सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

१०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
९. मल्लिकामालती—आदि छः ऋतुओं में होने वाले पुष्पों के ये प्रतीक
संज्ञा शब्द हैं।
१०. सीमन्त—'माँड'संज्ञक शिर पर दोनों ओर केश करने से उभरी सीधी रेखा
जो मध्य में होती है।
११. तिलकरत्न—तिलक के स्थान पर रत्न।
१२. पाली—कपोलपाली को सजाने वाली कान की बाली।
१३. अधरयावक—होठों के रँगने का रंग, महावर।
१४. प्रथमभूषण—मङ्गल-सूत्र।
१५. पदक—कण्ठभूषण।
१६. महापदक—कण्ठा।
१७. मुक्तावलि—मुक्ता-माला।
१८. एकावलि—२७ मणियों की बाली या माला।
१९. छत्रवीर—दो भागों में बाँटने वाली छाती की माला।
२०. केयूर—बाहु के कड़े।
२१. वलयावलि—माला।
२२. ऊर्मिकावलि—घुँघुरुओं वाली माला।
२३. काञ्ची—करधनी।
२४. सौभाग्याभरण—जघनों पर लटकने वाले झुमके।
२५. पादकटक आदि—पैर के आभूषण आयुध—
१. पुण्ड्रेक्षु—गन्ना।
२. पुष्पबाण—पुष्प के बने पाँच फूलों में काम बाण।
३. पाश—बाँधने का रज्जु।
४. अंकुश—अंकुश (बरछी)।
आधार वस्तु—
१. पादुका—दो खड़ाऊँ
२. महाचक्र—जहाँ देवियों के साथ माँ आरोहण करती हैं।

ललिताक्रमः १०५
३. कामेश्वराङ्कपर्यङ्क—शक्ति की पर्यङ्क शक्तिमान् की गोद ही होती है।
पेय-
४. अमृतासव—द्राक्षासव मिला विशिष्ट मद्य।
५. आचमनीय—जल, जिसे विशेष रूप से माँ के पीने के लिये बनाया
जाता है।
उल्लासक साज-सज्जा-
१. हास्य और विनोद के साधन।
२. आरार्तिक्य—आरती।
३. छत्र, चामर आदि।
शृङ्गारसाधन-
१. दर्पण—मुख देखने का साधन (मुकुर)।
२. तालवृन्त—व्यजन। पञ्चोपचार में इसकी भी आवश्यकता होती है।
३. १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप, ५. नैवेद्य।
ये सब मिलाकर चौंसठ उपचार होते हैं। त्रितारी के साथ द्वितीयान्त
संज्ञावाचक उपचारों के नाम बोलकर 'कल्पयामि नमः' यह मन्त्रात्मक प्रयोग
करना चाहिये॥५॥
नवमुद्राप्रदर्शनम्
नवमुद्राश्च प्रदर्श्य ॥६॥
नवमुद्राः संक्षोभिण्यादि-योन्यन्ताः। चकारेण दशमीं त्रिखण्डां च
प्रदर्श्य। देव्या इति शेषः ॥६॥
मुद्रायें यद्यपि कई प्रकार की होती हैं। जैसे—गुरुवन्दन मुद्रा, अर्घ्यस्थापन
मुद्रा, अर्चन मुद्रा आदि; किन्तु यहाँ १. संक्षोभिणी, २. विद्राविणी,
३. आकर्षणी, ४. सर्ववशङ्करी, ५. सर्वोन्मादिनी, ६. महाङ्कुशा, ७. खेचरी,
८. सर्वबीजा और ९. योनि मुद्राओं रूप नव मुद्राओं की ही प्रायोगिकता का
निर्देश किया गया है। सूत्र में 'च' अव्यय के प्रयोग से यह अर्थ निकाला जा
सकता है कि, त्रिखण्डा मुद्रा का प्रयोग भी यहाँ करना चाहिये। इस तरह दश

१०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुद्राओं का ही प्रदर्शन यहाँ होना चाहिये। मुद्राओं के नाम के साथ 'सर्व'
शब्द के प्रयोग की भी प्रथा है। इन दशों के अतिरिक्त ग्रास, प्राण,
अपान, व्यान, उदान, समान, नाराच और चक्र मुद्रायें भी इसी वर्ग में
आती हैं।।६।।
त्रिधा सन्तर्पणम्
मूलेन त्रिधा सन्तर्प्य ।।७।।
बिन्दाविति शेषः।।७।।
सूत्र में सन्तर्पण का ही निर्देश है। सर्वप्रथम मूल बीज का उच्चारण और
इसके बाद तीन बार 'सन्तर्पयामि नमः' यह वाक्य प्रयोग किया जाता है। यहाँ
पूजन का विधान नहीं है। सन्तर्पण में बूँद मात्र का प्रक्षेप किया जाता है। पूजा
में बिन्दु, पुष्प और अक्षत का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ श्रीक्रम के प्रकरण
में मूल बीजमन्त्र गुरु द्वारा जानकर प्रयोग करना चाहिये।।७।।
षडङ्गपूजनमाह
देव्या अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि
पूजयित्वा ।।८।।
अत्र पूजनं नाम पुष्पाक्षतबिन्दुप्रक्षेप एव, न तु पञ्चोपचाराद्यर्पणरूपम्।
तस्मात् पूर्ववाक्ये तर्पणम्। पूजापदार्थश्च बिन्दुपुष्पाक्षतसमुदायप्रक्षेपः। इत्थम्
आदौ 'त्रितारी ततो हृन्मन्त्रस्ततो हृदयशक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि' इति
मन्त्रस्वरूपं ज्ञेयम्। अग्नीशेत्यत्र अग्न्यादिपदेन तत्तद्देवतासम्बन्धिदिशां
ग्रहणम्। दिक्षु इत्यनेन प्रागादिदिक्चतुष्टयग्रहणम्। षडङ्ग-युवतीनाम् अग्न्यादि-
चतस्रो विदिशः। मध्यं प्रागादिदिक्चतुष्टयं मिलित्वैकम्, इति षट् स्थानानि
ज्ञेयानि ।।८।।
यहाँ पूजन-क्रम में बिन्दुपुष्पाक्षत का प्रयोग करना चाहिये। पहले यह
बतलाया गया है, कि तर्पण में केवल बिन्दुओं का ही उपयोग किया जाता
है। यहाँ पूजन में पञ्चोपचार आदि उपचारों का प्रयोग नहीं होता। तर्पण और

