परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
११४ परशुरामकल्पसूत्रम्
पृथक्-पृथक् सनाम-ग्रहण पूजा करनी चाहिये। इस पूजा में तीन चतुर्भुज ऐसे
निर्मित किये जाते हैं कि, बीच में तीसरा चतुर्भुज हो। उसको मध्य का चतुर्भुज
चारों ओर घेर कर निर्मित हो। तीसरा इन दोनों को चारों ओर से घेर कर
बना हो।
जैसे— इस चित्र में तीन चतुर्भुज हैं—
प्रथम चतुरस्र अर्थात् संख्या ३ और २ को अपने गर्भ में रखने वाले
बाह्य चतुर्भुज में पश्चिम में अणिमासिद्धि की पूजा करनी चाहिये। पूजा के मन्त्रों
के नियम पर ध्यान देना चाहिये। जैसे सभी नामों के पहले सर्वप्रथम
त्रितारी + नाम के आदि अक्षर का बीज + सिद्धि का नाम + सिद्धि
शब्द + श्रीपादुकां पूजयामि + नमः। इस तरह अणिमा का मन्त्र ‘ऐं ह्रीं श्रीं अं
अणिमासिद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
लघिमामन्त्र—‘ऐं ह्रीं श्रीं लं लघिमासिद्धिश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
इसी प्रकार सभी सिद्धियों के मन्त्र स्वयम् उपासक बनाकर प्रयोग करे। गुरुदेव
से इसे प्रमाणित करा ले।
पश्चिम में अणिमा में वशित्व, ऊ लघिमा, पूर्व में महिमा, दक्षिण
में ईशित्व, वायव्य और ईशान में प्राकाम्य, अग्नि में भुक्ति, नैऋत्य में इच्छा,
नीचे प्राप्ति और ऊर्ध्व में सर्वकामसिद्धियों का पूजन होना चाहिये। इस प्रकार
से दश सिद्धियों की पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
मध्यचतुर्भुज में आठ मातृकाओं की पूजा होती है। मातृकाओं के नाम-
१. ब्राह्मी, २. माहेश्वरी ३. कौमारी, ४. वैष्णवी, ५. वाराही, ६. इन्द्राणी मध्य
चतुरस्र में १. ब्राह्मी पश्चिम द्वार में, २. माहेश्वरी उत्तर द्वार में, ३. कौमारी
ललितानवावरणपूजाक्रमः ११५
पूर्वद्वार में, ४. वैष्णवी दक्षिण द्वार में, ५. वायव्य में वैष्णवी, ६. ईशान में
इन्द्राणी, ७. अग्नि में चामुण्डा और ८. नैऋत्य में महालक्ष्मी की पूजा करनी
चाहिये। इन शक्तियों की पूजा के मन्त्र, जैसे ब्राह्मी-मन्त्र—
ऐं, ह्रीं, श्रीं, आं ब्राह्मी मातृशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः। मन्त्र क्रम
त्रितारी दीर्घस्वराष्टाक्षरी + मातृनाम + श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी प्रकार
अपनाना चाहिये। त्रितारी ऐं ह्रीं श्रीं स्वराष्टाक्षरी आं, ईं, ऊं (ॠं लूं ऐं औं
अः) सभी मातृकाओं के मन्त्र इसी क्रम से बन जाते हैं।
तृतीय चतुरस्र में मुद्राओं की पूजा का विधान है। मुद्रायें निम्नलिखित हैं—
१. सर्वसंक्षोभिणी, २. सर्वविद्राविणी, ३. सर्वाकर्षिणी, ४. सर्ववशङ्करी,
५. सर्वोन्मादिनी, ६. सर्वमहाङ्कुशा ७. सर्वखेचरी, ८. सर्वबीजा, ९. सर्वयोनि-
मुद्रा और १०. सर्वत्रिखण्डा।
इन सभी मुद्राओं में सर्व का प्रयोग आदि में करना चाहिये। यह परम्परा
है। वस्तुतः नाम में सर्व नहीं प्रयोज्य है। इनके मन्त्र में त्रितारी आदि में अवश्य
लगाना चाहिये। अन्त में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' सभी मुद्राओं के अन्त में
उच्चारित होगा। उदाहरण रूप में सर्वसंक्षोभिणी मन्त्र इस प्रकार से बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः'। इसी तरह सभी मुद्राओं के
मन्त्र बनते हैं।।१।।
प्रथमावरणस्य व्यष्टिपूजामुक्त्वा समष्टिपूजामाह
एताः प्रकटयोगिन्यस्त्रैलोक्यमोहनचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः
सन्विति, तासामेव समष्ट्यर्चनं कृत्वा ।।२।।
एता अणिमादित्रिखण्डान्ताः। प्रकटयोगिन्यस्तासामेव समष्टिनाम
प्रकटयोगिन्य इति। उक्तयोगिनीषु प्रकटत्वं च शिवादिषट्त्रिंशत्तत्त्वानां मध्ये या
स्थूला पृथिवी तद्रूपे भूपुरे चतुरस्रे वर्तमानत्वात्। त्रैलोक्यमोहनमिति योग
रूढिभ्यां चतुरस्रत्रयात्मकं सर्वबाह्यं यच्चक्रं तस्य नाम। तासामणिमादि-
त्रिखण्डान्तानां समष्ट्यर्चनं विधाय ।।२।।
११६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अणिमा से लेकर त्रिखण्डा पर्यन्त ये दश योगिनियाँ प्रकट योगिनियाँ
मानी जाती हैं। इसका कारण है, यह सारा विश्वात्मक विस्तार छत्तीस तत्त्वात्मक
माना जाता है। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह विस्तार शिव के स्वातन्त्र्य का
चमत्कार है। इसमें पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है। अन्तिम स्थूल तत्त्व रूप भूपुर में
यह चतुरस्र भूपुर निर्मित होता है। उसी में ये योगिनियाँ वर्त्तमान होती हैं। इसी
आधार पर इन्हें प्रकट योगिनी संज्ञा प्रदान की गयी है। जहाँ तक 'त्रैलोक्य-
मोहन' चक्र का प्रश्न है, यह तीन चतुरस्रों का सबसे बाहर वाला चक्र ही
इस संज्ञा से विभूषित किया गया है। इसी चक्र में इन समस्त प्रकट योगिनियों
की पूजा की जाती है। यह पूजा समष्टि पूजा कही जाती है। समष्टि शब्द व्यष्टि
समूह में प्रयुक्त होता है। जब योगिनियों की एक-एक कर पृथक्-पृथक् पूजा
की जाती है, तो उसे व्यष्टि पूजा कहते हैं। यहाँ प्रकट योगिनी कह देने से
