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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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ललितानवावरणपूजाक्रमः १२९
'सौः' माना जाता है। परात्रीशिका में इस बीजमन्त्र की महत्त्वपूर्ण व्याख्या की
गयी है। यही वह 'अक्षरतत्त्व' है, जिसका संकेत योगिनीतन्त्र में आया हुआ
है। सूत्र १६ और १७ में कामकला के विमर्श के मुख्य आधार बिन्दु, विसर्ग,
सपरार्ध और पराबीज हैं। गुरुदेव से इसे जानना आवश्यक है।।१७।।
अथ बलिप्रकारमाह
वामभागविहितत्रिकोणवृत्तचतुरस्रे गन्धाक्षतार्चिते वाग्भव-
मुच्चार्य व्यापकमण्डलाय नमः इत्यर्धभक्तभरिताम्भसा आदिमो-
पादिममध्यमभाजनं तत्र न्यस्य ।।१८।।
अत्र वामभागेन शीघ्रोपस्थितत्वात् स्वस्यैव वामभागो ग्राह्यः। विहिते
निर्मिते त्रिकोणवृत्तचतुरस्रे त्रिकोणमिति देव्युन्मुखम् इति न। निर्गमरीत्या
त्रिकोणं स्वाभिमुखं ग्राह्यम्। गन्धाक्षतेत्यनेन तदितरव्यावृत्तिर्दर्शिता। वाग्भवम्
'ऐं' इति। अर्धभक्तेन अन्नेन भरिताम्भसा च सहितम्। इदं भाजने विशेषणम्।
अन्नेन भरिताम्भसा च सहितम्। इदं भाजने विशेषणम्। एकस्मिन् पात्रे
अर्धांशम् अन्नेन अर्धांशं जलेन पूरयेत्। ईदृशमेकं पात्रं क्षीरादिपात्रत्रयं च
मण्डले न्यस्य अत्र बलिपात्रम् ताम्रमयम् ।।१८।।
सूत्रोक्त वामभाग से अपना ही बायाँ भाग अर्थ लेना चाहिये। इसी तरह
त्रिकोण भी अपने आगे का ही मानना चाहिये। विहित का अर्थ निर्मित लगाना
ही उत्तम अर्थ है। त्रिकोण के चारों ओर वृत्त और चतुरस्र युक्त मण्डल का
परिकल्पन करना विधान में सम्मिलित है। गन्ध और अक्षत मात्र से अर्चित
मण्डल में ताम्र पात्र में बलिपदार्थ रखना चाहिये। बलिपदार्थ के रूप में सूत्रकार
के निर्देश के अनुसार पात्र में आधा भक्त और आधा जल रखना ही उचित
है। साथ ही साथ आदिम, उपादिम और मध्यम तीन पात्र क्षीर आदि पदार्थों
से भर कर रखना भी आवश्यक है। बलिपदार्थ से भरे हुए बलिपात्र को उठाते
समय वाग्भवमन्त्र का उच्चारण करना चाहिये। सूत्र के अनुसार मन्त्र का रूप—
'ऐं व्यापकमण्डलाय नमः'
मन्त्र से बलिपदार्थ पदार्थ मण्डल में रखना चाहिये। 'ऐं' बीज को ही
वाग्भव बीज कहते हैं।।१८।।