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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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१४० परशुरामकल्पसूत्रम्
इस तरह शरीर शुचिता-सम्पन्न बन जाता है। भौतिकता दिव्यता से दिव्य
हो जाती है। यह प्रक्रिया एक प्रकार से भूतशुद्धि की प्रक्रिया ही मानी जाती
है। अब इसमें प्राण की प्रतिष्ठा भी कर देनी चाहिये। प्राण-प्रतिष्ठा का विधान
श्रीक्रम के अनुसार होना चाहिये॥९॥
मूलमेकश उच्चार्य, वायुमाकृष्य त्रिशः उच्चार्य, कुम्भयित्वा
सकृदुच्चार्य रेचयेत्। एवं रेचकपूरककुम्भकं त्रिधा, सप्तधा, दशधा,
षोडशधा वा विरच्य तेजोमयतनुः ।।१०।।
एकश एकवारम्। रेचकपूरककुम्भकमिति व्युत्क्रमः। क्रमस्तु पूर्वपाठानु-
सारेण। संख्यावृद्धौ फलाधिक्यम्। तेजोमयतनुिरित्यनेन प्राणायामक्रियायाः
पापशोधकत्वं सूचितम् ।।१०।।
मूल का उच्चारण इस अवसर पर मात्र एक बार करके वायु का आकर्षण
करना चाहिये। तीन बार उच्चारण कर कुम्भक और दो बार उच्चारण करते
हुए रेचन करना उचित है। सूत्र में पहले रेचक पुनः पू