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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 320 में से

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पृष्ठ 160

११८ परशुरामकल्पसूत्रम्
१२. नामाकर्षिणी, १३. बीजाकर्षिणी, १४. आत्माकर्षिणी, १५. अमृताकर्षिणी,
१६. शरीराकर्षिणी। इन नामों के पहले सर्वप्रथम त्रितारी + १६ स्वरों के एक
एक स्वर लगाये जाते हैं। फिर गुप्तयोगिनी का नाम + नित्याकला कहकर
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाना चाहिये। सोलह पद्मपत्रों में सर्वप्रथम देवी के
अग्रकोण से प्रारम्भ करना आवश्यक माना जाता है। सोलहों पत्रों में प्रथम
कामाकर्षिणी मन्त्र का उद्धार इस प्रकार होता है—‘‘ऐं, ह्रीं, श्रीं, अं कामाकर्षिणी
नित्याकला श्रीपादुकां पूजयामि नमः’’। इसके बाद का सूत्रोक्त मन्त्र इस प्रकार
बनता है—
‘एताः गुप्तयोगिन्यः सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः
सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु
नमः’ इतना कहकर पुष्प अर्पित करना चाहिये। इसके बाद आत्मरक्षा मन्त्र का
उच्चारण करना चाहिये। श्रीक्रम के सोलहवें सूत्र में यह मन्त्र लिखा गया है।
इस प्रकार परमाम्बा त्रिपुरेश्वरी की पूजा कर ‘द्रीं’ बीजमन्त्र बोलकर सर्वविद्राविणी
मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये।।४।।
तृतीयावरणपूजामाह
दिक्पत्रे कुसुममेखलामदनामदनातुरारेखावेगिन्यङ्कुशमालिनी-
रनङ्गपूर्वाः संमृश्यैता गुप्ततरयोगिन्यः सर्वसंक्षोभणचक्रे समुद्रा
इत्यादि पूर्ववदात्मासनमुच्चार्य त्रिपुरसुन्दरीमिष्ट्वा क्लीमिति
सर्वाकर्षिणीमुद्रां प्रदर्शयेत् ।।५।।
दिक्पत्रे दिक्संख्यानि पत्राणि यस्मिन् इति व्युत्पत्त्या तृतीयचक्रे। अनङ्गः
पूर्वं यासां कुसुमादीनां ता अनङ्गपूर्वाः। शेषं स्पष्टम् ।।५।।
दिक्संख्या आठ की द्योतिका है। आठ पत्र अष्टदल कमल में होते हैं।
अष्टदल पद्म तृतीयचक्र में ही होते हैं। इसे सर्वसंक्षोभण चक्र भी कहते हैं।
इनमें आठ गुप्ततर योगिनियों की पूजा होती है। इनके नामों के पहले ‘अनङ्ग’
शब्द का प्रयोग आवश्यक होता है। जैसे इनके नाम क्रमशः इस प्रकार लिखे
जाते हैं—
१. अनङ्गकुसुमा, २. अनङ्गमेखला, ३. अनङ्गमदना, ४. अनङ्गमदनातुरा,
५. अनङ्गरेखा, ६. अनङ्गवेगिनी, ७. अनङ्गांकुशा, ८. अनङ्गमालिनी। पहली चार