ललिताक्रमः १०७
पूजन के इस अन्तर को समझकर ही इस प्रक्रिया में प्रवृत्त होना चाहिये, इस
तरह आदि में त्रितारी, पुनः हन्मन्त्र पुनः हृद् शक्ति 'श्रीपादुकां पूजयामि' कहने
से एक मन्त्र पूरा होता है। यही मन्त्र का स्वरूप है।
सूत्र में अग्नि आदि दिशाओं का उल्लेख किया गया है। इन दिशा-
कोण वाचक शब्दों से उन-उन देवताओं से सम्बन्धित दिशाओं का ग्रहण होता
है। षडङ्ग देवियों की ये चार दिशायें विदिशा कहलाती हैं। जहाँ तक मध्य
का प्रश्न है, मध्य वह बिन्दु है, जहाँ प्राची आदि चारों दिशायें एक बिन्दु
पर मिलती हैं, वही बिन्दु-मध्य कहलाता है। इस प्रकार छः स्थान और
षडङ्गपूजा सम्पन्न होती है। छः स्थान इस प्रकार माने जाते हैं—पूर्व, दक्षिण,
पश्चिम और उत्तर चारों मिलकर १ चार विदिशाएँ + १ मध्य = १+४+१=६ अङ्ग
माने जाते हैं। ये ही स्थान भी हैं॥८॥
नित्यापूजनम्
१. वाक्सकलहीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे 'सौः' इति कामेश्वरी
सर्वत्र नित्याश्रीपादुकेति योज्यम्। २. वाग्भगभुगे भगिनि भगोदरि
भगमाले भगावहे भगगुह्ये भगयोनि भगनिपातिनि सर्वभगवशङ्करि
भगरूपे नित्यक्लिन्ने भगस्वरूपे सर्वाणि भगानि मे ह्यानय वरदे रेते
सुरेते भगक्लिन्ने क्लिन्नद्रवे क्लेदय द्रावय अमोघे भगविच्चे
क्षुभक्षोभय सर्वसत्त्वान् भगेश्वरि ऐं ब्लूं जें ब्लूं में ब्लूं मों ब्लूं हें
ब्लूं हें क्लिन्ने सर्वाणि भगानि मे वशमानय स्त्रीं हर ब्लें ह्रीं
भगमालिनी। ३. तारो माया नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा इति
नित्यक्लिन्ना। ४. प्रणवः क्रों भ्रीं क्रौं झ्रौं छ्रौं ज्रौं स्वाहा, इति
भेरुण्डा। ५. प्रणवो माया वह्निवासिन्यै नम इति वह्निवासिनी।
६. मायाक्लिन्ने वाक् क्रों नित्यमदद्रवे ह्रीं, इति महावज्रेश्वरी।
७. माया शिवदूत्यै नमः, इति शिवदूती। ८. प्रणवो माया हुं खे
चे छे क्षः स्त्रीं हुं क्षें ह्रीं फट् इति त्वरिता। ९. कुमारी कुलसुन्दरी।
१०. हसकलरडवाग्भव ह स क ल र ड बिन्दुमालिनी। ह स क
ल र ड चतुर्दशषोडशा इति नित्या। ११. माया फ्रें स्स्रूं अंकुश

पाशास्मर वाग्भव ब्लूं पदनित्यमदद्रवे वर्म फ्रें मायेति नीलपताका।
१२. भमरयऊमिति विजया। १३. स्वौमिति सर्वमङ्गला।
१४. तारो नमो भगवति ज्वालामालिनि देवदेवि सर्वभूतसंहार-
कारिके जातवेदसि ज्वलन्ति ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल त्रिजातियुक्त
मायारेफसप्तकज्वालामालिनि वर्मफडग्निजायेति ज्वालामालिनी।
१५. (अं) च्कौं इति चित्रा। इति पञ्चदश नित्याः। प्रथमत्र्यस्ररेखा-
स्थितपञ्चदशस्वरेषु पूज्याः, विसृष्टौ षोडशीं मूलविद्यया
चाभ्यर्च्य ॥९॥
वाक् ऐं। शेषं यथापठितम्। मन्त्रान्ते सर्वत्र तत्तन्नित्यानाम। तदुत्तरं
अष्टाक्षरी-योगः। यथा आदौ त्रितारी ऐं सकल ह्रीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे सौः
कामेश्वरी नित्या श्रीपादुकां पूजयामि नम इति। एवमग्रेऽपि द्रष्टव्यम्। यद्यपि
श्रीपादु

ललिताक्रमः १०९
त्रिजातियुक्त- माया हां हीं हूं। वह्निजाया स्वाहा। पञ्चदशमाह—अं क्ष्कौमिति।
प्रथमत्यस्रं बिन्दुसमीपस्थं त्रिकोणम्। तत्रत्या या तिस्रो रेखास्तासु एकैकस्वरे
एकैकनित्याः क्रमेण पूज्याः। विसृष्टिः बिन्दुचक्रम्।।९।।
नित्यायें १५ होती हैं। श्रीचक्र के बैन्दव कोण भी तीनों रेखाओं पर
क्रमशः पश्चिम-ईशान रेखा पर 'अ आ इ ई उ' इन पाँच स्वरों की अवस्थिति
होती है। ईशान-अग्निरेखा पर ऊ ऋ ॠ लृ ॡ ये पाँच स्वर रहते हैं। अग्नि-
पश्चिम रेखा पर ए, ऐ, ओ, औ तथा अं ये पाँच स्वर प्रतिष्ठित रहते हैं।
इन्हीं स्वरों पर १५ नित्याओं का आवाहन-पूजन करना चाहिये। इस बिन्दु-
चक्र को षोडशी मूलविद्या से पूजित करते हैं—
पूर्व
ईशानकोण ई ऊ ऋ लृ ॡ अ अग्निकोण
उ ए
ई ऐ
इ ⊙ ओ
उत्तर बिन्दुचक्र दक्षिण
आ औ
अ अं
प
पश्चिम
अ = अग्निकोण; अ-ई = अग्नि-ईशान रेखा; ई = ईशानकोण;
प = पश्चिम; प ई = पश्चिम-ईशान रेखा
नित्याओं के क्रमशः नाम
१. कामेश्वरी—कामेश्वरी नित्या के मन्त्र में वाक् शब्द 'ऐं' बीज के लिये प्रयुक्त
है। पूरा मन्त्र स्पष्ट है। अन्त में सभी मन्त्रों में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः'
का प्रयोग करना चाहिये।
२. भगमालिनी—इस नाम की नित्या देवी का मन्त्र सबसे बड़ा है। इस
मन्त्र में भी वाक् शब्द 'ऐं' के लिये प्रयुक्त है। आदि में सभी मन्त्रों
में त्रितारी का प्रयोग आवश्यक है। अन्त में सभी नित्याओं के साथ
'श्रीपादुकां पूजयामि' इस अष्टाक्षरी का प्रयोग कर नमः जोड़कर मन्त्र पूरा
करते हैं।

