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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 320 में से

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पृष्ठ 186

१४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एकादशदिशश्च चतस्रो दिशः, चतस्रोऽवान्तरदिशः, ऊर्ध्वम्, अधः
समस्तं चेति ज्ञेयाः। शेषं स्वयमूह्यम् ।।१४।।
साधक का सारा अङ्ग-प्रत्यङ्ग मन्त्रन्यास से प्रकाशमान हो रहा है। वह
प्रसन्न है। मन्त्र से दीप्त मुखमण्डल पर मान्त्रिक आभा है। उसके हृदय में भक्ति
का उद्रेक है। वह माँ के महनीय मन्दिर का चिन्तन कर रहा है। वह सोचता
है। अमृत का महोदधि लहरा रहा है। उसके बीचोंबीच रत्नों से बना एक
मणिद्वीप सुशोभित है। उसी द्वीप पर वह एक मातृमण्डप का प्रकल्पन कर
रहा है। वह मण्डप मुक्ताओं की मालाओं आदि से अलङ्कृत कर दिया गया
है। पूरी तरह सजा दिया गया है। उस मण्डप में चार द्वार हैं। साधक चारों
द्वारों की पूजा के क्रम में सर्वप्रथम पूर्व द्वार में 'सां' इस बीजमन्त्र के साथ
सरस्वती को नमस्कार करता है। इस बीजमन्त्र के पूर्व त्रितारी प्रयोग आवश्यक
है। पुनः 'लां' बीज के साथ 'लक्ष्म्यै नमः', 'शां' बीज के साथ 'शङ्खनिधये
नमः' और 'पं पद्मनिधये नमः' से सामान्य पूजन सम्पन्न करने के उपरान्त पूर्व
आदि द्वार पर नियत क्रम से पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये।
१. पूर्वादिक्-पूजन-मन्त्र—ऐं क्लीं सौः लगाकर 'लां-इन्द्राय वज्रहस्ताय
सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से इन्द्र का पूजन
करना चाहिये।
२. अग्निकोण—'ऐं क्लीं सौः रां अग्नये शक्तिहस्ताय तेजोऽधिपतये
अजवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से अग्निकोण में अग्नि की पूजा
करनी चाहिये।
३. दक्षिण—'ऐं क्लीं सौः टां यमाय दण्डहस्ताय प्रेताधिपतये महिषवाहनाय
सपरिवाराय नमः' मन्त्र से यम की पूजा की जाती है।
४. नैऋत्यकोण—ऐं क्लीं सौः बीज के साथ 'क्षां निर्ऋतये खड्गहस्ताय
रक्षोऽधिपतये नरवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से पूजा करनी
चाहिये।
५. पश्चिम—ऐं क्लीं सौः बीज लगाकर 'वां वरुणाय पाशहस्ताय जलाधिपतये
मकरवाहनाय सपरिवाराय नमः' मन्त्र से वरुण की पूजा करनी चाहिये।