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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 320 में से

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पृष्ठ 177

श्यामाक्रमः १३५

यह अनन्त माहात्म्यशालिनी विद्या शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित है। सिंहासन-
रूप शिव की ईश्वरी यही शक्ति है। सर्वाधिष्ठान शिव सर्वाधार हैं। अतः उन्हें
ही यहाँ सिंहासन कहा गया है। सिंह धर्मरूप भी होता है। अतः सिंह के आसन
को धर्म का आसन भी कह सकते हैं। धर्म सब का धारक है। शिव धर्ममय
हैं। ऐसे शिव की राजरानी होना ही साम्राज्ञी पद पर अधिष्ठित सिंहासनेश्वरी
होना है। ऐसी सर्वेश्वरी महादेवी के प्रधान सचिव पद अर्थात् प्रधान साचिव्य
रूप कार्य की पद अर्थात् आश्रय श्यामा है। उसी के क्रम का विमर्श अनवरत
करना चाहिये। यहाँ विमर्श करना उसके सृष्टि, स्थिति और संहार रूप कार्य
के उत्तरदायित्व के विचार और उसके अनुसरण अर्थ में प्रयुक्त है। श्रीविद्या की
उपासना में संलग्न उपासकों के उद्बोधन और उनकी श्यामा-क्रम की सतत
अनुसृति के लिये इस सूत्र की रचना की गयी है।।१।।
श्यामाया उपास्यतोपपत्तिः-ननु या साम्राज्ञी सर्वनियन्त्री
स्वतन्त्रा तां परित्यज्य किं तदनुवर्त्तिन्याः श्यामाया उपासनेनेत्या-
शङ्कायां तदुपासनमुपपादयिष्यन् प्रथमं लोकदृष्टान्तेन द्रढयति-
प्रधानद्वारा राजप्रसादनं हि न्याय्यम् ।।२।।
राजदर्शनोत्सुका आदौ प्रधानमुपसेव्य तद्द्वारा राजदर्शनं गृह्णन्ति।
तद्वदत्रापि तत्प्रधानभूतायाः श्यामायाः प्रथममुपासनं न्याय्यम्। अर्थात् यश्च
प्रधानदेवताकृपां साक्षात् सम्पादयितुमसमर्थः सः प्रथमं दीक्षां सम्पाद्य
श्रीगणपत्युपास्तिं कृत्वा ततः श्यामोपास्तिं वाराह्युपास्तिं परोपास्तिं च विधाय
तासां कृपां सम्पाद्य श्रीललितोपास्तिमारभेत। समर्थस्तु दीक्षोत्तरं गणपत्यु-
पास्त्यनन्तरं श्रीललिताक्रममारभेत ।।२।।
जिज्ञासु यह शङ्का करता है कि, सर्वनियन्त्री सर्वतन्त्रस्वतन्त्र जगदीश्वरी
को छोड़कर उसके अनुवर्त्तन में रहने वाली शक्तियों की क्या आवश्यकता?
भगवान् परशुराम उदाहरण के साथ उसका उत्तर दे रहे हैं कि, व्यवहार में यह
देखा जाता है कि, राजा के दर्शन के लिये लोग पहले मन्त्री आदि कर्मचारियों
को प्रसन्न करते हैं। उनकी कृपा से राजा का दर्शन करते हैं। उसी तरह भगवान्
परशुराम कहते हैं कि, 'पहले श्रीललिता की प्रधानसचिव श्यामा की उपासना