११० परशुरामकल्पसूत्रम्
३. नित्यक्लिन्ना—इसके मन्त्र में तार का अर्थ प्रणव और माया का अर्थ
'ह्रीं' है। शेष स्पष्ट है।
४. भेरुण्डा—इस नित्या के मन्त्र में भी तार शब्द प्रयुक्त है। यह प्रणववाचक
है। शेष स्पष्ट है।
५. वह्निवासिनी—इसके मन्त्र में प्रणव के साथ माया अर्थात् 'ह्रीं' का प्रयोग
करना चाहिये। वाक् की जगह 'ऐं' लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लिन्ने ऐं क्रों नित्यमद्रवे ह्रीं महावज्रेश्वरी नित्या-श्रीपादुकां
पू. ामि नमः'।
६. वज्रेश्वरी—इसके मन्त्र में माया (ह्रीं) क्लिन्ने के बाद वाक् (ऐं) क्रौं
नित्यमद्रवे ह्रीं बीजों का प्रयोग करते हैं।
७. शिवदूती—सरलतम मन्त्र है। माया 'ह्रीं' अर्थ में प्रयुक्त है।
८. त्वरिता—इस मन्त्र में भी प्रणव और माया (ह्रीं) अपने बीजों के लिये
प्रयुक्त हैं। शेष स्पष्ट है।
९. कुलसुन्दरी—इस मन्त्र में भी त्रितारी आदि में और अष्टाक्षरी बाद में प्रयोग
करना चाहिये।
१०. नित्या—इस नित्या का नाम ही नित्या है। इसमें वाग्भव 'ऐं', मालिनी
'ई' और चतुर्दश 'औ' स्वर के साथ षोडशतम स्वर विसर्ग लगाया जाना
आवश्यक है। शेष सभी मन्त्रों के नियम इसमें भी प्रयोग में लाने चाहिये।
११. नीलपताका—इसके मन्त्र में माया 'ह्रीं' अङ्कुश 'क्रों' पाश 'आं' स्मर
'क्लीं' वाग्भव 'ऐं' वर्म 'हुं' माया 'ह्रीं' अर्थों में प्रयुक्त हैं।
१२. विजया—इसके मन्त्र में हल् वर्णों को एक साथ लिखना चाहिये। इस
तरह उसका स्वरूप भ्म्र्यूं या 'भ्म्यूँ' ऐसा बनेगा। शेष नियम पूर्ववत्
लगते हैं।
१३. सर्वमङ्गला—एक बीजमन्त्रात्मक इस मन्त्र के साथ भी त्रितारी, अष्टाक्षरी
आदि प्रयोग आवश्यक हैं।
१४. ज्वालामालिनी—तार से अग्निजाया तक यह मन्त्र है। कुछ सिद्ध इसे
'लक्ष्मण-रेखा' मन्त्र कहते हैं। श्री लक्ष्मण को यह विद्या सिद्ध थी। सिद्धि

ललिताक्रमः १११
के आधार पर रेखा से ज्वालायें फूट पड़ती थीं। इसमें आदि में तार अर्थात्
प्रणव लगता है। त्रिजातियुक्त माया की जगह हां हीं हूं ऐं और रेफसप्तक
अर्थात् सात बार र लिखते हैं। वर्म 'हुं' और अग्निजाया अर्थात् अन्त
में 'स्वाहा' लगाते हैं।
१५. चित्रा—एकाक्षर बीजमन्त्र में त्रितारी-अष्टाक्षरी योग आवश्यक है।
विसर्जन के लिये षोडशी विद्या का प्रयोग करना चाहिये ।।९।।
ओघत्रयपूजामाह
मध्ये प्राक्त्यस्रमध्यान्त मुनिवेदनागसङ्ख्यान् यथासम्प्रदायं
पादुकान् दिव्यसिद्धमानवौघसिद्धांमिष्ट्वा पश्चात् स्वशिरसि नाथं
यजेत्। एतल्लयाङ्गपूजनम् इति शिवम् ।।१०।।
पूर्वोक्तत्र्यस्रमध्यस्य अन्ते। मुनिः सप्त। वेद चत्वारः, अष्टौ संख्या यत्र
तान्। यथासम्प्रदायं पादुकाः। कादिहादिविद्याभेदेन पादुकानां गुरुमण्डलानां
भिन्नत्वाद् यस्य पुरुषस्य, परिगृहीता या याः पादुकास्तत्तल्लाभायेति। दिव्यांश्च
सिद्धांश्च इष्ट्वा पूजयित्वा। पश्चात् स्वशिरसि नाथं यजेत्। एतद् नवावरणपूजनं
लाभाङ्गपूजनं भवितुमर्हति। शिवमिति खण्डसमाप्तियोजकम्।।१०।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयानाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललिताक्रमो नाम
चतुर्थः खण्डः सम्पूर्णः।।४।।
पहले त्रिकोण की चर्चा की जा चुकी है। उसके मध्यभाग का वह अंश
जो अपने सामने, सर्वाधिक सामीप्य का माना जा सके, वहाँ कादि-हादि-विद्या
के सम्प्रदायानुसार सात, चार और आठ पादुकाओं का क्रम अपनाकर दिव्य,
सिद्ध और मानव के ओघ अर्थात् वर्ग की पूजा करनी चाहिये। सूत्र में मुनि
का सात, वेद का चार और नाग का आठ अर्थों में प्रयोग किया गया है।
सिद्धों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है—१. दिव्यसिद्ध, २. सिद्ध-
सिद्ध और ३. मानव-सिद्ध। दिव्यसिद्ध सात होते हैं। सिद्ध-सिद्ध ४ होते हैं
और मानव-सिद्ध ८ होते हैं। इनकी सम्प्रदायानुसार पादुका-पूजा निर्धारित है।
उसे सम्पन्न करना चाहिये।

