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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 320 में से

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पृष्ठ 183

श्यामाक्रमः १४१
कर लेना चाहिये। बाला मन्त्र ‘ऐं क्लीं सौः’ के साथ ही मातृका न्यास होना
चाहिये। श्रीक्रम के अनुसार ही यहाँ अर्थात् इस क्रम में भी मातृका न्यास किया
जाता है।
मूल अर्थात् मूलाधार, हृत् अर्थात् अनाहत और मुख अर्थात् विशुद्ध को
उद्बोधक प्रधान अङ्ग माना जाता है। इन तीनों स्थानों का अप्रतिम महत्त्व है।
इनमें क्रमशः रति, प्रीति और मनोभव मन्त्रों का न्यास उपासना की दृष्टि से
और भी महत्त्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया में सारा शारीरिक विज्ञान, मनोविज्ञान और
सृष्टि-विज्ञान निहित है। इसे इस तरह करना चाहिये—
१. ऐं क्लीं सौः रत्यै नमः मूलाधारे।
२. ऐं क्लीं सौः प्रीत्यै नमः हृदये। और
३. ऐं क्लीं सौः मनोभवाय नमः मुखे। इस तरह इस सूत्र के अनुसार न्यास
पूरा होता है॥११॥
मूलं सप्तदशधा खण्डयित्वा षट् ब्रह्मविले, त्रीणि ललाटे,
चत्वारि भ्रूमध्ये, दक्षवामेक्षणयोः षट् चाष्टौ, सप्तास्ये, दक्षवाम-
श्रुतिकण्ठेष्वेकेकं, दक्षवामांसयोरष्टौ च दश, दक्षवामस्तनयोरष्टा-
वष्टौ, नव नाभौ, द्विः स्वाधिष्ठाने, षडाधार एवं विन्यस्य ।।१२।।
खण्डयित्वा विभज्य। आदिमषड्वर्णानि नमोऽन्तानि उच्चार्य ब्रह्मरन्ध्रे
न्यसेत्। एवमग्रेऽपि। दक्षवामेक्षणयोः षट्चाष्टौ इत्यत्र दक्षनेत्रे षड्वर्णाः
क्रमप्राप्ता वामनेत्रे अष्टौ यथासंख्यं योज्यम्। एवमेव दक्षवामांसयोः इत्यादौ
द्रष्टव्यम्। सर्वत्र त्रितारीकुमारीयोगः कार्यः। स्वाधिष्ठानं षड्दलकमलं
गुह्यस्थानस्थम्। आधारो मूलाधारः, स पूर्वं व्याख्यातः। अयं चतुर्थो
न्यासः ।।१२।।
सूत्र के अनुसार मूल को १७ भागों में विभक्त करना चाहिये। यह
विभाजन वर्णों का विभाजन होता है। क्रमशः छः ब्रह्मरन्ध्र में, तीन ललाट में,
चार भ्रूमध्य में, छः दाहिनी आँख में, आठ बायीं आँख में, सात मुख में,
एक बायें कान में, एक दायें कान में, एक कण्ठ में, आठ दायें कन्धे पर,
दश बायें कन्धे पर, आठ-आठ दाहिने और बायें स्तनों पर, नौ नाभि में दो