सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

ललितानवावरणपूजाक्रमः १२५
नास्ति। इत्थं च नित्याः समस्तावरणदेव्यश्च त्रिपुरसुन्दर्या अव्यतिरिक्ता एवेति
ज्ञापयितुं तत्तदन्ते उक्तमिति भावः।
ननु देवतैक्ये द्रव्यैक्ये मन्त्रैक्ये सकृदेव पूजनं युक्तं, किमिति
पूजात्रयम्? अत आह चतुर्षु स्थलेषु विशेषार्चनमावर्त्तत इति॥१२॥
कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी इन तीन देवियों की चर्चा सूत्र ११
में की गयी है। इन तीनों का मूल महादेवी से अभेद सम्बन्ध है। इसलिये मूल
देवी की पूजा का विधान सूत्रकार को अभीष्ट है। इसी प्रकार अन्य स्थलों
पर भी अन्त में त्रिपुरसुन्दरी की पूजा वहाँ करनी आवश्यक मानी गयी है।
परमाम्बा त्रिपुरसुन्दरी की यह अन्त में की जाने वाली पूजा यह सिद्ध करती
है कि, इन सभी पूज्यों में अभेद सम्बन्ध ही है। प्रकृत चक्र में कामेश्वरी आदि
इन तीनों के अनन्तर चतुर्थी, पञ्चदश नित्याओं के बाद षोडशी, आठवें चक्र
के बाद नवें बिन्दु पर भी षोडशी और अष्टचक्रेश्वरी की पूजा भी करनी चाहिये।
इस सारी प्रक्रिया में अभेद सम्बन्धों का आकलन प्रतिक्षण होते रहना चाहिये।
यह सारी पूजा एक ही पूजा है। एक की ही पूजा है। यहाँ कहीं भी मन्त्र-
भेदादि-प्रकल्पन के लिये कोई अवकाश नहीं है। सारी पूजा महादेवी की ही
पूजा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि, सारी आवरणान्तर्गत पूज्या
नित्यायें भगवती त्रिपुरसुन्दरी से व्यतिरिक्त नहीं हैं। इसीलिये सूत्र में 'अभेदाय
मूलदेव्याः पूजा' यह निर्देश सार्थक और चरितार्थ माना जाता है। सूत्रोक्त चारों
स्थलों पर विशेषार्चा का आवर्तन मात्र होता है॥१२॥
प्रासङ्गिकमुक्त्वा प्रकृतमाह
एता अतिरहस्ययोगिन्यः सर्वसिद्धिप्रदे चक्रे। परिशिष्टं
द्रष्टव्यम्। आवाहनीमुच्चार्य त्रिपुराम्बां सम्भाव्य 'हसौँ' इति
बीजमुद्राकृतिः ॥१३॥
परिशिष्टमनन्तरं पूर्ववद् इति शेषः, आवाहनी तत्प्रकरणोद्धृता विद्या
सम्भाव्य पूजयित्वा। कृतिः कर्त्तव्येत्यर्थः ॥१३॥
पहले नित्या पूजाओं में 'एता रहस्ययोगिन्यः' से लेकर 'पूजयामि नमः'
पर्यन्त निर्दिष्ट मन्त्र का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। यहाँ परिशिष्ट शब्द का
प्रयोग भी इसी तात्पर्य को व्यक्त करने के लिये किया गया है।