परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १४७
प्रसन्न मुद्रा यह सब अत्यन्त आवश्यक कर्त्तव्य है। इस तरह पूरी तरह अपने
को योग्य बनाकर पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये।।१६।।
श्यामाचक्रलेखनप्रकारमाह
सुवर्णरजतताम्रचन्दनमण्डलेषु बिन्दुत्रिकोणपञ्चकोणाष्टदल-
षोडशदलाष्टदलचतुर्दलचतुरस्त्रात्मकं चक्रराजं विलिख्य ।।१७।।
मण्डलेषु फलकेषु। पञ्चकोणं पञ्चास्रकुण्डाकारम्। निर्माणं बिन्दुमारभ्य
निर्गमनरीत्या ज्ञेयम् ।।१७।।
यन्त्र रचना फलक पर करनी चाहिये। सूत्र में फलक के लिये भी मण्डल
शब्द का प्रयोग किया गया है। फलक के लिये १. स्वर्ण, २. रजत, ३. ताम्र
और ४. चन्दन गृहीत हैं। यन्त्र रचना मध्य बिन्दु से प्रारम्भ करनी चाहिये।
उसका क्रम इस प्रकार है—
सर्वप्रथम बिन्दु का निर्धारण करना चाहिये। उसी स्थान से माप के
अनुसार समान दूरी का ध्यान रखते हुए समत्रिकोण की रचना करनी चाहिये।
उसके बाद पाँच कोणों वाले समपञ्चभुज की रचना करनी चाहिये। समपञ्चभुज
के पञ्चकोण के चतुर्दिक् वृत्ताकार अष्टदल कमल, उसके ऊपर पुनः वृत्ताकार
षोडशदल कमल, इसके अतिरिक्त वृत्ताकार पुनः अष्टदल और उसके साथ पुनः
चतुर्दल कमलों की रचना करनी चाहिये। इसे ईशान-अग्नि, अग्नि-नैऋति-वायु-
ईशान के चतुरस्र चारों ओर के कोणों वाला चतुर्भुज निर्मित करने से यन्त्र
पूरा हो जाता है।।१७।।
सामान्यार्घ्यविधिमाह
मूलेन त्रिवारजप्तेन शुद्धजलेन चतुरस्र-वृत्त-षट्कोण-
त्रिकोणबिन्दुना प्रवेशेन मत्स्यमुद्रया विधाय, 'अं आत्मतत्त्वाय
आधारशक्तये वषट्' इत्याधारं प्रतिष्ठाप्य, धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी
ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिनी सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यवाहा
कव्यवाहेत्यग्निकला अभ्यर्च्य, उं विद्यातत्त्वाय पद्मासनाय वौषट् इति
पात्रं प्रतिष्ठाप्य, तपिनी, तापिनी धूम्रा मरीचिर्ज्वालिनी रुचिः सुषुम्ना