११२ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्पश्चात् उपासक द्वारा अपने ही शिरोभाग में परमेश्वर भैरवनाथ की पूजा
करनी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त 'एतत्' शब्द के दो प्रकार के अन्वय हो सकते
हैं—१. यह ओघपादुका के बाद स्वात्मशिरोभाग में नाथ का अर्चन लयाङ्ग-
पूजन माना जाता है। २. एतत् का अर्थ यह आगे आने वाला आवरणरूप
पूजन लयाङ्ग-पूजन माना जाता है। लयाङ्ग तादात्म्यवत् ही अर्चन माना जाता
है। इस प्रकार यह ललिताक्रम का प्रकरण पूर्ण होता है। शिव इस खण्ड-
समाप्ति पर कल्याण करें।।१०।।
।।श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललिताक्रम नामक चतुर्थ खण्ड परिपूर्ण ।।४।।
।। इति शिवम् ।।

ललितानवावरणपूजाक्रमः
[ पञ्चमः खण्डः]
प्रथमावरणव्यष्टिपूजा
अथ प्राथमिके चतुरस्रे अणिमा-लघिमा-महिमेशित्व-प्राका-
म्येच्छाप्राप्ति-सर्वकामसिद्ध्यन्ता मध्यमे चतुरस्रे ब्राह्मयाद्या-
महालक्ष्म्यन्तास्तृतीये चतुरस्रे संक्षोभणद्रावणाकर्षणवश्योन्मादन-
महाङ्कुशखेचरीबीजयोनित्रिखण्डाः सर्वपूर्वास्ताः सम्पूज्याः ।। १ ।।
अथेति नवावरणपूजाधिकारद्योतकम्। चतुरस्रत्रयमध्ये प्राथमिके चतुरस्रे
सर्वबाह्ये अणिमेत्यारभ्य सर्वकामपर्यन्तं द्वन्द्वः, ते सर्वेऽपि सिद्ध्यन्ताः कार्याः।
सर्वेषां पदानामन्ते सिद्धिरिति योज्यम्। तथा च त्रितारी ततोऽणिमासिद्धि-
श्रीपादुकां पूजयामीति। एवमग्रेऽपि। अणिमादिपदत्रयं न मन्त्रन्तं किन्तु
डाबन्तम्। मध्यमे चतुरस्रे ब्राह्मयाद्याः (तद्यथा)—ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी
वैष्णवी तथा। वाराही चैव चेन्द्राणी चामुण्डा सप्तमातरः ।। महालक्ष्मी चेत्यष्टौ
मातरो मध्यचतुरस्रे पूज्याः।
तृतीये चतुरस्रे दशमुद्रापूजनमाह—तृतीये इति। सर्वशब्दः पूर्वं
यन्नामसु तास्तृतीये इति। त्रितार्युत्तरं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि
इति। सर्वसंक्षोभिणी एव वामाशक्तिरित्युच्यते। इति दशमुद्राः पूज्याः ।। १ ।।
परमाम्बा ललिता त्रिपुरसुन्दरी की पूजा के क्रम में यहाँ आवरण-पूजा की
चर्चा की जा रही है। सर्वप्रथम प्रथम आवरण की व्यष्टि पूजा का उल्लेख किया
जा रहा है। व्यष्टि पूजा में प्रतिशक्ति की, प्रतिसिद्धि की और प्रतिमुद्राओं की

११४ परशुरामकल्पसूत्रम्
पृथक्-पृथक् सनाम-ग्रहण पूजा करनी चाहिये। इस पूजा में तीन चतुर्भुज ऐसे
निर्मित किये जाते हैं कि, बीच में तीसरा चतुर्भुज हो। उसको मध्य का चतुर्भुज
चारों ओर घेर कर निर्मित हो। तीसरा इन दोनों को चारों ओर से घेर कर
बना हो।
जैसे— इस चित्र में तीन चतुर्भुज हैं—
प्रथम चतुरस्र अर्थात् संख्या ३ और २ को अपने गर्भ में रखने वाले
बाह्य चतुर्भुज में पश्चिम में अणिमासिद्धि की पूजा करनी चाहिये। पूजा के मन्त्रों
के नियम पर ध्यान देना चाहिये। जैसे सभी नामों के पहले सर्वप्रथम
त्रितारी + नाम के आदि अक्षर का बीज + सिद्धि का नाम + सिद्धि
शब्द + श्रीपादुकां पूजयामि + नमः। इस तरह अणिमा का मन्त्र ‘ऐं ह्रीं श्रीं अं
अणिमासिद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
लघिमामन्त्र—‘ऐं ह्रीं श्रीं लं लघिमासिद्धिश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
इसी प्रकार सभी सिद्धियों के मन्त्र स्वयम् उपासक बनाकर प्रयोग करे। गुरुदेव
से इसे प्रमाणित करा ले।
पश्चिम में अणिमा में वशित्व, ऊ लघिमा, पूर्व में महिमा, दक्षिण
में ईशित्व, वायव्य और ईशान में प्राकाम्य, अग्नि में भुक्ति, नैऋत्य में इच्छा,
नीचे प्राप्ति और ऊर्ध्व में सर्वकामसिद्धियों का पूजन होना चाहिये। इस प्रकार
से दश सिद्धियों की पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
मध्यचतुर्भुज में आठ मातृकाओं की पूजा होती है। मातृकाओं के नाम-
१. ब्राह्मी, २. माहेश्वरी ३. कौमारी, ४. वैष्णवी, ५. वाराही, ६. इन्द्राणी मध्य
चतुरस्र में १. ब्राह्मी पश्चिम द्वार में, २. माहेश्वरी उत्तर द्वार में, ३. कौमारी

