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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 320 में से

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पृष्ठ 188

१४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
'ॐ वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः' बोलकर उनका अर्चन करना चाहिये। यहाँ यह
ध्यान देने की बात है। इस सूत्र के अनुसार चार पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और
उत्तर मुख्य दिशायें हैं। इसी तरह अग्निकोण, नैऋत्यकोण, वायव्यकोण और
ईशानकोण मुख्य ४ कोण माने गये हैं। नैऋत्य और पश्चिम के मध्य कोण
को अनन्त कोण कहते हैं। इसी तरह ईशान और पूर्व के मध्य में ब्रह्मकोण
माना गया है। इन दोनों को अधः और ऊर्ध्व भी मान सकते हैं। इस तरह
दश दिशायें हो जाती हैं। ग्यारहवीं दिशा वास्तु केन्द्र को समस्त दिशाओं के
केन्द्र रूप में मान्य कर लेने से दिशाओं की संख्या ग्यारह हो जाती है। यह
मन्दिर के बाहर और भीतर सर्वत्र अवस्थित है॥१४॥
श्यामाक्रमे सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषयोगमाह
श्यामाक्रमे मन्त्राणामादौ त्रितारीकुमारीयोगः कुमारीयोगो वा।
त्रितारी पूर्वोक्ता कुमारी बाला शेषमुत्तानम् ॥१५॥
अर्थः स्पष्टः ॥१५॥
श्यामा-क्रम के मन्त्रों में यह आदेश है कि, आदि में त्रितारी का प्रयोग
करना अनिवार्य है। अथवा कुमारी प्रयोग भी कर सकते हैं। जहाँ तक त्रितारी
का प्रश्न है, इसके सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है (त्रितारी वाङ्माया-
कमलाः १) कुमारी बाला को कहते हैं। बाला के मन्त्र में वाग्भव, काम और
परा २ मन्त्रों का योग प्रयुक्त होता है॥१५॥
कर्तुरङ्गभूतान् काँश्चिद् गुणानाह
गन्धद्रव्येण लिप्ताङ्गस्ताम्बूलामोदितवदनः प्रसन्नमनाभूत्वा ।।१६।।
इस सूत्र की वृत्ति नहीं लिखी गयी है। पूरा सूत्र सरल है। अर्थ अनायास
ही व्यक्त हो रहा है। वस्तुतः इस पूजा में संलग्न साधक को अपने व्यक्तित्व
के उत्कर्ष का सर्वदा ध्यान रखना चाहिये। राजराजेश्वरी की अर्चना में अवस्थित
रहने की पूरी तैयारी में शरीर की साज-सज्जा का ध्यान साधक को अवश्य
रखना चाहिये। इसके लिये सुगन्धित द्रव्यों के प्रयोग, ताम्बूल से मुखशुद्धि और