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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 320 में से

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ललितानवावरणपूजाक्रमः १३३
खेचरी मुद्रा योगतन्त्रप्रसिद्ध एक ऐसी मुद्रा है, जिससे व्यक्ति सच्चे
अर्थ में विहङ्गम हो जाता है। श्रीमालिनीविजयोत्तरतन्त्र में इसकी विस्तृत
व्याख्या के साथ इसे परिभाषित किया गया है। इसकी विधि इस प्रकार
अपनायी जाती है—
१. पद्मासन बद्ध और पद्मासन सिद्ध होना आवश्यक है।
२. नाभि में मनरूपी अक्षेश्वर को मणिपूर में अवस्थित कर प्राण को दण्डाकार
रूप देते हुए, बिन्दु, नाद और ब्रह्मरन्ध्र 'ख' प्रदेश तक पहुँचाकर पुनः
स्पन्द रूप से शक्ति, व्यापिनी और समना तीन 'ख' पड़ावों को पार कर
'उन्मना' के चिदाकाश में पराशक्ति और परशिव के अभिमुख करने का
आचरण ही खेचर भाव को प्राप्त करना कहलाता है।
३. इससे आकाश में गतिशीलता की प्राप्ति हो जाती है।
४. इस आकाश-चारिता को परबोध-गगन संचार भी कहते हैं। त्रिशूलिनी,
करङ्किणी और ज्वालिनी आदि इसके कई भेद होते हैं।
खेचरी मुद्राबन्ध की सामरस्य दशा में अवस्थित होकर परमाम्बा का
विसर्जन करना चाहिये। यहाँ विसर्जन का अर्थ विदा करना नहीं अपि तु
स्वात्मरूपाधिष्ठान का प्रकल्पण माना जाता है। इस प्रकार के विसर्जन में सबसे
महत्त्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि, स्वात्म की सत्ता का जो आत्मकेन्द्ररूप हृदय
है, उसमें उसका योजन विशिष्ट रूप से विमृष्ट होना चाहिये। यह संयोजन ही
सामरस्य को भी सिद्ध करता है। यह एक अतीन्द्रिय दशा है। श्रीविद्या साधना
में निष्णात इस आयोजन-संयोजन से धन्य हो जाता है।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललितानवावरणपूजाक्रम नामक पञ्चम खण्ड परिपूर्ण ।।५।।
।। इति शिवम् ।।