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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 320 में से

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पृष्ठ 180

१३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मण्डप में प्रवेश करना चाहिये। उस समय उपासक प्रियदर्शन प्रतीत होता है।
प्रवेश भी आस्था का आसूत्रण माना जाता है।
२. प्रवेश करने के बाद आसन पर अवस्थित होने के लिये ‘आधार-
शक्तिकमलासनाय नमः’ इस मन्त्र का उच्चारण कर उसे प्रणाम कर उस पर
बैठना चाहिये।।६।।
अथ प्राणायामप्रकारमाह
समस्तप्रकटगुप्तसिद्धयोगिनीचक्रश्रीपादुकाभ्यो नम इति
शिरस्यञ्जलिमाधाय स्वगुरुपादुकापूजां च विधाय ।।७।।
तेन स्वमूर्ध्नि पुष्पाक्षतान् क्षिपेत् ।।७।।
३. तत्पश्चात् गुप्त और प्रकट सिद्धयोगिनी चक्र ‘श्रीपादुकाभ्यो नमः’ यह
मन्त्र बोलकर शिर पर अञ्जलि बाँधकर अपने गुरुदेव की पादुका को प्रणाम
करना चाहिये। गुरुपादुका की रहस्यात्मकता का सर्वदा ध्यान रखना दीक्षित
शिष्य के लिये आवश्यक है।।७।।
ऐं हः अस्त्राय फट् इत्यस्त्रमन्त्रेण अङ्गुष्ठादि-कनिष्ठान्तं
करतलयोः कूर्परयोर्देहे च व्यापकत्वेन विन्यस्य ।।८।।
व्यापकत्वलक्षणं पूर्वमुक्तम्। अङ्गुल्यादिभेदेन मन्त्रावृत्तिः। प्रतिप्रधान-
मिति न्यायात् ।।८।।
व्यापकविधि प्रत्येक साधक को गुरु द्वारा ज्ञात हो जाती है। अङ्गुष्ठ से
प्रारम्भ कर कनिष्ठापर्यन्त करतल करपृष्ठ में बाहु और हस्त के मध्य भाग
रूप कूर्पर में भी व्यापक विधि से विन्यास से शरीर में ऊर्जा की प्रतिष्ठा हो
जाती है और साधक ऊर्जस्वल व्यक्तित्व से ओत-प्रोत हो जाता है।।८।।
‘यं’ इति वायुं पिङ्गलयाऽऽकृष्य देहमुपविशोष्य, ‘रं’ इति
वायुमाकृष्य देहं दग्ध्वा, ‘वं’ इति वायुमाकृष्यामृतेन दग्धदेहभस्म
सिक्त्वा, ‘लं’ इति वायुमाकृष्य शिवचैतन्यमुत्पाद्य ।।९।।
‘यं’ इति वायुबीजत्वे शोषणकार्यक्षमत्वात्। वाय्वाकर्षणं तु तूष्णीमेव।
‘रं’ इति वह्निबीजेन देहदाहः। अमृतेन ‘वं’ इति अमृतबीजेन। दग्धभस्मसेचनं