अणिमा से त्रिखण्डा पर्यन्त सबका बोध हो जाता है और मुद्रा, सिद्धि, आयुध,
शक्ति, वाहन और परिवार के सहित सबकी पूजा एक साथ की जानी चाहिये,
यह सूत्र का निर्देश है॥२॥
करशुद्धिमुच्चार्य त्रिपुराचक्रेश्वरीमवमृश्य द्रामिति सर्व-
संक्षोभिणीमुद्रां प्रदर्शयेत्। चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि।
शिष्टं समानम् ॥३॥
अत्र करशुद्धिपदेन करशुद्धिन्यासाङ्गभूतो मन्त्रः, तम् उच्चार्य (अं आं
सौः) इति त्रिपुरेति त्रैलोक्यमोहनचक्रनायिका। त्रिपुरा चासौ चक्रेश्वरीमवमृश्य
सम्पूज्य। अत्रापि पूजारूपत्वात् श्रीपादुकेति मन्त्रशेषोऽस्ति परन्तु समष्ट्यर्चने
नास्ति।
द्रामिति सर्वसंक्षोभिणी-मुद्राबीजं तां पठित्वा मुद्राः प्रदर्शयेत्।
चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि शिष्टं समानम् ॥३॥
सूत्र में करशुद्धि मात्र का उल्लेख है। इससे प्रसङ्गवश करशुद्धि का वह
मन्त्र जिससे करशुद्धि और न्यास किया जाता है, उसे उच्चारण करना चाहिये।
वह मन्त्र 'अं आं सौः' है। यह बीजात्मक मन्त्र है।
त्रैलोक्यमोहनचक्र की नायिका का नाम ही त्रिपुरा है। वही चक्रेश्वरी भी
है। इन दोनों शब्दों में कर्मधारय समास है। अवमृश्य अवमृश की पूर्वकालिक
ललितानवावरणपूजाक्रमः ११७
क्रिया है। अवमर्श आन्तरिक स्पन्द रूप होता है। किन्तु यहाँ पूजा अर्थ में प्रयुक्त
माना जाता है।
सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा अङ्गुलियों को ग्रथित करने से बनती है। मुद्रा का
बीज 'द्रां' है। बीज मन्त्र उच्चारण कर मुद्रा प्रदर्शन करना चाहिये। इससे
परमाम्बा त्रिपुरा प्रसन्न होती हैं। यह क्रम सभी चक्रों, समस्त योगिनियों और
चक्रेश्वरी के पूजन में अपनाना चाहिये। सभी के भिन्न-भिन्न नाम हैं। यथा सन्दर्भ
सभी के विषय की जानकारी लेनी चाहिये। हाँ यह ध्यान देने की बात है कि,
समुद्रा, सपरिवारा आदि शब्दों के वर्ण कूट समान रूप से प्रयुक्त होते हैं। उन
उन प्रकरणों में समान विधि अपनायी जानी चाहिये।।३।।
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
षोडशपत्रे कामाकर्षिणी नित्याकलेति नित्याकलान्ताः,
बुद्ध्याकर्षिणी, अहङ्काराकर्षिणी, शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी,
रूपाकर्षिणी, रसाकर्षिणी, गन्धाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी,
धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी,
आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी, एता गुप्तयोगिन्यः
सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्रा इत्यादि पूर्ववद् आत्मरक्षामुच्चार्य
त्रिपुरेशीमिष्ट्वा 'द्रीं' इति सर्वविद्याविद्राविणीं प्रदर्शयेत् ।।४।।
नित्याकलेति वर्णसमुदायः। बुद्ध्याकर्षिणीतः पञ्चदशसु इदं विशेषणम्
अनुयोज्यम्। एता गुप्तयोगिन्यो भूपुरापेक्षया षोडशदलस्य अन्तःस्थत्वेन
गुप्ताः। पूर्ववद् द्वितीयसूत्रोक्तवद् आत्मरक्षामन्त्रः (श्रीक्रमोक्तसूत्रषोडशवत्)
उच्चार्य। सर्वविद्राविणीं मुद्रां प्रदर्शयेत् ।।४।।
श्रीचक्र के सोलह पत्रों में सोलह गुप्त योगिनियों की पूजा करनी चाहिये।
सूत्र के निर्देशानुसार सभी नामों के साथ नित्याकला शब्द का उच्चारण आवश्यक
माना जाता है। इन योगिनियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—
१. कामाकर्षिणी, २. बुद्ध्याकर्षिणी, ३. अहङ्काराकर्षिणी,
४. शब्दाकर्षिणी, ५. स्पर्शाकर्षिणी, ६. रूपाकर्षिणी, ७. रसाकर्षिणी,
८. गन्धाकर्षिणी, ९. चित्ताकर्षिणी, १०. धैर्याकर्षिणी ११. स्मृत्याकर्षिणी,
११८ परशुरामकल्पसूत्रम्
१२. नामाकर्षिणी, १३. बीजाकर्षिणी, १४. आत्माकर्षिणी, १५. अमृताकर्षिणी,
१६. शरीराकर्षिणी। इन नामों के पहले सर्वप्रथम त्रितारी + १६ स्वरों के एक
एक स्वर लगाये जाते हैं। फिर गुप्तयोगिनी का नाम + नित्याकला कहकर
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाना चाहिये। सोलह पद्मपत्रों में सर्वप्रथम देवी के
अग्रकोण से प्रारम्भ करना आवश्यक माना जाता है। सोलहों पत्रों में प्रथम
कामाकर्षिणी मन्त्र का उद्धार इस प्रकार होता है—‘‘ऐं, ह्रीं, श्रीं, अं कामाकर्षिणी
नित्याकला श्रीपादुकां पूजयामि नमः’’। इसके बाद का सूत्रोक्त मन्त्र इस प्रकार
बनता है—
‘एताः गुप्तयोगिन्यः सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः
सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु
नमः’ इतना कहकर पुष्प अर्पित करना चाहिये। इसके बाद आत्मरक्षा मन्त्र का
उच्चारण करना चाहिये। श्रीक्रम के सोलहवें सूत्र में यह मन्त्र लिखा गया है।
इस प्रकार परमाम्बा त्रिपुरेश्वरी की पूजा कर ‘द्रीं’ बीजमन्त्र बोलकर सर्वविद्राविणी
मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये।।४।।
तृतीयावरणपूजामाह
दिक्पत्रे कुसुममेखलामदनामदनातुरारेखावेगिन्यङ्कुशमालिनी-
रनङ्गपूर्वाः संमृश्यैता गुप्ततरयोगिन्यः सर्वसंक्षोभणचक्रे समुद्रा
इत्यादि पूर्ववदात्मासनमुच्चार्य त्रिपुरसुन्दरीमिष्ट्वा क्लीमिति
सर्वाकर्षिणीमुद्रां प्रदर्शयेत् ।।५।।
