परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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कर तब मुख्य उपास्या की उपासना उचित है।' व्याख्याकार अर्थ को विस्तार
देते हुए उपासकों को दो श्रेणियों में विभक्त कर रहे हैं—१. असमर्थ उपासक
और २. समर्थ उपासक। इनमें दोनों के लिये दीक्षा की पहली शर्त है। दीक्षा
के बाद दोनों के लिये गणपति की उपासना भी अनिवार्य आवश्यक है। इसके
बाद असमर्थ उपासक श्यामोपास्ति, वाराह्युपास्ति और परोपास्ति के क्रम से
ललितोपासना में लगे। वही समर्थ उपासक गणपति उपासना के तुरत बाद
श्रीललितोपासन में लगे, यही उत्तम पक्ष है।।२।।
एवमुपास्त्यधिकारिणं प्रदर्श्य उपास्तिप्रकरणं वक्तुं प्रक्रमते
ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय शयने स्थित्वैव श्रीपादुकां प्रणम्य प्राणा-
नायम्य मूलादिद्वादशान्तपर्यन्तं ज्वलन्तीं परसंविदं विचिन्त्य मनसा
मूलं त्रिशो जप्त्वा बहिर्निर्गत्य विमुक्तमलमूत्रो दन्तधावन-जिह्वा-
घर्षण-कफविमोचन-नासाशोधन-विंशतिगण्डूषान् विधाय ।।३।।
श्रीपादुकां गुरुपादुकाम्। शेषः स्पष्टार्थः।।३।।
इस सूत्र में प्रातः कृत्य के बिन्दुओं का उल्लेख है। इसे इस प्रकार जानना
और करना चाहिये—
१. ब्राह्ममुहूर्त्त में उठना चाहिये।
२. बिस्तर पर रहते हुए ही गुरुदेव की चरणपादुका को प्रणाम करना चाहिये।
३. प्राणायाम करना चाहिये।
४. मूलाधार से द्वादशान्त पर्यन्त प्रकाशमान परा संविद् का चिन्तन करना
चाहिये।
५. मूल मन्त्र का मन ही मन तीन बार जप करना चाहिये।
६. इसके बाद शय्यात्याग कर शौचाचार सम्पन्न करना चाहिये। इसमें सर्वप्रथम
मलोत्सर्ग, मूत्रोत्सर्ग, दन्तधावन, जिह्वाघर्षण, कफ-विमोचन, नासिका-
शोधन कार्य पूर्ण करने चाहिये। कम से कम २० बार कुल्ली करने से
मुख साफ हो जाता है। ये सारी क्रियायें नित्यकर्म में आती हैं।।३।।