सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

१३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषप्रतिपत्तिमाह
शिष्टैः सार्धं चिदग्नौ हविःशेषं हुत्वा ।।२२।।
शिष्टैः सामयिकैः सह चिदग्नौ चिल्लक्षणेऽग्नौ हविःशेषं देवतोद्देशेन
संस्कृतार्पितशेषम्, हुत्वेत्यनेन तत्र केवलहोमबुद्धिरेव विधेया। इन्द्रियतृप्ति-
विषयीणीच्छा कदापि न कार्या ।।२२।।
सूत्र में शिष्ट शब्द का प्रयोग अवशिष्ट अर्थ में नहीं अपि तु उसी
अनुशासन में रहने वाले कुलाचारपालक के अर्थ में प्रयोग किया गया है। इसका
पर्याय सामयिक शब्द भी समयपालक अर्थात् कुलाचारविहित समय पालन के
लिये प्रतिबद्ध अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। ऐसे शास्त्रानुशासन के अनुयायियों
के साथ हविःशेष का चिदग्नि में हवन करना चाहिये। देवता को लक्ष्य कर
संस्कृत और अर्पित करने पर बची हुई राशि को हवि कहते हैं। इस हविःशेष
का चिदग्नि में हवन करने का विधान सूत्रकार निर्दिष्ट कर रहे हैं। होम बुद्धि
से भावनात्मक हवन करना ही लक्ष्य है। इसलिये यहाँ हवन करना प्रत्यक्ष होम
रूप हवन नहीं है। केवल चिदग्नि हवन का भावन मात्र है। इन्द्रिय-तृप्तिविषया
इच्छा की यहाँ कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिये। इस हवन में आणव, मायीय
और कार्ममलों का शमन हो जाता है। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और जीवतत्त्व का
शोधन भी हो जाता है। कुलाचार का प्रदर्शन मात्र करने में कुशल स्वेच्छाचारी
के आडम्बर से बचकर यह हवन करना चाहिये। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना
जाता है।।२२।।
देवीविसर्जनम्
खेचरीं बद्ध्वा क्षमस्वेति विसृज्य तामात्मनि संयोजयेद् इति
शिवम् ।।२३।।
खेचरीं बध्वा, बन्धनानन्तरं 'ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यद्यदाचरितं शिवे।
तव कृत्यमिति ज्ञात्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।' इति क्षमाप्य विसृजेत्। विसर्गो नाम
पूजार्थमाहूतायाः पुनः स्थानं प्रति नयनम्। एवं विसृज्य ताम् आत्मनि
हत्कमले योजयेत् स्थापयेत्। शिवमिति प्रकरणसमाप्तिद्योतकम्।।२३।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललितानवावरणपूजानाम
पञ्चमः खण्डः सम्पूर्णः ।।५।।