दिक्पत्रे दिक्संख्यानि पत्राणि यस्मिन् इति व्युत्पत्त्या तृतीयचक्रे। अनङ्गः
पूर्वं यासां कुसुमादीनां ता अनङ्गपूर्वाः। शेषं स्पष्टम् ।।५।।
दिक्संख्या आठ की द्योतिका है। आठ पत्र अष्टदल कमल में होते हैं।
अष्टदल पद्म तृतीयचक्र में ही होते हैं। इसे सर्वसंक्षोभण चक्र भी कहते हैं।
इनमें आठ गुप्ततर योगिनियों की पूजा होती है। इनके नामों के पहले ‘अनङ्ग’
शब्द का प्रयोग आवश्यक होता है। जैसे इनके नाम क्रमशः इस प्रकार लिखे
जाते हैं—
१. अनङ्गकुसुमा, २. अनङ्गमेखला, ३. अनङ्गमदना, ४. अनङ्गमदनातुरा,
५. अनङ्गरेखा, ६. अनङ्गवेगिनी, ७. अनङ्गांकुशा, ८. अनङ्गमालिनी। पहली चार
ललितानवावरणपूजाक्रमः १९९
योगिनियों की क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पत्रों में पूजा
करे और शेष चारों की क्रमशः अग्नि, निर्ऋति, वायव्य और ईशानकोण में
पूजा करते हैं। आठ पत्रों में आठों देवियों की पूजा का यही क्रम मान्य है।
अन्त में सूत्रोक्त 'एता गुप्ततरयोगिन्यः' से 'सन्तुष्टाः सन्तु नमः' तक बोलकर
नमः कहना चाहिये। आत्मासन कहकर त्रिपुरसुन्दरी से सम्बन्धित पूजा करनी
चाहिये। 'क्लीं' कहकर सर्वाकर्षिणी मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये॥५॥
चतुर्थावरणपूजामाह
भुवनारे संक्षोभिणी-द्राविण्याकर्षिण्याह्लादिनी-सम्मोहिनी-
स्तम्भिनी-जृम्भिणी-वशङ्करी-रञ्जन्युन्मादिन्यर्थसाधिनी-सम्पत्तिपूरणी-
मन्त्रमयी-द्वन्द्वक्षयङ्करीः सर्वादीरवमृश्य एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्य-दायकचक्रे समुद्रा इत्यादिमन्त्रशेषः चक्रासनमुच्चार्य
त्रिपुरवासिनीं चक्रेश्वरीमिष्ट्वा 'ब्लूं' इति सर्ववशङ्करीमुद्रामुद्-
घाटयेत् ।। ६ ।।
भुवनारे चतुर्दशारे। शेषं दिक्पत्रवत्। क्रमाकाङ्क्षायां पश्चिमे प्रारम्भः
ततस्ततो दक्षिणं ग्राह्यम् ।। ६ ।।
चतुर्थ आवरण के पूजन में इन विशेष तथ्यों पर ध्यान देना चाहिये—
१. यह पूजा चतुर्दश अरों वाले चक्र में सम्पन्न होती है।
२. इसकी योगिनियों को सम्प्रदाय योगिनी कहते हैं। ये सभी चौदह होती
हैं। एक-एक दल रूप अरों में देवी के अग्रकोण से आरम्भ कर इनकी पूजा
होती है।
३. सभी योगिनियों की संज्ञाओं के पहले 'सर्व' लगाना आवश्यक है।
जैसे संक्षोभिणी न कहकर सर्वसंक्षोभिणी कहना चाहिये।
४. त्रितारी का प्रयोग पहले करना चाहिये।
५. योगिनी नाम के साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' अवश्य लगाना
चाहिये।
६. मन्त्र का स्वरूप निम्नवत् बनता है—
'ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः''।।
१२० परशुरामकल्पसूत्रम्
७. इसे १४ योगिनियों के नाम के साथ इसी प्रकार प्रयोग करते हैं।
८. अन्त में यह मन्त्र बोलना सूत्र का निर्देश है। 'एताः सम्प्रदाययोगिन्यः
सर्वसौभाग्यदायकचक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः
सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु नमः,।
९. यह मन्त्र बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
१०. चक्रासन (हैं ह्क्लीं ह्सौः) का उच्चारण कर त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी की
पूजा करनी चाहिये।
११. 'ब्लूं' बीजमन्त्र बोलकर सर्ववशङ्करी मुद्रा दिखलानी चाहिये। इस तरह
चतुर्थ आवरण की पूजा पूरी होती है॥६॥
पञ्चमावरणपूजामाह
बहिर्दशारे सिद्धिप्रदा-सम्पत्प्रदा-प्रियङ्करी-मङ्गलकारिणी-
कामप्रदा-दुःखविमोचिनी-मृत्युप्रशमनी-विघ्ननिवारिण्यङ्गसुन्दरी-
सौभाग्यदायिनीः सर्वपूर्वाः सम्पूज्यैताः कुलोत्तीर्णयोगिन्यः सर्वार्थ-
साधकचक्रे मनुशेषमुक्त्वा मन्त्रासनमुच्चार्य त्रिपुराश्रीचक्रेश्वरीं
प्रत्यवमृश्य स इत्युन्मादिनीमुद्रां दद्यात् ।।७।।
नवचक्रेषु दशारद्वयमस्ति। तयोर्मध्ये यद् बहिर्दशारं तत्रेत्यर्थः। शेषं
व्याख्यातप्रायम्। अत्रापि क्रमाकाङ्क्षायां पूर्वचक्रवदेव क्रमः ।।७।।
बहिर्दशार को सर्वार्थसाधक चक्र कहते हैं। नव चक्रों में दो दशार
प्रकल्पित हैं। इन दोनों के मध्य में यह चक्र माना जाता है। इसमें दश
कुलोत्तीर्ण योगिनियों की पूजा होती है। इन योगिनियों के नाम इस प्रकार सूत्र
में समुद्दिष्ट हैं—
१. सिद्धिप्रदा, २. सम्पत्प्रदा, ३. प्रियङ्करी, ४. मङ्गलकारिणी,
५. कामप्रदा, ६. दुःखविमोचिनी, ७. मृत्युप्रशमनी, ८. विघ्ननिवारिणी,
९. सर्वाङ्गसुन्दरी, १०. सर्वसौभाग्यदायिनी।
इनके नामों के पहले सर्व लगाकर पूजा करनी चाहिये। त्रितारीपूर्व
नामप्रयोग पूजा में आवश्यक माना जाता है। इतना विधान कर 'एताः' से
ललितानवावरणपूजाक्रमः १२१
'पूर्ववत् सन्तुष्टाः सन्तु' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। इसमें तुरत बाद
मन्त्रासन (हसैं हस्क्रीं हस्सौंः) बोलकर 'त्रिपुराश्री चक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि
नमः' बोलना चाहिये। सः कहकर सर्वोन्मादिनी मुद्राशक्ति का प्रदर्शन करना
चाहिये। इस तरह यह पाँचवीं आवरण पूजा पूरी होती है। क्रम की प्रथा भी
अग्रकोण और वामावर्त्त मानी जाती है। अन्त में योनि-मुद्रा प्रदर्शित कर प्रणाम
