परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललितानवावरणपूजाक्रमः १२१
'पूर्ववत् सन्तुष्टाः सन्तु' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। इसमें तुरत बाद
मन्त्रासन (हसैं हस्क्रीं हस्सौंः) बोलकर 'त्रिपुराश्री चक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि
नमः' बोलना चाहिये। सः कहकर सर्वोन्मादिनी मुद्राशक्ति का प्रदर्शन करना
चाहिये। इस तरह यह पाँचवीं आवरण पूजा पूरी होती है। क्रम की प्रथा भी
अग्रकोण और वामावर्त्त मानी जाती है। अन्त में योनि-मुद्रा प्रदर्शित कर प्रणाम
करना चाहिये।।७।।
षष्ठावरणपूजामाह
अन्तर्दशारे ज्ञानशक्त्यैश्वर्यप्रदा-ज्ञानमयी-व्याधिविनाशिन्याधार-
स्वरूपा-पापहराऽऽनन्दमयी-रक्षास्वरूपिणीप्सितफलप्रदाः सर्वोप-
पदाः यष्टव्याः। एतानि गर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे शिष्टं तद्वत्
साध्यसिद्धासनमुच्चार्य त्रिपुरमालिनी मान्या। क्रोमिति सर्वमहाङ्कुशां
दर्शयेत् ।।८।।
सर्वोपपदाः सर्वपूर्वाः। मान्या पूज्या। क्रमस्तु पूर्ववत् शेषं
व्याख्यातकल्पम् ।।८।।
छठें आवरण की पूजा में भी कुछ विशेष बातों को छोड़कर और सारी
विधियाँ पूर्ववत् पूरी की जाती हैं। विशेष बातें निम्नलिखित हैं—
१. यह पूजा अन्तर्दशार (सर्वरक्षा चक्र) में होती है।
२. इसमें निगर्भयोगिनियों की पूजा की जाती है। ये सभी सर्वपूर्वा हैं।
क्रमशः— १. सर्वज्ञा, २. सर्वशक्तिदेवी, ३. सर्वैश्वर्यप्रदा, ६. सर्वज्ञानमयी,
७. सर्वव्याधिविनाशिनी, ८. सर्वाधारस्वरूपा, ९. सर्वपापहरा, १०. सर्वा-
नन्दमयी, ११. सर्वरक्षास्वरूपिणी, १२. सर्वेप्सितफलप्रदा नाम की १२
निगर्भ-योगिनियाँ हैं। सबके साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' लगाना चाहिये।
३. इसके उच्चारण में 'एता' निगर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः
सन्तुष्टाः सन्तु नमः" कहकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
४. साध्यसिद्धासन मन्त्र 'ह्रीं क्लीं ब्लें' माना जाता है।