परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललितानवावरणपूजाक्रमः १३१
स्तोत्र विभिन्न प्रकार की स्तुतियों के लिये प्रयुक्त शब्द है। वामकेश्वर-
तन्त्र के अनुसार गणेश, ग्रह-नक्षत्र आदि देवों की स्तुति, सहस्रनाम पाठ,
अपराध-क्षमापन स्तोत्र और अवकाश रहने पर 'सप्तशती' का पाठ भी किया
जा सकता है। इस तरह माँ परमाम्बा को सन्तुष्ट करना चाहिये।।२०।।
शक्तिपूजा
तद्रूपिणीमेकां शक्तिं बाल्योपचारैः सम्पूज्य तां मपञ्चकेन
सन्तर्प्य ।।२१।।
तद्रूपिणीं त्रिपुरसुन्दरीरूपिणीम्। एकवचनेन अद्वितीयां सौन्दर्येणेत्यर्थः।
बालया मन्त्रेण। उपचारैः यथासम्भवैः। मपञ्चकेन सन्तर्पणं तस्या इच्छायां
सत्यां ज्ञेयम्। अयं भावः सन्तर्प्येत्यनेन ज्ञापितः। तर्पणं तृप्तिसम्पादनम्।
शक्तिं सुवासिनीम् ।।२१।।
शक्तिपूजा का यह सन्दर्भ अपना स्वतन्त्र महत्त्व रखता है। शक्ति की पूजा
ही तो अब तक की गयी है। यहाँ इसके लिये तद्रूपिणीं लिखा है। तत् शब्द
माँ त्रिपुरसुन्दरी का वाचक है। उसके समान अनिन्द्य-सौन्दर्य-समन्विता, सर्व-
सुलक्षणा एक ऐसी नारी को हम 'सुवासिनी' शब्द से अभिहित कर सकते हैं।
'बाला' की पूजा में जो उपचार प्रयुक्त होते हैं। उन सभी उपचारों से
उसकी पूजा करनी चाहिये। बालात्रिपुरसुन्दरी का मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः' माना जाता
है। इसी मन्त्र से उस सुवासिनी को उपचारित करना श्रेयस्कर होता है। उसकी
दीक्षा आदि का विचार करने के उपरान्त गुरु यह सब विधि सम्पन्न करे, यही
उचित है।
मपञ्चक से सन्तर्पण के अधिकारी गुरु को ही यह विधि सम्पन्न करनी
चाहिये। इसमें सुवासिनी की इच्छा का भी ध्यान रखना चाहिये। दीक्षाविधि के
सूत्र २४ में मपञ्चक का प्रकरण आया हुआ है। इसके अप्राप्त होने की अवस्था
में प्रतिनिधि पदार्थ से यह क्रम सम्पन्न करना चाहिये।
कुलार्णवतन्त्र के अनुसार मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये मपञ्चक
कहलाते हैं। इन्हें महापातकनाशन माना जाता है। सूत्रकार द्वारा सूत्रोक्त इस विधि
के सन्दर्भ पर पूर्ण विचार करना आवश्यक है।।२१।।