करना चाहिये।।७।।
षष्ठावरणपूजामाह
अन्तर्दशारे ज्ञानशक्त्यैश्वर्यप्रदा-ज्ञानमयी-व्याधिविनाशिन्याधार-
स्वरूपा-पापहराऽऽनन्दमयी-रक्षास्वरूपिणीप्सितफलप्रदाः सर्वोप-
पदाः यष्टव्याः। एतानि गर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे शिष्टं तद्वत्
साध्यसिद्धासनमुच्चार्य त्रिपुरमालिनी मान्या। क्रोमिति सर्वमहाङ्कुशां
दर्शयेत् ।।८।।
सर्वोपपदाः सर्वपूर्वाः। मान्या पूज्या। क्रमस्तु पूर्ववत् शेषं
व्याख्यातकल्पम् ।।८।।
छठें आवरण की पूजा में भी कुछ विशेष बातों को छोड़कर और सारी
विधियाँ पूर्ववत् पूरी की जाती हैं। विशेष बातें निम्नलिखित हैं—
१. यह पूजा अन्तर्दशार (सर्वरक्षा चक्र) में होती है।
२. इसमें निगर्भयोगिनियों की पूजा की जाती है। ये सभी सर्वपूर्वा हैं।
क्रमशः— १. सर्वज्ञा, २. सर्वशक्तिदेवी, ३. सर्वैश्वर्यप्रदा, ६. सर्वज्ञानमयी,
७. सर्वव्याधिविनाशिनी, ८. सर्वाधारस्वरूपा, ९. सर्वपापहरा, १०. सर्वा-
नन्दमयी, ११. सर्वरक्षास्वरूपिणी, १२. सर्वेप्सितफलप्रदा नाम की १२
निगर्भ-योगिनियाँ हैं। सबके साथ 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' लगाना चाहिये।
३. इसके उच्चारण में 'एता' निगर्भयोगिन्यः सर्वरक्षाकरचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः
सन्तुष्टाः सन्तु नमः" कहकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
४. साध्यसिद्धासन मन्त्र 'ह्रीं क्लीं ब्लें' माना जाता है।
१२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
५. इसमें 'त्रिपुरमालिनी श्रीपादुकां पूजयामि' भी लगाकर पूजा समर्पित की
जाती है।
६. 'क्रों' बीज-मन्त्र कहकर सर्वमहाङ्कुशामुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। इस तरह
छठें आवरण की पूजा पूरी होती है।।८।।
सप्तमावरणपूजामाह
अष्टारे वशिन्याद्यष्टकं नमःस्थाने पूजामन्त्रसन्नाम एता रहस्य-
योगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे शिष्टं स्पष्टम्। मूर्त्तिविद्यामुच्चार्य त्रिपुरा-
सिद्धामाराध्य शिवभृगु-ऋद्धियुक्तक्फ्रें इति खेचरी देया ।।९।।
योगिनीन्यासप्रकरणे ये वशिन्यादीनामष्टौ मन्त्रा उद्धृतास्तेषु नमः-
पदस्थाने पूजामन्त्रस्य श्रीपादुकेति मन्त्रस्य सन्नाम ऊहः कार्यः चतुर्थी-सहित-
नमःपदस्थाने पूजामन्त्रः कार्य इत्यर्थः। शेषं गतप्रायम् ।।९।।
इस सूत्र के अनुसार आवरणपूजा का इस प्रकार विधान करना चाहिये—
१. अष्टार चक्र को सर्वरोगहर चक्र भी कहते हैं। उसी में यह पूजा सम्पन्न
होनी चाहिये।
२. इस सूत्र का पूरक सूत्र श्रीक्रम का सूत्र-सं. २० है। उसके अनुसार
वशिनीवाग्देवता के मन्त्र का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करने से तथ्य का
स्पष्टीकरण आवश्यक रूप से हो जाता है। जैसे—
'ऐं ह्रीं श्रीं (सविन्दु अच्) अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लं लूं एं ऐं ओं
औं अं अः ब्लूं वशिनीवाग्देवता श्रीपादुकां पूजयामि नमः' यहाँ तक आठों
के मन्त्र बोलकर सूत्रानुसार अन्त में 'एता रहस्ययोगिन्यः सर्वरोगहरचक्रे
समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः
सम्पूजिताः सन्तर्पिता सन्तुष्टाः सन्तु नमः' बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
३. मूर्त्ति-विद्या 'ह्रीं श्रीं सौः' बीजमन्त्र को कहते हैं। इस मन्त्र को बोलकर
'त्रिपुरासिद्धचक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः' मन्त्र का उच्चारण कर सातवीं
आवरणपूजा का अर्पण करते हैं। खेचरीमुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिये। इस
तरह साँतवीं आवरणपूजा पूरी करनी चाहिये।।९।।
ललितानवावरणपूजाक्रमः १२३
आयुधपूजा
बाणबीजान्युच्चार्य सर्वजृम्भणेभ्यो बाणेभ्यो नमः धं थं सर्व-
सम्मोहनाय क्रों सर्वस्तम्भनायाङ्कुशाय नम इति महात्र्यस्त्रबाह्य-
चतुर्दिक्षु बाणाद्यायुधपूजा ।।१०।।
बाणबीजानि 'द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः' इति पञ्च शैवबाणबीजानि।
कामेश्वरीबाणबीजानि 'यां रां लां वां सां' इति देव्या बाणबीजानि। इत्थं च
मन्त्रस्वरूपम्—
'यां रां लां वां सां द्रां द्रीं ब्लूं सः सर्वजृम्भणेभ्यो बाणेभ्यो नमः बाण-
श्रीपादुकां पूजयामि। धं थं सर्वमोहनाय धनुषे नमः धनुःश्रीपाशाय नमः
पाशश्रीपादुकां पूजयामि। क्रों सर्वस्तम्भनायाङ्कुशाय नमः अङ्कुश-श्रीपादुकां
पूजयामि नमः।'
महात्र्यस्त्रम् आद्य
१२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
त्रिकोण में वाक् ‘ऐं’ कामः ‘क्लीं’ शक्तिः ‘सौः’ बीजमन्त्रों को पूर्व में
प्रयुक्त कर कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी महादेवियों की पूजा करनी
चाहिये। ‘बिन्दु’ स्थान पर श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी की पूजा की जाती है। उदाहरणरूप
माँ कामेश्वरी का मन्त्र इस प्रकार से उच्चारण करना चाहिये—
‘ऐं वाग्भवात्मिका महाकामेश्वरीदेवी श्रीपादुकां पूजयामि’, इसी तरह चारों
