परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
त्रिकोण में वाक् ‘ऐं’ कामः ‘क्लीं’ शक्तिः ‘सौः’ बीजमन्त्रों को पूर्व में
प्रयुक्त कर कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी महादेवियों की पूजा करनी
चाहिये। ‘बिन्दु’ स्थान पर श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी की पूजा की जाती है। उदाहरणरूप
माँ कामेश्वरी का मन्त्र इस प्रकार से उच्चारण करना चाहिये—
‘ऐं वाग्भवात्मिका महाकामेश्वरीदेवी श्रीपादुकां पूजयामि’, इसी तरह चारों
देवियों की पूजा की जानी चाहिये। चतुर्थी महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी के नाम के
पूर्व में त्रितारी के साथ वाक्, काम और शक्तिबीजों का प्रयोग करना चाहिये।
पूर्व सूत्रों के अनुसार इस आवरण-पूजा में भी ‘एता अतिरहस्य-योगिन्यः
सर्वसिद्धिप्रदचक्रे समुद्राः ससिद्धयः सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः
सर्वोपचारैः सम्पूजिताः सन्तर्पिताः सन्तुष्टाः सन्तु नमः’ बोलकर पुष्पाञ्जलि देनी
चाहिये। इनको अतिरहस्य-योगिनी कहने का कारण यह है कि, परमशिवरूपी
महादीप की प्रकाशरूपा पराशक्ति ही वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों तथा
रजःप्रधान इच्छा, सत्व-प्रधान ज्ञान और तमःप्रधान क्रिया-शक्तियों के रूप में
सृष्टि में उल्लसित है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री की समष्टि देवी अम्बिका है।
त्रिपुरसुन्दरी की ये व्यष्टि शक्तियाँ रहस्यमयी होती हैं।।९१।।
कामेश्वर्यादीनां मूलदेव्यभिन्नत्वम्
तिसृणामासामनन्तरमभेदाय मूलदेव्याः पूजा। कामेश्वर्यादि-
चतुर्थीर्नित्यानां षोडशी चक्रदेवीनां नवमी बिन्दुचक्रस्था चेत्येकैव। न
तत्र मन्त्रदेवताभेदः कार्यः। तन्महादेव्या एव। चतुर्षु स्थलेषु
विशेषार्चनमावर्त्तते ।।९२।।
आसां कामेश्वर्यादीनां तिसृणामनन्तरम् आसां मूलदेव्यभिन्नत्व-
प्रतिपादनाय मूलदेव्याः पूजा। एवं स्थलान्तरेऽपि त्रिपुरसुन्दर्या अन्ते पूजनं तत्र
तत्र, स्वपूर्वदेवताकूटाभेदं ज्ञापयति।
प्रकृतचक्रे कामेश्वर्यादिभ्यः परं चतुर्थी, पञ्चदशनित्याभ्य परं षोडशी।
अष्टचक्रात्परं नवमे बिन्दौ सैव चकारसूचिता। पुनर्बिन्दावेव अष्टचक्रेशी
पूजानन्तरं चक्रेशीत्वेन पूज्या एकैव। तत्र एषु स्थलेषु देवताभेदो मन्त्रभेदश्च