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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 320 में से

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श्यामाक्रमः १४९
इसके बाद पात्र की प्रतिष्ठा का विधान आता है। पात्र आधार पर ही
प्रतिष्ठापित होता है। इसका मन्त्र बाला के साथ इस प्रकार बोलकर प्रयोग करना
चाहिये—‘ऐं क्लीं सौः उं विद्यातत्त्वाय पद्माननाय वौषट्’। इस मन्त्र से पात्र की
प्रतिष्ठा कर उसमें सूर्य की कलाओं का अर्चन करना चाहिये। उनकी कलायें
१. तपिनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७.
सुषुम्ना, ८. भोगदा, ९. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी और १२. क्षमा
इस क्रम से बारह मानी जाती है। इस तरह पात्र में इन कलाओं की समन्त्रक
पूजा पूरी होती है।
अब पात्र में शुद्ध जल भर लेते हैं। उसमें रहस्यरूप से ॐकार के तृतीयाक्षर
बीज में विद्यमान शिवरूप सोमतत्त्व की पूजा बाला के साथ की जाती है। पूरा
मन्त्र बनता है—‘ऐं क्लीं सौः मं शिवतत्त्वाय सोममण्डलाय नमः’। इससे सोम
की १. अमृता, २. मानदा, ३. पूषा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति,
८. शशिनी, ९. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री १३. प्रीति,
१४. अङ्गदा, १५. पूर्णा, १६. पूर्णामृता नामक कलाओं का अभ्यर्चन होता है।
इतनी प्रक्रिया के बाद अग्निकोण और ईशानकोण में मौलि स्थान का प्रकल्पन
कर तथा नैर्ऋत्य और वायव्य में अधोभाग का प्रकल्पन कर इसी तरह इनके मध्य
में अर्थात् १. अग्नि-ईशान के मध्य पूर्व दिशा में २. असुर और वायु के मध्य
पश्चिम दिशा में एवं ३. अग्नि, असुर मध्य दक्षिण दिशा में और ४. वायव्य और
ईशान के मध्य उत्तर दिशा में भी षडङ्गविन्यास आवश्यक है। षडङ्ग १. हृदय,
२. शिर, ३. शिखा, ४. कवच, ५. नेत्रत्रय और ६. अस्त्र हैं। इनमें बाला जोड़कर
न्यास करना चाहिये। जैसे ‘ऐं क्लीं सौः हृदयाय नमः हृदयशक्तिं (पादुकां) पूजयामि
तर्पयामि नमः’ मन्त्र हृदय अङ्ग में प्रयुक्त होता है। इसी तरह सभी अङ्गों में करना
चाहिये। इसके बाद अस्त्र मन्त्र से संरक्षण, कवच मन्त्र से अवकुण्ठन, धेनु और
योनि दोनों मुद्राओं का प्रदर्शन आवश्यक है। पुनः मूल मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित
कर सामान्य अर्घ्य के जल से याग-गृह, पूजा के उपकरण आदि का सम्प्रोक्षण
करना चाहिये।।१८।।
विशेषार्घ्यविधिः
ताभिरीकाराङ्कितत्रिकोणवृत्तचतुरस्रं मण्डलं विधाय तस्मिन्
पुष्पाणि विकीर्य पूर्ववदाधारं प्रतिष्ठाप्य अग्निकला अभ्यर्च्य पात्रं