देवियों की पूजा की जानी चाहिये। चतुर्थी महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी के नाम के
पूर्व में त्रितारी के साथ वाक्, काम और शक्तिबीजों का प्रयोग करना चाहिये।
पूर्व सूत्रों के अनुसार इस आवरण-पूजा में भी ‘एता अतिरहस्य-योगिन्यः
सर्वसिद्धिप्रदचक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः
सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु नमः’ बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी
चाहिये। इनको अतिरहस्य-योगिनी कहने का कारण यह है कि, परमशिवरूपी
महादीप की प्रकाशरूपा पराशक्ति ही वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों तथा
रजःप्रधान इच्छा, सत्व-प्रधान ज्ञान और तमःप्रधान क्रिया-शक्तियों के रूप में
सृष्टि में उल्लसित है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री की समष्टि देवी अम्बिका है।
त्रिपुरसुन्दरी की ये व्यष्टि शक्तियाँ रहस्यमयी होती हैं।।९१।।
कामेश्वर्यादीनां मूलदेव्यभिन्नत्वम्
तिसृणामासामनन्तरमभेदाय मूलदेव्याः पूजा। कामेश्वर्यादि-
चतुर्थीर्नित्यानां षोडशी चक्रदेवीनां नवमी बिन्दुचक्रस्था चेत्येकैव। न
तत्र मन्त्रदेवताभेदः कार्यः। तन्महादेव्या एव। चतुर्षु स्थलेषु
विशेषार्चनमावर्त्तते ।।९२।।
आसां कामेश्वर्यादीनां तिसृणामनन्तरम् आसां मूलदेव्यभिन्नत्व-
प्रतिपादनाय मूलदेव्याः पूजा। एवं स्थलान्तरेऽपि त्रिपुरसुन्दर्या अन्ते पूजनं तत्र
तत्र, स्वपूर्वदेवताकूटाभेदं ज्ञापयति।
प्रकृतचक्रे कामेश्वर्यादिभ्यः परं चतुर्थी, पञ्चदशनित्याभ्य परं षोडशी।
अष्टचक्रात्परं नवमे बिन्दौ सैव चकारसूचिता। पुनर्बिन्दावेव अष्टचक्रेशी
पूजानन्तरं चक्रेशीत्वेन पूज्या एकैव। तत्र एषु स्थलेषु देवताभेदो मन्त्रभेदश्च
ललितानवावरणपूजाक्रमः १२५
नास्ति। इत्थं च नित्याः समस्तावरणदेव्यश्च त्रिपुरसुन्दर्या अव्यतिरिक्ता एवेति
ज्ञापयितुं तत्तदन्ते उक्तमिति भावः।
ननु देवतैक्ये द्रव्यैक्ये मन्त्रैक्ये सकृदेव पूजनं युक्तं, किमिति
पूजात्रयम्? अत आह चतुर्षु स्थलेषु विशेषार्चनमावर्त्तत इति॥१२॥
कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी इन तीन देवियों की चर्चा सूत्र ११
में की गयी है। इन तीनों का मूल महादेवी से अभेद सम्बन्ध है। इसलिये मूल
देवी की पूजा का विधान सूत्रकार को अभीष्ट है। इसी प्रकार अन्य स्थलों
पर भी अन्त में त्रिपुरसुन्दरी की पूजा वहाँ करनी आवश्यक मानी गयी है।
परमाम्बा त्रिपुरसुन्दरी की यह अन्त में की जाने वाली पूजा यह सिद्ध करती
है कि, इन सभी पूज्यों में अभेद सम्बन्ध ही है। प्रकृत चक्र में कामेश्वरी आदि
इन तीनों के अनन्तर चतुर्थी, पञ्चदश नित्याओं के बाद षोडशी, आठवें चक्र
के बाद नवें बिन्दु पर भी षोडशी और अष्टचक्रेश्वरी की पूजा भी करनी चाहिये।
इस सारी प्रक्रिया में अभेद सम्बन्धों का आकलन प्रतिक्षण होते रहना चाहिये।
यह सारी पूजा एक ही पूजा है। एक की ही पूजा है। यहाँ कहीं भी मन्त्र-
भेदादि-प्रकल्पन के लिये कोई अवकाश नहीं है। सारी पूजा महादेवी की ही
पूजा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि, सारी आवरणान्तर्गत पूज्या
नित्यायें भगवती त्रिपुरसुन्दरी से व्यतिरिक्त नहीं हैं। इसीलिये सूत्र में 'अभेदाय
मूलदेव्याः पूजा' यह निर्देश सार्थक और चरितार्थ माना जाता है। सूत्रोक्त चारों
स्थलों पर विशेषार्चा का आवर्तन मात्र होता है॥१२॥
प्रासङ्गिकमुक्त्वा प्रकृतमाह
एता अतिरहस्ययोगिन्यः सर्वसिद्धिप्रदे चक्रे। परिशिष्टं
द्रष्टव्यम्। आवाहनीमुच्चार्य त्रिपुराम्बां सम्भाव्य 'हसौँ' इति
बीजमुद्राकृतिः ॥१३॥
परिशिष्टमनन्तरं पूर्ववद् इति शेषः, आवाहनी तत्प्रकरणोद्धृता विद्या
सम्भाव्य पूजयित्वा। कृतिः कर्त्तव्येत्यर्थः ॥१३॥
पहले नित्या पूजाओं में 'एता रहस्ययोगिन्यः' से लेकर 'पूजयामि नमः'
पर्यन्त निर्दिष्ट मन्त्र का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। यहाँ परिशिष्ट शब्द का
प्रयोग भी इसी तात्पर्य को व्यक्त करने के लिये किया गया है।
१२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
जहाँ तक आवाहनी का प्रश्न है, यह एक मुद्रा है और बीजमन्त्रमयी
भी है। सम्भाव्य शब्द का प्रयोग ण्यन्तार्था पूर्वकालिक क्रिया है। इसका अर्थ
पूजन करने के बाद होता है। कृति का अर्थ है—मुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये
अर्थात् दिखलानी चाहिये।।१३।।
नवमावरणपूजामाह
बिन्दुचक्रे मूलेन देवीमिष्ट्वा एषा परापररहस्ययोगिनी
सर्वानन्दमये चक्रे समुद्रा ससिद्धिः सायुधा सशक्तिः सवाहना
सपरिवारा सर्वोपचारैः सम्पूजिताऽस्त्विति पुनर्मूलमुच्चार्य महाचक्रे-
श्वरीमिष्ट्वा वाग्भवेन योनिं प्रदर्श्य ।।१४।।
बिन्दुचक्रे वाग्भवेन 'ऐं' इत्यनेन, न प्रथमकूटेन। मूलेन
पञ्चदश्या ।।१४।।
नवें आवरण की पूजा में मात्र ललिताम्बा की ही पूजा करने का निर्देश
सूत्रकार ने दिया है। इसीलिये 'देवी' एकवचनान्त शब्द प्रयुक्त किया गया है।
यह पूजा बिन्दु-चक्र में की जाती है। बिन्दु-चक्र को सर्वानन्दमय चक्र कहते