ललितानवावरणपूजाक्रमः ११५
पूर्वद्वार में, ४. वैष्णवी दक्षिण द्वार में, ५. वायव्य में वैष्णवी, ६. ईशान में
इन्द्राणी, ७. अग्नि में चामुण्डा और ८. नैऋत्य में महालक्ष्मी की पूजा करनी
चाहिये। इन शक्तियों की पूजा के मन्त्र, जैसे ब्राह्मी-मन्त्र—
ऐं, ह्रीं, श्रीं, आं ब्राह्मी मातृशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः। मन्त्र क्रम
त्रितारी दीर्घस्वराष्टाक्षरी + मातृनाम + श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी प्रकार
अपनाना चाहिये। त्रितारी ऐं ह्रीं श्रीं स्वराष्टाक्षरी आं, ईं, ऊं (ॠं लूं ऐं औं
अः) सभी मातृकाओं के मन्त्र इसी क्रम से बन जाते हैं।
तृतीय चतुरस्र में मुद्राओं की पूजा का विधान है। मुद्रायें निम्नलिखित हैं—
१. सर्वसंक्षोभिणी, २. सर्वविद्राविणी, ३. सर्वाकर्षिणी, ४. सर्ववशङ्करी,
५. सर्वोन्मादिनी, ६. सर्वमहाङ्कुशा ७. सर्वखेचरी, ८. सर्वबीजा, ९. सर्वयोनि-
मुद्रा और १०. सर्वत्रिखण्डा।
इन सभी मुद्राओं में सर्व का प्रयोग आदि में करना चाहिये। यह परम्परा
है। वस्तुतः नाम में सर्व नहीं प्रयोज्य है। इनके मन्त्र में त्रितारी आदि में अवश्य
लगाना चाहिये। अन्त में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' सभी मुद्राओं के अन्त में
उच्चारित होगा। उदाहरण रूप में सर्वसंक्षोभिणी मन्त्र इस प्रकार से बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः'। इसी तरह सभी मुद्राओं के
मन्त्र बनते हैं।।१।।
प्रथमावरणस्य व्यष्टिपूजामुक्त्वा समष्टिपूजामाह
एताः प्रकटयोगिन्यस्त्रैलोक्यमोहनचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः
सन्विति, तासामेव समष्ट्यर्चनं कृत्वा ।।२।।
एता अणिमादित्रिखण्डान्ताः। प्रकटयोगिन्यस्तासामेव समष्टिनाम
प्रकटयोगिन्य इति। उक्तयोगिनीषु प्रकटत्वं च शिवादिषट्त्रिंशत्तत्त्वानां मध्ये या
स्थूला पृथिवी तद्रूपे भूपुरे चतुरस्रे वर्तमानत्वात्। त्रैलोक्यमोहनमिति योग
रूढिभ्यां चतुरस्रत्रयात्मकं सर्वबाह्यं यच्चक्रं तस्य नाम। तासामणिमादि-
त्रिखण्डान्तानां समष्ट्यर्चनं विधाय ।।२।।

११६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अणिमा से लेकर त्रिखण्डा पर्यन्त ये दश योगिनियाँ प्रकट योगिनियाँ
मानी जाती हैं। इसका कारण है, यह सारा विश्वात्मक विस्तार छत्तीस तत्त्वात्मक
माना जाता है। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह विस्तार शिव के स्वातन्त्र्य का
चमत्कार है। इसमें पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है। अन्तिम स्थूल तत्त्व रूप भूपुर में
यह चतुरस्र भूपुर निर्मित होता है। उसी में ये योगिनियाँ वर्त्तमान होती हैं। इसी
आधार पर इन्हें प्रकट योगिनी संज्ञा प्रदान की गयी है। जहाँ तक 'त्रैलोक्य-
मोहन' चक्र का प्रश्न है, यह तीन चतुरस्रों का सबसे बाहर वाला चक्र ही
इस संज्ञा से विभूषित किया गया है। इसी चक्र में इन समस्त प्रकट योगिनियों
की पूजा की जाती है। यह पूजा समष्टि पूजा कही जाती है। समष्टि शब्द व्यष्टि
समूह में प्रयुक्त होता है। जब योगिनियों की एक-एक कर पृथक्-पृथक् पूजा
की जाती है, तो उसे व्यष्टि पूजा कहते हैं। यहाँ प्रकट योगिनी कह देने से
अणिमा से त्रिखण्डा पर्यन्त सबका बोध हो जाता है और मुद्रा, सिद्धि, आयुध,
शक्ति, वाहन और परिवार के सहित सबकी पूजा एक साथ की जानी चाहिये,
यह सूत्र का निर्देश है॥२॥
करशुद्धिमुच्चार्य त्रिपुराचक्रेश्वरीमवमृश्य द्रामिति सर्व-
संक्षोभिणीमुद्रां प्रदर्शयेत्। चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि।
शिष्टं समानम् ॥३॥
अत्र करशुद्धिपदेन करशुद्धिन्यासाङ्गभूतो मन्त्रः, तम् उच्चार्य (अं आं
सौः) इति त्रिपुरेति त्रैलोक्यमोहनचक्रनायिका। त्रिपुरा चासौ चक्रेश्वरीमवमृश्य
सम्पूज्य। अत्रापि पूजारूपत्वात् श्रीपादुकेति मन्त्रशेषोऽस्ति परन्तु समष्ट्यर्चने
नास्ति।
द्रामिति सर्वसंक्षोभिणी-मुद्राबीजं तां पठित्वा मुद्राः प्रदर्शयेत्।
चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि शिष्टं समानम् ॥३॥
सूत्र में करशुद्धि मात्र का उल्लेख है। इससे प्रसङ्गवश करशुद्धि का वह
मन्त्र जिससे करशुद्धि और न्यास किया जाता है, उसे उच्चारण करना चाहिये।
वह मन्त्र 'अं आं सौः' है। यह बीजात्मक मन्त्र है।
त्रैलोक्यमोहनचक्र की नायिका का नाम ही त्रिपुरा है। वही चक्रेश्वरी भी
है। इन दोनों शब्दों में कर्मधारय समास है। अवमृश्य अवमृश की पूर्वकालिक

