परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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इस नैवेद्य विधि को सम्पन्न कर माँ परमाम्बा को ताम्बूल अर्पित करना
चाहिये। तत्पश्चात् कर्पूरनीराजन करने का विधान भी पूरा करना आवश्यक होता
है।।१५।।
कामकलाध्यानम्
बिन्दुना मुखं, बिन्दुद्वयेन कुचौ सपरार्धेन योनिं कृत्वा
कामकलामिति ध्यात्वा ।।१६।।
सूक्ष्मकलाध्यानं स्थूलञ्चेति द्विविधम्। स्थूलध्यानेन जितान्तःकरणः
सूक्ष्मकलां गुरुमुखात् ज्ञात्वा उपासीत। इत्थं मुखं कुचौ योनिं चांशत्रये कृत्वा
मनसा निर्माय कामकलां ध्यात्वा ।।१६।।
कामकला का ध्यान अत्यन्त सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म ध्यान का ही
साधनात्मक महत्त्व है। सेतुबन्ध में श्री भास्कर राय ने सूक्ष्म ध्यान का सुन्दर
विश्लेषण किया है। श्रेष्ठ साधक-शिरोमणि की योग्यता पर यह निर्भर करता
है। इसमें बिन्दु में यदि मुख का प्रकल्पन किया जाय तो मुख के साथ मातृशरीर
का विमर्श स्वयम् उल्लसित होगा। विश्ववत्स के आप्यायक स्तन दो बिन्दुओं
में उन्मिष्ट हो जाते हैं। पुत्र के लिये योनि का प्रकल्पन निषिद्ध रहते हुए भी
सूत्रकार ने सपरार्ध (ई) बीज से, उसे निर्दिष्ट कर आत्यन्तिक गोपनीयता का
संकेतमात्र ही किया है। यह ध्यान गुरुमुख से सीखना चाहिये। यों स्थूल ध्यान
की प्रक्रिया भी विमृश्य है।।१६।।
वर्णविशेषे ध्यानप्रकारमाह
सौभाग्यहृदयमामृश्य ।।१७।।
सौभाग्यस्य धर्मादि सकलपुरुषार्थस्य हृदयम् उपादानकारणम्। ईदृशं
पूर्वोक्तरूपम् आमृश्य ध्यात्वा। पूर्वसूत्रस्थ इति शब्दस्यात्रापि अनुवृत्तिः।
योगिनीतन्त्रे—
‘एवं कामकलारूपम् अक्षरं यत् समुत्थितम्।
कामादिविषमोक्षाणामालयं परमेश्वरि।।१७।।
सौभाग्य शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। धर्म आदि सारे पुरुषार्थों का
उपादानकारण भी सौभाग्य हृदय माना जाता है। इसका बीजमन्त्र पराबीज अर्थात्