हैं। बिन्दु में 'सर्वानन्दचक्राय नमः' कहकर पुष्पाञ्जलि अर्पित करने के अर्थ में
ही 'इष्ट्वा' पूर्वकालिक क्रिया का प्रयोग किया गया है।
यह ध्यान देने की बात है कि, यह देवी परापरा-रहस्य-योगिनी मानी
जाती है। इसकी पूजा में 'एषा' से लेकर 'सम्पूजिता अस्तु' तक बोलकर पुनः
पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
पुनः पञ्चदशी का उच्चारण कर तथा 'महाचक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि
नमः' कहकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। इसके बाद वाग्भव बीज 'ऐं' कहकर योनि-
मुद्रा का प्रदर्शन कर पूजा पूरी की जाती है। पूजा के अन्त में यह मन्त्र परम्परा
बोलने की प्रथा है—
“अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले। भक्त्या समर्पये तुभ्यं ˙˙वरणार्चनम्”
बिन्दु की जगह प्रथम, द्वितीय आदि जिस आवरण की पूजा हो, वही संख्या-
वाचक शब्द जोड़ना चाहिये। इस प्रकार पूजा समर्पित की जाती है।।१४।।
ललितानवावरणपूजाक्रमः १२७
एवं नवावरणपूजां विधाय धूपादिदानं पूर्ववद्धूपदीपमुद्रा-
तर्पणनैवेद्यादि दत्त्वा ।।१५।।
धूपादिनैवेद्यान्तेषु पूर्वोक्तधर्माणां प्राप्त्यर्थं पूर्ववदिति। धूपादिषु पूर्वोक्त-
धर्मास्तद्धर्मका ये धूपादयः कार्या इत्यर्थः। ते च धर्मा धूपदीपनैवेद्येषु
पूर्वमन्त्राः। मुद्रासु पूर्ववत्त्वं तर्पणे मूलमन्त्रः त्रिभ्यासः। आदिपदेन ताम्बूल-
कर्पूरनीराजनप्रभृतयो ग्राह्याः ।।१५।।
पहले की तरह धूप और दीप अर्पित करने के मन्त्रों के साथ आवरण-
पूजा के अन्त में भी वही प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये सूत्र में स्पष्ट रूप
से 'पूर्ववत्' लिखकर निर्देश दिया गया है।
१. धूप और २. दीप अर्पण के बाद ३. मुद्रा का निर्देश है। मुद्रायें
सर्वसंक्षोभिणी आदि पहले बतलायी जा चुकी हैं। उनके साथ बीजमन्त्र भी बोले
जाते हैं। उनका भी यथावत् प्रदर्शन करना चाहिये।
चौथे क्रम पर तर्पण आता है। मूलमन्त्र से तीन बार तर्पण करना भी
आवश्यक होता है। पाँचवें स्थान पर नैवेद्य अर्पित करने का निर्देश है। परमाम्बा
का नैवेद्य साधारण नहीं अपि तु महानैवेद्य होता है। साधक अपनी सारी श्रद्धा
इस अवसर पर उड़ेल देता है।
महापरमाम्बा के समक्ष वेदी बनायी गयी हो। स्वर्ण कमण्डलु को देवापगा
गङ्गा के पवित्र उदक से परिपूर्ण करे। भोज्य, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य चारों
अङ्गों से परिपूर्ण, अन्य पेय पदार्थों से आप्यायनीय दधि-दुग्ध-मधुमय नैवेद्य को
भक्तिवृत्तिरूपी अप्सराओं ने भावभरित भव्यता से निर्मित कर वहाँ परिवेषित किया
है। भक्त हाथ जोड़कर इस भाव से विभोर होकर मूलविद्या का चिन्तन करते
हुए धेनु मुद्रा दिखाकर उसे अमृतमय कर दे। प्राण, अपान, व्यान, उदान और
समान मुद्राओं का क्रमशः समन्त्रक प्रयोग करे। प्रार्थना कर यह भावन करे कि,
माँ परमाम्बा इस नैवेद्य को पावन कर रही हैं। वह कृतार्थ होता रहे, श्रद्धामय
होता रहे। पुनः आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वमयी ललिताम्बा को मूल
मन्त्र के त्रिकूटों से तृप्त करे।
१२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
इस नैवेद्य विधि को सम्पन्न कर माँ परमाम्बा को ताम्बूल अर्पित करना
चाहिये। तत्पश्चात् कर्पूरनीराजन करने का विधान भी पूरा करना आवश्यक होता
है।।१५।।
कामकलाध्यानम्
बिन्दुना मुखं, बिन्दुद्वयेन कुचौ सपरार्धेन योनिं कृत्वा
कामकलामिति ध्यात्वा ।।१६।।
सूक्ष्मकलाध्यानं स्थूलञ्चेति द्विविधम्। स्थूलध्यानेन जितान्तःकरणः
सूक्ष्मकलां गुरुमुखात् ज्ञात्वा उपासीत। इत्थं मुखं कुचौ योनिं चांशत्रये कृत्वा
मनसा निर्माय कामकलां ध्यात्वा ।।१६।।
कामकला का ध्यान अत्यन्त सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म ध्यान का ही
साधनात्मक महत्त्व है। सेतुबन्ध में श्री भास्कर राय ने सूक्ष्म ध्यान का सुन्दर
विश्लेषण किया है। श्रेष्ठ साधक-शिरोमणि की योग्यता पर यह निर्भर करता
है। इसमें बिन्दु में यदि मुख का प्रकल्पन किया जाय तो मुख के साथ मातृशरीर
का विमर्श स्वयम् उल्लसित होगा। विश्ववत्स के आप्यायक स्तन दो बिन्दुओं
में उन्मिष्ट हो जाते हैं। पुत्र के लिये योनि का प्रकल्पन निषिद्ध रहते हुए भी
सूत्रकार ने सपरार्ध (ई) बीज से, उसे निर्दिष्ट कर आत्यन्तिक गोपनीयता का
संकेतमात्र ही किया है। यह ध्यान गुरुमुख से सीखना चाहिये। यों स्थूल ध्यान
की प्रक्रिया भी विमृश्य है।।१६।।
वर्णविशेषे ध्यानप्रकारमाह
सौभाग्यहृदयमामृश्य ।।१७।।
सौभाग्यस्य धर्मादि सकलपुरुषार्थस्य हृदयम् उपादानकारणम्। ईदृशं
पूर्वोक्तरूपम् आमृश्य ध्यात्वा। पूर्वसूत्रस्थ इति शब्दस्यात्रापि अनुवृत्तिः।
योगिनीतन्त्रे—
‘एवं कामकलारूपम् अक्षरं यत् समुत्थितम्।
कामादिविषमोक्षाणामालयं परमेश्वरि।।१७।।
सौभाग्य शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। धर्म आदि सारे पुरुषार्थों का
उपादानकारण भी सौभाग्य हृदय माना जाता है। इसका बीजमन्त्र पराबीज अर्थात्
