परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० परशुरामकल्पसूत्रम्
बलिदाने मन्त्रमाह
'प्रणवमायान्ते सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं स्वाहा' इति
त्रिः पठित्वा बलिं दत्त्वा ।।१९।।
त्रिः इत्यनेन मंत्राभ्यासो विहितः। तेन त्रिपाठान्ते बलिदानम्। देवता
च मन्त्रलिङ्गेन ज्ञेया ।।१९।।
पात्र रखने के बाद प्रणव ओङ्कार और मायाबीज 'ह्रीं' के साथ
'सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं स्वाहा' यह मन्त्रांश बोलने पर पूरा मन्त्र त्रितारी
के साथ 'ऐं ह्रीं श्रीं ओम् ह्रीं सर्वविघ्नकृद्भ्यः सर्वभूतेभ्यो हुं फट् स्वाहा' इस
प्रकार का बनता है। यह ध्यान देने की बात है कि, 'हुं' बीज के साथ 'फट्'
लगाना आवश्यक माना जाता है। इसी मन्त्र से बलि अर्पित करना चाहिये।
यह सोचना चाहिये कि, विघ्नकारी भूत इसे खा रहे हैं। जल देकर बाण-मुद्रा
दिखाकर प्रणाम करना चाहिये।।१९।।
प्रदक्षिणादि
प्रदक्षिणनमस्कारजपस्तोत्रैः सन्तोष्य ।।२०।।
प्रदक्षिणमेकं कार्यम्। नमस्कारे तु इच्छैव नियामिका। जपसंख्या—
'विद्यां जपेत् सहस्रं वा, त्रिशतं शतमेव वा। अयं जपः कर्माङ्गभूतः।
स्तोत्राणि' गणेशग्रहनक्षत्रत्यादिवामकेश्वरतन्त्रोक्तानि। सहस्रनामपाठः, अपराधस्तुतिः
सत्यवकाशे सप्तशतीपाठोऽपि। एवमादिभिः सन्तोष्य ।।२०।।
शास्त्र के शासन के अनुसार शक्तिपूजा में केवल एक बार प्रदक्षिणा करनी
चाहिये। शक्तिसङ्गमतन्त्र में लिखा है कि, विष्णु की चार बार, ईश की दो बार,
शक्ति की एक बार, गणेश की तीन बार और सूर्य की सात बार प्रदक्षिणा
करनी चाहिये। जहाँ तक नमस्कार का प्रश्न है, इसमें जिस प्रकार प्रणाम से
आत्मसन्तुष्टिपूर्वक देवसन्तुष्टि की भावना का मन में उल्लास हो, उसी प्रकार
दण्डवत् आदि करना चाहिये। इसके बाद जप का क्रम आता है। यह जप इस
कर्म का अङ्गभूत जप होता है। इसकी संख्या समय हो, तो एक हजार, अन्यथा
तीन सौ होनी चाहिये। यदि यह भी सम्भव न हो, तो कम से कम अष्टोत्तर
शत संख्या का जप अनिवार्यतः करना ही चाहिये।