परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललितानवावरणपूजाक्रमः १२७
एवं नवावरणपूजां विधाय धूपादिदानं पूर्ववद्धूपदीपमुद्रा-
तर्पणनैवेद्यादि दत्त्वा ।।१५।।
धूपादिनैवेद्यान्तेषु पूर्वोक्तधर्माणां प्राप्त्यर्थं पूर्ववदिति। धूपादिषु पूर्वोक्त-
धर्मास्तद्धर्मका ये धूपादयः कार्या इत्यर्थः। ते च धर्मा धूपदीपनैवेद्येषु
पूर्वमन्त्राः। मुद्रासु पूर्ववत्त्वं तर्पणे मूलमन्त्रः त्रिभ्यासः। आदिपदेन ताम्बूल-
कर्पूरनीराजनप्रभृतयो ग्राह्याः ।।१५।।
पहले की तरह धूप और दीप अर्पित करने के मन्त्रों के साथ आवरण-
पूजा के अन्त में भी वही प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये सूत्र में स्पष्ट रूप
से 'पूर्ववत्' लिखकर निर्देश दिया गया है।
१. धूप और २. दीप अर्पण के बाद ३. मुद्रा का निर्देश है। मुद्रायें
सर्वसंक्षोभिणी आदि पहले बतलायी जा चुकी हैं। उनके साथ बीजमन्त्र भी बोले
जाते हैं। उनका भी यथावत् प्रदर्शन करना चाहिये।
चौथे क्रम पर तर्पण आता है। मूलमन्त्र से तीन बार तर्पण करना भी
आवश्यक होता है। पाँचवें स्थान पर नैवेद्य अर्पित करने का निर्देश है। परमाम्बा
का नैवेद्य साधारण नहीं अपि तु महानैवेद्य होता है। साधक अपनी सारी श्रद्धा
इस अवसर पर उड़ेल देता है।
महापरमाम्बा के समक्ष वेदी बनायी गयी हो। स्वर्ण कमण्डलु को देवापगा
गङ्गा के पवित्र उदक से परिपूर्ण करे। भोज्य, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य चारों
अङ्गों से परिपूर्ण, अन्य पेय पदार्थों से आप्यायनीय दधि-दुग्ध-मधुमय नैवेद्य को
भक्तिवृत्तिरूपी अप्सराओं ने भावभरित भव्यता से निर्मित कर वहाँ परिवेषित किया
है। भक्त हाथ जोड़कर इस भाव से विभोर होकर मूलविद्या का चिन्तन करते
हुए धेनु मुद्रा दिखाकर उसे अमृतमय कर दे। प्राण, अपान, व्यान, उदान और
समान मुद्राओं का क्रमशः समन्त्रक प्रयोग करे। प्रार्थना कर यह भावन करे कि,
माँ परमाम्बा इस नैवेद्य को पावन कर रही हैं। वह कृतार्थ होता रहे, श्रद्धामय
होता रहे। पुनः आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वमयी ललिताम्बा को मूल
मन्त्र के त्रिकूटों से तृप्त करे।