परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंललितानवावरणपूजाक्रमः १९९
योगिनियों की क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पत्रों में पूजा
करे और शेष चारों की क्रमशः अग्नि, निर्ऋति, वायव्य और ईशानकोण में
पूजा करते हैं। आठ पत्रों में आठों देवियों की पूजा का यही क्रम मान्य है।
अन्त में सूत्रोक्त 'एता गुप्ततरयोगिन्यः' से 'सन्तुष्टाः सन्तु नमः' तक बोलकर
नमः कहना चाहिये। आत्मासन कहकर त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित पूजा करनी
चाहिये। 'क्लीं' कहकर सर्वाकर्षिणी मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये॥५॥
चतुर्थावरणपूजामाह
भुवनारे संक्षोभिणी-द्राविण्याकर्षिण्याह्लादिनी-सम्मोहिनी-
स्तम्भिनी-जृम्भिणी-वशङ्करी-रञ्जन्युन्मादिन्यर्थसाधिनी-सम्पत्तिपूरणी-
मन्त्रमयी-द्वन्द्वक्षयङ्करीः सर्वादीरवमृश्य एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्य-दायकचक्रे समुद्रा इत्यादिमन्त्रशेषः चक्रासनमुच्चार्य
त्रिपुरवासिनीं चक्रेश्वरीमिष्ट्वा 'ब्लूं' इति सर्ववशङ्करीमुद्रामुद्-
घाटयेत् ।। ६ ।।
भुवनारे चतुर्दशारे। शेषं दिक्पत्रवत्। क्रमाकाङ्क्षायां पश्चिमे प्रारम्भः
ततस्ततो दक्षिणं ग्राह्यम् ।। ६ ।।
चतुर्थ आवरण के पूजन में इन विशेष तथ्यों पर ध्यान देना चाहिये—
१. यह पूजा चतुर्दश अरों वाले चक्र में सम्पन्न होती है।
२. इसकी योगिनियों को सम्प्रदाय योगिनी कहते हैं। ये सभी चौदह होती
हैं। एक-एक दल रूप अरों में देवी के अग्रकोण से आरम्भ कर इनकी पूजा
होती है।
३. सभी योगिनियों की संज्ञाओं के पहले 'सर्व' लगाना आवश्यक है।
जैसे संक्षोभिणी न कहकर सर्वसंक्षोभिणी कहना चाहिये।
४. त्रितारी का प्रयोग पहले करना चाहिये।
५. योगिनी नाम के साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' अवश्य लगाना
चाहिये।
६. मन्त्र का स्वरूप निम्नवत् बनता है—
'ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः''।।