परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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७. इसे १४ योगिनियों के नाम के साथ इसी प्रकार प्रयोग करते हैं।
८. अन्त में यह मन्त्र बोलना सूत्र का निर्देश है। 'एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्यदायकचक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः
सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु नमः,।
९. यह मन्त्र बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
१०. चक्रासन (हैं ह्क्लीं ह्सौः) का उच्चारण कर त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी की
पूजा करनी चाहिये।
११. 'ब्लूं' बीजमन्त्र बोलकर सर्ववशङ्करी मुद्रा दिखलानी चाहिये। इस तरह
चतुर्थ आवरण की पूजा पूरी होती है॥६॥
पञ्चमावरणपूजामाह
बहिर्दशारे सिद्धिप्रदा-सम्पत्प्रदा-प्रियङ्करी-मङ्गलकारिणी-
कामप्रदा-दुःखविमोचिनी-मृत्युप्रशमनी-विघ्ननिवारिण्यङ्गसुन्दरी-
सौभाग्यदायिनीः सर्वपूर्वाः सम्पूज्यैताः कुलोत्तीर्णयोगिन्यः सर्वार्थ-
साधकचक्रे मनुशेषमुक्त्वा मन्त्रासनमुच्चार्य त्रिपुराश्रीचक्रेश्वरीं
प्रत्यवमृश्य स इत्युन्मादिनीमुद्रां दद्यात् ।।७।।
नवचक्रेषु दशारद्वयमस्ति। तयोर्मध्ये यद् बहिर्दशारं तत्रेत्यर्थः। शेषं
व्याख्यातप्रायम्। अत्रापि क्रमाकाङ्क्षायां पूर्वचक्रवदेव क्रमः ।।७।।
बहिर्दशार को सर्वार्थसाधक चक्र कहते हैं। नव चक्रों में दो दशार
प्रकल्पित हैं। इन दोनों के मध्य में यह चक्र माना जाता है। इसमें दश
कुलोत्तीर्ण योगिनियों की पूजा होती है। इन योगिनियों के नाम इस प्रकार सूत्र
में समुद्दिष्ट हैं—
१. सिद्धिप्रदा, २. सम्पत्प्रदा, ३. प्रियङ्करी, ४. मङ्गलकारिणी,
५. कामप्रदा, ६. दुःखविमोचिनी, ७. मृत्युप्रशमनी, ८. विघ्ननिवारिणी,
९. सर्वाङ्गसुन्दरी, १०. सर्वसौभाग्यदायिनी।
इनके नामों के पहले सर्व लगाकर पूजा करनी चाहिये। त्रितारीपूर्व
नामप्रयोग पूजा में आवश्यक माना जाता है। इतना विधान कर 'एताः' से