परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १४५
६. वायव्यकोण—'यां वायवे' के पहले त्रितारी का प्रयोग कर 'ध्वंजहस्ताय
प्राणाधिपतये रुरुवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से वायु की पूजा
करने का विधान शास्त्रविहित है।
७. उत्तर दिशा—सोम की पूजा की जाती है। इसके मन्त्र में भी पहले त्रितारी
का प्रयोग किया जाता है। मूल मन्त्र इस प्रकार है—
“सां सोमाय शङ्खहस्ताय नक्षत्राधिपतये अश्ववाहनाय सपरिवाराय नमः”
८. ईशानकोण—ईशान भगवान् की पूजा का विधान है। मूल मन्त्र इस प्रकार
है—'ऐं ह्रीं सौः हां ईशानाय त्रिशूलहस्ताय विद्याधिपतये वृषभवाहनाय
सपरिवाराय नमः'।
९. ईशान और पूर्वदिशा के मध्य में—ब्रह्मा का अवस्थान ब्रह्माण्डमण्डल
में निर्धारित है। ब्रह्मा के मूल मन्त्र के पहले भी त्रितारी प्रयोग कर 'ॐ
ब्रह्मणे पद्महस्ताय लोकाधिपतये हंसवाहनाय सपरिवाराय नमः' इस मन्त्र से
ब्रह्मा की पूजा की जाती है।
१०. इसी तरह 'अनन्त' नामक विष्णु का अवस्थान निऋति और वरुण के
मध्य में निर्धारित है। तन्त्रशास्त्र के अनुसार अनन्त ही सितेतर सृष्टि के
कारक देव हैं। इनकी कार्यित्री देवी ही माया है। माया और अनन्त कृपा
कर साधक को शुद्ध अध्वा में प्रवेश देने के लिये 'निरोधिका' का अवरोध
हटाते हैं। इनकी पूजा भी उसी दिग्भाग में करनी चाहिये। मन्त्र इस प्रकार
है—'ऐं ह्रीं सौः श्रीं विष्णवे नमः चक्रहस्ताय नगाधिपतये गरुडवाहनाय
सपरिवाराय नमः” इस प्रकार ये दिव्य दिशाधिपति अपने-अपने दिक्-
क्षेत्रों की रक्षा करते हैं। ये दिव्य देव परमेश्वर परमशिव की रश्मियों के
प्रतीक हैं। इनकी पूजा से अर्चक की रक्षा अनायास होती रहती है। माँ
का मन्दिर विश्व के केन्द्र भाग में अवस्थित है। अतः उस मन्दिर के चारों
भागों की दिक्शक्तियों की पूजा होती है। यह मन्दिरार्चन नहीं अपितु मन्दिर
के चतुर्दिक् नियुक्त दिगधिपतियों का ही अर्चन है।
इतनी पूजा करने के बाद वास्तु देवता का स्मरण भी शास्त्रकार इस
सूत्र के माध्यम से कर रहे हैं। वास्तु शिल्प विश्वनिर्मिति का प्रतीक होता है।
एक तरह से सभी दिक्शक्तियों का केन्द्र होता है। उसके पूजन का मन्त्र—