ललितानवावरणपूजाक्रमः ११७
क्रिया है। अवमर्श आन्तरिक स्पन्द रूप होता है। किन्तु यहाँ पूजा अर्थ में प्रयुक्त
माना जाता है।
सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा अङ्गुलियों को ग्रथित करने से बनती है। मुद्रा का
बीज 'द्रां' है। बीज मन्त्र उच्चारण कर मुद्रा प्रदर्शन करना चाहिये। इससे
परमाम्बा त्रिपुरा प्रसन्न होती हैं। यह क्रम सभी चक्रों, समस्त योगिनियों और
चक्रेश्वरी के पूजन में अपनाना चाहिये। सभी के भिन्न-भिन्न नाम हैं। यथा सन्दर्भ
सभी के विषय की जानकारी लेनी चाहिये। हाँ यह ध्यान देने की बात है कि,
समुद्रा, सपरिवारा आदि शब्दों के वर्ण कूट समान रूप से प्रयुक्त होते हैं। उन
उन प्रकरणों में समान विधि अपनायी जानी चाहिये।।३।।
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
षोडशपत्रे कामाकर्षिणी नित्याकलेति नित्याकलान्ताः,
बुद्ध्याकर्षिणी, अहङ्काराकर्षिणी, शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी,
रूपाकर्षिणी, रसाकर्षिणी, गन्धाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी,
धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी,
आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी, एता गुप्तयोगिन्यः
सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्रा इत्यादि पूर्ववद् आत्मरक्षामुच्चार्य
त्रिपुरेशीमिष्ट्वा 'द्रीं' इति सर्वविद्याविद्राविणीं प्रदर्शयेत् ।।४।।
नित्याकलेति वर्णसमुदायः। बुद्ध्याकर्षिणीतः पञ्चदशसु इदं विशेषणम्
अनुयोज्यम्। एता गुप्तयोगिन्यो भूपुरापेक्षया षोडशदलस्य अन्तःस्थत्वेन
गुप्ताः। पूर्ववद् द्वितीयसूत्रोक्तवद् आत्मरक्षामन्त्रः (श्रीक्रमोक्तसूत्रषोडशवत्)
उच्चार्य। सर्वविद्राविणीं मुद्रां प्रदर्शयेत् ।।४।।
श्रीचक्र के सोलह पत्रों में सोलह गुप्त योगिनियों की पूजा करनी चाहिये।
सूत्र के निर्देशानुसार सभी नामों के साथ नित्याकला शब्द का उच्चारण आवश्यक
माना जाता है। इन योगिनियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—
१. कामाकर्षिणी, २. बुद्ध्याकर्षिणी, ३. अहङ्काराकर्षिणी,
४. शब्दाकर्षिणी, ५. स्पर्शाकर्षिणी, ६. रूपाकर्षिणी, ७. रसाकर्षिणी,
८. गन्धाकर्षिणी, ९. चित्ताकर्षिणी, १०. धैर्याकर्षिणी ११. स्मृत्याकर्षिणी,

११८ परशुरामकल्पसूत्रम्
१२. नामाकर्षिणी, १३. बीजाकर्षिणी, १४. आत्माकर्षिणी, १५. अमृताकर्षिणी,
१६. शरीराकर्षिणी। इन नामों के पहले सर्वप्रथम त्रितारी + १६ स्वरों के एक
एक स्वर लगाये जाते हैं। फिर गुप्तयोगिनी का नाम + नित्याकला कहकर
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाना चाहिये। सोलह पद्मपत्रों में सर्वप्रथम देवी के
अग्रकोण से प्रारम्भ करना आवश्यक माना जाता है। सोलहों पत्रों में प्रथम
कामाकर्षिणी मन्त्र का उद्धार इस प्रकार होता है—‘‘ऐं, ह्रीं, श्रीं, अं कामाकर्षिणी
नित्याकला श्रीपादुकां पूजयामि नमः’’। इसके बाद का सूत्रोक्त मन्त्र इस प्रकार
बनता है—
‘एताः गुप्तयोगिन्यः सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः
सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु
नमः’ इतना कहकर पुष्प अर्पित करना चाहिये। इसके बाद आत्मरक्षा मन्त्र का
उच्चारण करना चाहिये। श्रीक्रम के सोलहवें सूत्र में यह मन्त्र लिखा गया है।
इस प्रकार परमाम्बा त्रिपुरेश्वरी की पूजा कर ‘द्रीं’ बीजमन्त्र बोलकर सर्वविद्राविणी
मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये।।४।।
तृतीयावरणपूजामाह
दिक्पत्रे कुसुममेखलामदनामदनातुरारेखावेगिन्यङ्कुशमालिनी-
रनङ्गपूर्वाः संमृश्यैता गुप्ततरयोगिन्यः सर्वसंक्षोभणचक्रे समुद्रा
इत्यादि पूर्ववदात्मासनमुच्चार्य त्रिपुरसुन्दरीमिष्ट्वा क्लीमिति
सर्वाकर्षिणीमुद्रां प्रदर्शयेत् ।।५।।
दिक्पत्रे दिक्संख्यानि पत्राणि यस्मिन् इति व्युत्पत्त्या तृतीयचक्रे। अनङ्गः
पूर्वं यासां कुसुमादीनां ता अनङ्गपूर्वाः। शेषं स्पष्टम् ।।५।।
दिक्संख्या आठ की द्योतिका है। आठ पत्र अष्टदल कमल में होते हैं।
अष्टदल पद्म तृतीयचक्र में ही होते हैं। इसे सर्वसंक्षोभण चक्र भी कहते हैं।
इनमें आठ गुप्ततर योगिनियों की पूजा होती है। इनके नामों के पहले ‘अनङ्ग’
शब्द का प्रयोग आवश्यक होता है। जैसे इनके नाम क्रमशः इस प्रकार लिखे
जाते हैं—
१. अनङ्गकुसुमा, २. अनङ्गमेखला, ३. अनङ्गमदना, ४. अनङ्गमदनातुरा,
५. अनङ्गरेखा, ६. अनङ्गवेगिनी, ७. अनङ्गांकुशा, ८. अनङ्गमालिनी। पहली चार