ललितानवावरणपूजाक्रमः १२९
'सौः' माना जाता है। परात्रीशिका में इस बीजमन्त्र की महत्त्वपूर्ण व्याख्या की
गयी है। यही वह 'अक्षरतत्त्व' है, जिसका संकेत योगिनीतन्त्र में आया हुआ
है। सूत्र १६ और १७ में कामकला के विमर्श के मुख्य आधार बिन्दु, विसर्ग,
सपरार्ध और पराबीज हैं। गुरुदेव से इसे जानना आवश्यक है।।१७।।
अथ बलिप्रकारमाह
वामभागविहितत्रिकोणवृत्तचतुरस्रे गन्धाक्षतार्चिते वाग्भव-
मुच्चार्य व्यापकमण्डलाय नमः इत्यर्धभक्तभरिताम्भसा आदिमो-
पादिममध्यमभाजनं तत्र न्यस्य ।।१८।।
अत्र वामभागेन शीघ्रोपस्थितत्वात् स्वस्यैव वामभागो ग्राह्यः। विहिते
निर्मिते त्रिकोणवृत्तचतुरस्रे त्रिकोणमिति देव्युन्मुखम् इति न। निर्गमरीत्या
त्रिकोणं स्वाभिमुखं ग्राह्यम्। गन्धाक्षतेत्यनेन तदितरव्यावृत्तिर्दर्शिता। वाग्भवम्
'ऐं' इति। अर्धभक्तेन अन्नेन भरिताम्भसा च सहितम्। इदं भाजने विशेषणम्।
अन्नेन भरिताम्भसा च सहितम्। इदं भाजने विशेषणम्। एकस्मिन् पात्रे
अर्धांशम् अन्नेन अर्धांशं जलेन पूरयेत्। ईदृशमेकं पात्रं क्षीरादिपात्रत्रयं च
मण्डले न्यस्य अत्र बलिपात्रम् ताम्रमयम् ।।१८।।
सूत्रोक्त वामभाग से अपना ही बायाँ भाग अर्थ लेना चाहिये। इसी तरह
त्रिकोण भी अपने आगे का ही मानना चाहिये। विहित का अर्थ निर्मित लगाना
ही उत्तम अर्थ है। त्रिकोण के चारों ओर वृत्त और चतुरस्र युक्त मण्डल का
परिकल्पन करना विधान में सम्मिलित है। गन्ध और अक्षत मात्र से अर्चित
मण्डल में ताम्र पात्र में बलिपदार्थ रखना चाहिये। बलिपदार्थ के रूप में सूत्रकार
के निर्देश के अनुसार पात्र में आधा भक्त और आधा जल रखना ही उचित
है। साथ ही साथ आदिम, उपादिम और मध्यम तीन पात्र क्षीर आदि पदार्थों
से भर कर रखना भी आवश्यक है। बलिपदार्थ से भरे हुए बलिपात्र को उठाते
समय वाग्भवमन्त्र का उच्चारण करना चाहिये। सूत्र के अनुसार मन्त्र का रूप—
'ऐं व्यापकमण्डलाय नमः'
मन्त्र से बलिपदार्थ पदार्थ मण्डल में रखना चाहिये। 'ऐं' बीज को ही
वाग्भव बीज कहते हैं।।१८।।
१३० परशुरामकल्पसूत्रम्
बलिदाने मन्त्रमाह
'प्रणवमायान्ते सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं स्वाहा' इति
त्रिः पठित्वा बलिं दत्त्वा ।।१९।।
त्रिः इत्यनेन मंत्राभ्यासो विहितः। तेन त्रिपाठान्ते बलिदानम्। देवता
च मन्त्रलिङ्गेन ज्ञेया ।।१९।।
पात्र रखने के बाद प्रणव ओङ्कार और मायाबीज 'ह्रीं' के साथ
'सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं स्वाहा' यह मन्त्रांश बोलने पर पूरा मन्त्र त्रितारी
के साथ 'ऐं ह्रीं श्रीं ओम् ह्रीं सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं फट् स्वाहा' इस
प्रकार का बनता है। यह ध्यान देने की बात है कि, 'हुं' बीज के साथ 'फट्'
लगाना आवश्यक माना जाता है। इसी मन्त्र से बलि अर्पित करना चाहिये।
यह सोचना चाहिये कि, विघ्नकारी भूत इसे खा रहे हैं। जल देकर बाण-मुद्रा
दिखाकर प्रणाम करना चाहिये।।१९।।
प्रदक्षिणादि
प्रदक्षिणनमस्कारजपस्तोत्रैः सन्तोष्य ।।२०।।
प्रदक्षिणमेकं कार्यम्। नमस्कारे तु इच्छैव नियामिका। जपसंख्या—
'विद्यां जपेत् सहस्रं वा, त्रिशतं शतमेव वा। अयं जपः कर्माङ्गभूतः।
स्तोत्राणि' गणेशग्रहनक्षत्रत्यादिवामकेश्वरतन्त्रोक्तानि। सहस्रनामपाठः, अपराधस्तुतिः
सत्यवकाशे सप्तशतीपाठोऽपि। एवमादिभिः सन्तोष्य ।।२०।।
शास्त्र के शासन के अनुसार शक्तिपूजा में केवल एक बार प्रदक्षिणा करनी
चाहिये। शक्तिसङ्गमतन्त्र में लिखा है कि, विष्णु की चार बार, ईश की दो बार,
शक्ति की एक बार, गणेश की तीन बार और सूर्य की सात बार प्रदक्षिणा
करनी चाहिये। जहाँ तक नमस्कार का प्रश्न है, इसमें जिस प्रकार प्रणाम से
आत्मसन्तुष्टिपूर्वक देवसन्तुष्टि की भावना का मन में उल्लास हो, उसी प्रकार
दण्डवत् आदि करना चाहिये। इसके बाद जप का क्रम आता है। यह जप इस
कर्म का अङ्गभूत जप होता है। इसकी संख्या समय हो, तो एक हजार, अन्यथा
तीन सौ होनी चाहिये। यदि यह भी सम्भव न हो, तो कम से कम अष्टोत्तर
शत संख्या का जप अनिवार्यतः करना ही चाहिये।
ललितानवावरणपूजाक्रमः १३१
स्तोत्र विभिन्न प्रकार की स्तुतियों के लिये प्रयुक्त शब्द है। वामकेश्वर-
तन्त्र के अनुसार गणेश, ग्रह-नक्षत्र आदि देवों की स्तुति, सहस्रनाम पाठ,
अपराध-क्षमापन स्तोत्र और अवकाश रहने पर 'सप्तशती' का पाठ भी किया
जा सकता है। इस तरह माँ परमाम्बा को सन्तुष्ट करना चाहिये।।२०।।
शक्तिपूजा
तद्रूपिणीमेकां शक्तिं बाल्योपचारैः सम्पूज्य तां मपञ्चकेन
सन्तर्प्य ।।२१।।
तद्रूपिणीं त्रिपुरसुन्दरीरूपिणीम्। एकवचनेन अद्वितीयां सौन्दर्येणेत्यर्थः।
बालया मन्त्रेण। उपचारैः यथासम्भवैः। मपञ्चकेन सन्तर्पणं तस्या इच्छायां
सत्यां ज्ञेयम्। अयं भावः सन्तर्प्येत्यनेन ज्ञापितः। तर्पणं तृप्तिसम्पादनम्।
शक्तिं सुवासिनीम् ।।२१।।
शक्तिपूजा का यह सन्दर्भ अपना स्वतन्त्र महत्त्व रखता है। शक्ति की पूजा
ही तो अब तक की गयी है। यहाँ इसके लिये तद्रूपिणीं लिखा है। तत् शब्द
