परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
५. इसमें 'त्रिपुरमालिनी श्रीपादुकां पूजयामि' भी लगाकर पूजा समर्पित की
जाती है।
६. 'क्रों' बीज-मन्त्र कहकर सर्वमहाङ्कुशामुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। इस तरह
छठें आवरण की पूजा पूरी होती है।।८।।
सप्तमावरणपूजामाह
अष्टारे वशिन्याद्यष्टकं नमःस्थाने पूजामन्त्रसन्नाम एता रहस्य-
योगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे शिष्टं स्पष्टम्। मूर्त्तिविद्यामुच्चार्य त्रिपुरा-
सिद्धामाराध्य शिवभृगु-ऋद्धियुक्तक्फ्रें इति खेचरी देया ।।९।।
योगिनीन्यासप्रकरणे ये वशिन्यादीनामष्टौ मन्त्रा उद्धृतास्तेषु नमः-
पदस्थाने पूजामन्त्रस्य श्रीपादुकेति मन्त्रस्य सन्नाम ऊहः कार्यः चतुर्थी-सहित-
नमःपदस्थाने पूजामन्त्रः कार्य इत्यर्थः। शेषं गतप्रायम् ।।९।।
इस सूत्र के अनुसार आवरणपूजा का इस प्रकार विधान करना चाहिये—
१. अष्टार चक्र को सर्वरोगहर चक्र भी कहते हैं। उसी में यह पूजा सम्पन्न
होनी चाहिये।
२. इस सूत्र का पूरक सूत्र श्रीक्रम का सूत्र-सं. २० है। उसके अनुसार
वशिनीवाग्देवता के मन्त्र का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करने से तथ्य का
स्पष्टीकरण आवश्यक रूप से हो जाता है। जैसे—
'ऐं ह्रीं श्रीं (सविन्दु अच्) अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लं लूं एं ऐं ओं
औं अं अः ब्लूं वशिनीवाग्देवता श्रीपादुकां पूजयामि नमः' यहाँ तक आठों
के मन्त्र बोलकर सूत्रानुसार अन्त में 'एता रहस्ययोगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे
समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः
सम्पूजिताः सन्तर्पिता सन्तुष्टाः सन्तु नमः' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
३. मूर्त्ति-विद्या 'ह्रीं श्रीं सौः' बीजमन्त्र को कहते हैं। इस मन्त्र को बोलकर
'त्रिपुरासिद्धचक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः' मन्त्र का उच्चारण कर सातवीं
आवरणपूजा का अर्पण करते हैं। खेचरीमुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये। इस
तरह साँतवीं आवरणपूजा पूरी करनी चाहिये।।९।।