ललितानवावरणपूजाक्रमः १९९

योगिनियों की क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पत्रों में पूजा
करे और शेष चारों की क्रमशः अग्नि, निर्ऋति, वायव्य और ईशानकोण में
पूजा करते हैं। आठ पत्रों में आठों देवियों की पूजा का यही क्रम मान्य है।
अन्त में सूत्रोक्त 'एता गुप्ततरयोगिन्यः' से 'सन्तुष्टाः सन्तु नमः' तक बोलकर
नमः कहना चाहिये। आत्मासन कहकर त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित पूजा करनी
चाहिये। 'क्लीं' कहकर सर्वाकर्षिणी मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये॥५॥
चतुर्थावरणपूजामाह
भुवनारे संक्षोभिणी-द्राविण्याकर्षिण्याह्लादिनी-सम्मोहिनी-
स्तम्भिनी-जृम्भिणी-वशङ्करी-रञ्जन्युन्मादिन्यर्थसाधिनी-सम्पत्तिपूरणी-
मन्त्रमयी-द्वन्द्वक्षयङ्करीः सर्वादीरवमृश्य एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्य-दायकचक्रे समुद्रा इत्यादिमन्त्रशेषः चक्रासनमुच्चार्य
त्रिपुरवासिनीं चक्रेश्वरीमिष्ट्वा 'ब्लूं' इति सर्ववशङ्करीमुद्रामुद्-
घाटयेत् ।। ६ ।।
भुवनारे चतुर्दशारे। शेषं दिक्पत्रवत्। क्रमाकाङ्क्षायां पश्चिमे प्रारम्भः
ततस्ततो दक्षिणं ग्राह्यम् ।। ६ ।।
चतुर्थ आवरण के पूजन में इन विशेष तथ्यों पर ध्यान देना चाहिये—
१. यह पूजा चतुर्दश अरों वाले चक्र में सम्पन्न होती है।
२. इसकी योगिनियों को सम्प्रदाय योगिनी कहते हैं। ये सभी चौदह होती
हैं। एक-एक दल रूप अरों में देवी के अग्रकोण से आरम्भ कर इनकी पूजा
होती है।
३. सभी योगिनियों की संज्ञाओं के पहले 'सर्व' लगाना आवश्यक है।
जैसे संक्षोभिणी न कहकर सर्वसंक्षोभिणी कहना चाहिये।
४. त्रितारी का प्रयोग पहले करना चाहिये।
५. योगिनी नाम के साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' अवश्य लगाना
चाहिये।
६. मन्त्र का स्वरूप निम्नवत् बनता है—
'ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः''।।

१२० परशुरामकल्पसूत्रम्
७. इसे १४ योगिनियों के नाम के साथ इसी प्रकार प्रयोग करते हैं।
८. अन्त में यह मन्त्र बोलना सूत्र का निर्देश है। 'एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्यदायकचक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः
सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु नमः,।
९. यह मन्त्र बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
१०. चक्रासन (हैं ह्क्लीं ह्सौः) का उच्चारण कर त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी की
पूजा करनी चाहिये।
११. 'ब्लूं' बीजमन्त्र बोलकर सर्ववशङ्करी मुद्रा दिखलानी चाहिये। इस तरह
चतुर्थ आवरण की पूजा पूरी होती है॥६॥
पञ्चमावरणपूजामाह
बहिर्दशारे सिद्धिप्रदा-सम्पत्प्रदा-प्रियङ्करी-मङ्गलकारिणी-
कामप्रदा-दुःखविमोचिनी-मृत्युप्रशमनी-विघ्ननिवारिण्यङ्गसुन्दरी-
सौभाग्यदायिनीः सर्वपूर्वाः सम्पूज्यैताः कुलोत्तीर्णयोगिन्यः सर्वार्थ-
साधकचक्रे मनुशेषमुक्त्वा मन्त्रासनमुच्चार्य त्रिपुराश्रीचक्रेश्वरीं
प्रत्यवमृश्य स इत्युन्मादिनीमुद्रां दद्यात् ।।७।।
नवचक्रेषु दशारद्वयमस्ति। तयोर्मध्ये यद् बहिर्दशारं तत्रेत्यर्थः। शेषं
व्याख्यातप्रायम्। अत्रापि क्रमाकाङ्क्षायां पूर्वचक्रवदेव क्रमः ।।७।।
बहिर्दशार को सर्वार्थसाधक चक्र कहते हैं। नव चक्रों में दो दशार
प्रकल्पित हैं। इन दोनों के मध्य में यह चक्र माना जाता है। इसमें दश
कुलोत्तीर्ण योगिनियों की पूजा होती है। इन योगिनियों के नाम इस प्रकार सूत्र
में समुद्दिष्ट हैं—
१. सिद्धिप्रदा, २. सम्पत्प्रदा, ३. प्रियङ्करी, ४. मङ्गलकारिणी,
५. कामप्रदा, ६. दुःखविमोचिनी, ७. मृत्युप्रशमनी, ८. विघ्ननिवारिणी,
९. सर्वाङ्गसुन्दरी, १०. सर्वसौभाग्यदायिनी।
इनके नामों के पहले सर्व लगाकर पूजा करनी चाहिये। त्रितारीपूर्व
नामप्रयोग पूजा में आवश्यक माना जाता है। इतना विधान कर 'एताः' से

