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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 320 में से

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पृष्ठ 168

१२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
जहाँ तक आवाहनी का प्रश्न है, यह एक मुद्रा है और बीजमन्त्रमयी
भी है। सम्भाव्य शब्द का प्रयोग ण्यन्तार्था पूर्वकालिक क्रिया है। इसका अर्थ
पूजन करने के बाद होता है। कृति का अर्थ है—मुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये
अर्थात् दिखलानी चाहिये।।१३।।
नवमावरणपूजामाह
बिन्दुचक्रे मूलेन देवीमिष्ट्वा एषा परापररहस्ययोगिनी
सर्वानन्दमये चक्रे समुद्रा ससिद्धिः सायुधा सशक्तिः सवाहना
सपरिवारा सर्वोपचारैः सम्पूजिताऽस्त्विति पुनर्मूलमुच्चार्य महाचक्रे-
श्वरीमिष्ट्वा वाग्भवेन योनिं प्रदर्श्य ।।१४।।
बिन्दुचक्रे वाग्भवेन 'ऐं' इत्यनेन, न प्रथमकूटेन। मूलेन
पञ्चदश्या ।।१४।।
नवें आवरण की पूजा में मात्र ललिताम्बा की ही पूजा करने का निर्देश
सूत्रकार ने दिया है। इसीलिये 'देवी' एकवचनान्त शब्द प्रयुक्त किया गया है।
यह पूजा बिन्दु-चक्र में की जाती है। बिन्दु-चक्र को सर्वानन्दमय चक्र कहते
हैं। बिन्दु में 'सर्वानन्दचक्राय नमः' कहकर पुष्पाञ्जलि अर्पित करने के अर्थ में
ही 'इष्ट्वा' पूर्वकालिक क्रिया का प्रयोग किया गया है।
यह ध्यान देने की बात है कि, यह देवी परापरा-रहस्य-योगिनी मानी
जाती है। इसकी पूजा में 'एषा' से लेकर 'सम्पूजिता अस्तु' तक बोलकर पुनः
पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये।
पुनः पञ्चदशी का उच्चारण कर तथा 'महाचक्रेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि
नमः' कहकर पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। इसके बाद वाग्भव बीज 'ऐं' कहकर योनि-
मुद्रा का प्रदर्शन कर पूजा पूरी की जाती है। पूजा के अन्त में यह मन्त्र परम्परा
बोलने की प्रथा है—
“अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले। भक्त्या समर्पये तुभ्यं ˙˙वरणार्चनम्”
बिन्दु की जगह प्रथम, द्वितीय आदि जिस आवरण की पूजा हो, वही संख्या-
वाचक शब्द जोड़ना चाहिये। इस प्रकार पूजा समर्पित की जाती है।।१४।।