाता है।।५।।
सन्ध्यामुक्त्वा पूजां वक्तुमुपक्रमते
यागगृहं प्रविश्यासने आधारशक्तिकमलासनाय नम
इत्युपविश्य ।।६।।
इन तीन सूत्रों का एक क्रम है। इनके द्वारा यह निर्धारित किया गया
है कि—१. सर्वप्रथम सन्ध्या के सारे कार्य समाप्त कर यागस्थान में आकर