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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 320 में से

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पृष्ठ 190

१४८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भोगदा विश्वा बोधिनी दारिणी क्षमा इति पात्रे सूर्यकला अभ्यर्च्य,
‘मं शिवतत्त्वाय सोममण्डलाय नमः’ इति शुद्धजलमापूर्य, अमृता
मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टि रतिः धृतिः शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना
श्रीः प्रीतिरङ्गदा पूर्णा पूर्णामृता चेति चन्द्रकला अभ्यर्च्य
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि विन्यस्य अस्त्रेण संरक्ष्य
कवचेनावकुण्ठ्य धेनुयोनी प्रदर्श्य मूलमन्त्रेण सप्तशोऽभिमन्त्र्य
तज्जलविप्रुड्भिः यागगृहं पूजोपकरणानि चावोक्ष्य ।।१८।।
प्रवेशेन प्रवेशरीत्या। मत्स्यमुद्राया मण्डलादिप्रकल्पने प्रसिद्धा।
आधारलक्षणं वर्तुलं त्रिकोणादि तन्त्रोक्तम्। नमोऽन्तैश्चतुर्थ्यन्तैरेतैर्नामभिः।
वह्निकलापूजनमाधारे। पात्रं प्रतिष्ठाप्य इति निरुक्तस्थापिताधारे। वह्न्यादि-
कलानामभ्यर्चनं पश्चिमादि-प्रादक्षिण्येन। प्रमाणं (श्रीक्रमोक्त २३ सूत्रभाष्ये)
प्राग् उक्तम्। धेनुः धेनुमुद्रा। इयं लोके बहुरूढा। योनिस्तु पूर्वमुक्ता। सप्तशः
सप्तकृत्वः। तज्जलविप्रुड्भिः सामान्यार्घ्यविप्रुड्भिः ।।१८।।
श्यामा विद्या के मूल मन्त्र को तीन बार जप लेने से जल अभिमन्त्रित
एवं शुद्ध हो जाता है। यही शुद्ध जल सामान्य अर्घ्य के लिये प्रयोग में लाना
चाहिये। जिस समय अर्चक गुरु के आदेश से याग गृह में प्रवेश करता है, उस
समय निर्धारित विधि का ही निर्देशानुसार पालन करता है। पुष्पों को चक्रादि पर
बिखेर कर सामान्यार्घ्य जल प्रोक्षण से चतुरस्र पावन और दिव्य बनता है। पुनः
षट्कोण, त्रिकोण आदि पर जल प्रक्षेप करते हुए बिन्दु तक यही क्रिया करनी
चाहिये और साधक करता है। वहीं मत्स्य मुद्रा का प्रदर्शन भी आवश्यक माना
जाता है।
इतना करने के बाद ‘अं आत्मतत्त्वाय आधारशक्तये वौषट्’ इस मन्त्र से
आधार की प्रतिष्ठा करनी चाहिये। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि, बाला बीज
का प्रयोग इस मन्त्र के पहले कर लें। आधार पर ही १. धूम्रा, २. अर्चिः,
३. ऊष्मा, ४. ज्वलिनी, ५. ज्वालिनी, ६. विस्फुलिङ्गिनी, ७. सुश्रीः,
८. सुरूपा, ९. कपिला १०. हव्यवाहा और ११. कव्यवाहा इन अग्निकलाओं
की पूजा करनी चाहिये।