माँ त्रिपुरसुन्दरी का वाचक है। उसके समान अनिन्द्य-सौन्दर्य-समन्विता, सर्व-
सुलक्षणा एक ऐसी नारी को हम 'सुवासिनी' शब्द से अभिहित कर सकते हैं।
'बाला' की पूजा में जो उपचार प्रयुक्त होते हैं। उन सभी उपचारों से
उसकी पूजा करनी चाहिये। बालात्रिपुरसुन्दरी का मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः' माना जाता
है। इसी मन्त्र से उस सुवासिनी को उपचारित करना श्रेयस्कर होता है। उसकी
दीक्षा आदि का विचार करने के उपरान्त गुरु यह सब विधि सम्पन्न करे, यही
उचित है।
मपञ्चक से सन्तर्पण के अधिकारी गुरु को ही यह विधि सम्पन्न करनी
चाहिये। इसमें सुवासिनी की इच्छा का भी ध्यान रखना चाहिये। दीक्षाविधि के
सूत्र २४ में मपञ्चक का प्रकरण आया हुआ है। इसके अप्राप्त होने की अवस्था
में प्रतिनिधि पदार्थ से यह क्रम सम्पन्न करना चाहिये।
कुलार्णवतन्त्र के अनुसार मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये मपञ्चक
कहलाते हैं। इन्हें महापातकनाशन माना जाता है। सूत्रकार द्वारा सूत्रोक्त इस विधि
के सन्दर्भ पर पूर्ण विचार करना आवश्यक है।।२१।।
१३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषप्रतिपत्तिमाह
शिष्टैः सार्धं चिदग्नौ हविःशेषं हुत्वा ।।२२।।
शिष्टैः सामयिकैः सह चिदग्नौ चिल्लक्षणेऽग्नौ हविःशेषं देवतोद्देशेन
संस्कृतार्पितशेषम्, हुत्वेत्यनेन तत्र केवलहोमबुद्धिरेव विधेया। इन्द्रियतृप्ति-
विषयीणीच्छा कदापि न कार्या ।।२२।।
सूत्र में शिष्ट शब्द का प्रयोग अवशिष्ट अर्थ में नहीं अपि तु उसी
अनुशासन में रहने वाले कुलाचारपालक के अर्थ में प्रयोग किया गया है। इसका
पर्याय सामयिक शब्द भी समयपालक अर्थात् कुलाचारविहित समय पालन के
लिये प्रतिबद्ध अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। ऐसे शास्त्रानुशासन के अनुयायियों
के साथ हविःशेष का चिदग्नि में हवन करना चाहिये। देवता को लक्ष्य कर
संस्कृत और अर्पित करने पर बची हुई राशि को हवि कहते हैं। इस हविःशेष
का चिदग्नि में हवन करने का विधान सूत्रकार निर्दिष्ट कर रहे हैं। होम बुद्धि
से भावनात्मक हवन करना ही लक्ष्य है। इसलिये यहाँ हवन करना प्रत्यक्ष होम
रूप हवन नहीं है। केवल चिदग्नि हवन का भावन मात्र है। इन्द्रिय-तृप्तिविषया
इच्छा की यहाँ कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिये। इस हवन में आणव, मायीय
और कार्ममलों का शमन हो जाता है। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और जीवतत्त्व का
शोधन भी हो जाता है। कुलाचार का प्रदर्शन मात्र करने में कुशल स्वेच्छाचारी
के आडम्बर से बचकर यह हवन करना चाहिये। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना
जाता है।।२२।।
देवीविसर्जनम्
खेचरीं बद्ध्वा क्षमस्वेति विसृज्य तामात्मनि संयोजयेद् इति
शिवम् ।।२३।।
खेचरीं बध्वा, बन्धनानन्तरं 'ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यद्यदाचरितं शिवे।
तव कृत्यमिति ज्ञात्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।' इति क्षमाप्य विसृजेत्। विसर्गो नाम
पूजार्थमाहूतायाः पुनः स्थानं प्रति नयनम्। एवं विसृज्य ताम् आत्मनि
हत्कमले योजयेत् स्थापयेत्। शिवमिति प्रकरणसमाप्तिद्योतकम्।।२३।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललितानवावरणपूजानाम
पञ्चमः खण्डः सम्पूर्णः ।।५।।
ललितानवावरणपूजाक्रमः १३३
खेचरी मुद्रा योगतन्त्रप्रसिद्ध एक ऐसी मुद्रा है, जिससे व्यक्ति सच्चे
अर्थ में विहङ्गम हो जाता है। श्रीमालिनीविजयोत्तरतन्त्र में इसकी विस्तृत
व्याख्या के साथ इसे परिभाषित किया गया है। इसकी विधि इस प्रकार
अपनायी जाती है—
१. पद्मासन बद्ध और पद्मासन सिद्ध होना आवश्यक है।
२. नाभि में मनरूपी अक्षेश्वर को मणिपूर में अवस्थित कर प्राण को दण्डाकार
रूप देते हुए, बिन्दु, नाद और ब्रह्मरन्ध्र 'ख' प्रदेश तक पहुँचाकर पुनः
स्पन्द रूप से शक्ति, व्यापिनी और समना तीन 'ख' पड़ावों को पार कर
'उन्मना' के चिदाकाश में पराशक्ति और परशिव के अभिमुख करने का
आचरण ही खेचर भाव को प्राप्त करना कहलाता है।
३. इससे आकाश में गतिशीलता की प्राप्ति हो जाती है।
४. इस आकाश-चारिता को परबोध-गगन संचार भी कहते हैं। त्रिशूलिनी,
करङ्किणी और ज्वालिनी आदि इसके कई भेद होते हैं।
खेचरी मुद्राबन्ध की सामरस्य दशा में अवस्थित होकर परमाम्बा का
विसर्जन करना चाहिये। यहाँ विसर्जन का अर्थ विदा करना नहीं अपि तु
स्वात्मरूपाधिष्ठान का प्रकल्पण माना जाता है। इस प्रकार के विसर्जन में सबसे
महत्त्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि, स्वात्म की सत्ता का जो आत्मकेन्द्ररूप हृदय
है, उसमें उसका योजन विशिष्ट रूप से विमृष्ट होना चाहिये। यह संयोजन ही
सामरस्य को भी सिद्ध करता है। यह एक अतीन्द्रिय दशा है। श्रीविद्या साधना
में निष्णात इस आयोजन-संयोजन से धन्य हो जाता है।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललितानवावरणपूजाक्रम नामक पञ्चम खण्ड परिपूर्ण ।।५।।
।। इति शिवम् ।।