ललितानवावरणपूजाक्रमः १२१
'पूर्ववत् सन्तुष्टाः सन्तु' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। इसमें तुरत बाद
मन्त्रासन (हसैं हस्क्रीं हस्सौंः) बोलकर 'त्रिपुराश्री चक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि
नमः' बोलना चाहिये। सः कहकर सर्वोन्मादिनी मुद्राशक्ति का प्रदर्शन करना
चाहिये। इस तरह यह पाँचवीं आवरण पूजा पूरी होती है। क्रम की प्रथा भी
अग्रकोण और वामावर्त्त मानी जाती है। अन्त में योनि-मुद्रा प्रदर्शित कर प्रणाम
करना चाहिये।।७।।
षष्ठावरणपूजामाह
अन्तर्दशारे ज्ञानशक्त्यैश्वर्यप्रदा-ज्ञानमयी-व्याधिविनाशिन्‍याधार-
स्वरूपा-पापहराऽऽनन्दमयी-रक्षास्वरूपिणीप्सितफलप्रदाः सर्वोप-
पदाः यष्टव्याः। एतानि गर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे शिष्टं तद्वत्
साध्यसिद्धासनमुच्चार्य त्रिपुरमालिनी मान्या। क्रोमिति सर्वमहाङ्कुशां
दर्शयेत् ।।८।।
सर्वोपपदाः सर्वपूर्वाः। मान्या पूज्या। क्रमस्तु पूर्ववत् शेषं
व्याख्यातकल्पम् ।।८।।
छठें आवरण की पूजा में भी कुछ विशेष बातों को छोड़कर और सारी
विधियाँ पूर्ववत् पूरी की जाती हैं। विशेष बातें निम्नलिखित हैं—
१. यह पूजा अन्तर्दशार (सर्वरक्षा चक्र) में होती है।
२. इसमें निगर्भयोगिनियों की पूजा की जाती है। ये सभी सर्वपूर्वा हैं।
क्रमशः— १. सर्वज्ञा, २. सर्वशक्तिदेवी, ३. सर्वैश्वर्यप्रदा, ६. सर्वज्ञानमयी,
७. सर्वव्याधिविनाशिनी, ८. सर्वाधारस्वरूपा, ९. सर्वपापहरा, १०. सर्वा-
नन्दमयी, ११. सर्वरक्षास्वरूपिणी, १२. सर्वेप्सितफलप्रदा नाम की १२
निगर्भ-योगिनियाँ हैं। सबके साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' लगाना चाहिये।
३. इसके उच्चारण में 'एता' निगर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः
सन्तुष्टाः सन्तु नमः" कहकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
४. साध्यसिद्धासन मन्त्र 'ह्रीं क्लीं ब्लें' माना जाता है।

१२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
५. इसमें 'त्रिपुरमालिनी श्रीपादुकां पूजयामि' भी लगाकर पूजा समर्पित की
जाती है।
६. 'क्रों' बीज-मन्त्र कहकर सर्वमहाङ्कुशामुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। इस तरह
छठें आवरण की पूजा पूरी होती है।।८।।
सप्तमावरणपूजामाह
अष्टारे वशिन्याद्यष्टकं नमःस्थाने पूजामन्त्रसन्नाम एता रहस्य-
योगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे शिष्टं स्पष्टम्। मूर्त्तिविद्यामुच्चार्य त्रिपुरा-
सिद्धामाराध्य शिवभृगु-ऋद्धियुक्तक्फ्रें इति खेचरी देया ।।९।।
योगिनीन्यासप्रकरणे ये वशिन्यादीनामष्टौ मन्त्रा उद्धृतास्तेषु नमः-
पदस्थाने पूजामन्त्रस्य श्रीपादुकेति मन्त्रस्य सन्नाम ऊहः कार्यः चतुर्थी-सहित-
नमःपदस्थाने पूजामन्त्रः कार्य इत्यर्थः। शेषं गतप्रायम् ।।९।।
इस सूत्र के अनुसार आवरणपूजा का इस प्रकार विधान करना चाहिये—
१. अष्टार चक्र को सर्वरोगहर चक्र भी कहते हैं। उसी में यह पूजा सम्पन्न
होनी चाहिये।
२. इस सूत्र का पूरक सूत्र श्रीक्रम का सूत्र-सं. २० है। उसके अनुसार
वशिनीवाग्देवता के मन्त्र का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करने से तथ्य का
स्पष्टीकरण आवश्यक रूप से हो जाता है। जैसे—
'ऐं ह्रीं श्रीं (सविन्दु अच्) अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लं लूं एं ऐं ओं
औं अं अः ब्लूं वशिनीवाग्देवता श्रीपादुकां पूजयामि नमः' यहाँ तक आठों
के मन्त्र बोलकर सूत्रानुसार अन्त में 'एता रहस्ययोगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे
समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः
सम्पूजिताः सन्तर्पिता सन्तुष्टाः सन्तु नमः' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
३. मूर्त्ति-विद्या 'ह्रीं श्रीं सौः' बीजमन्त्र को कहते हैं। इस मन्त्र को बोलकर
'त्रिपुरासिद्धचक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः' मन्त्र का उच्चारण कर सातवीं
आवरणपूजा का अर्पण करते हैं। खेचरीमुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये। इस
तरह साँतवीं आवरणपूजा पूरी करनी चाहिये।।९।।

ललितानवावरणपूजाक्रमः १२३
आयुधपूजा
बाणबीजान्युच्चार्य सर्वजृम्भणेभ्यो बाणेभ्यो नमः धं थं सर्व-
सम्मोहनाय क्रों सर्वस्तम्भनायाङ्कुशाय नम इति महात्र्यस्त्रबाह्य-
चतुर्दिक्षु बाणाद्यायुधपूजा ।।१०।।
बाणबीजानि 'द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः' इति पञ्च शैवबाणबीजानि।
कामेश्वरीबाणबीजानि 'यां रां लां वां सां' इति देव्या बाणबीजानि। इत्थं च
मन्त्रस्वरूपम्—
'यां रां लां वां सां द्रां द्रीं ब्लूं सः सर्वजृम्भणेभ्यो बाणेभ्यो नमः बाण-
श्रीपादुकां पूजयामि। धं थं सर्वमोहनाय धनुषे नमः धनुःश्रीपाशाय नमः
पाशश्रीपादुकां पूजयामि। क्रों सर्वस्तम्भनायाङ्कुशाय नमः अङ्कुश-श्रीपादुकां
पूजयामि नमः।'
महात्र्यस्त्रम् आद्य