पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
२२ पाकदर्पणम्
प्रकार के मूँग की दाल लेकर बटलोही में पकावे । अच्छी तरह दाल के पक जाने
पर सेन्धानमक तथा हींग छोड़ दे । विद्वान् पाचक इस प्रकार के दाल को कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर ले । इसके बाद कलछुल से धीरे चलाकर
दाल को राजा के लिये दे । यह स्वादिष्ट दाल संसार के हित के लिये कहा गया
है । अमृत समान दाल सद्यः वीर्यवर्द्धक है और देवताओं को भी दुर्लभ है ।
सूपप्रशस्तिः
माषादिसामन्तनृपैरनेकैः रम्भाप्रसूनप्रमुखैर्बलौघैः ।
शाल्यन्नसिंहासनगो विभाति घृतात्तपत्रः खलु सूपभूपः ॥ १४१ ॥
सूप (दाल) की प्रशंसा—माष (उड़द) अरहर आदि रूप अनेक सामन्त
राजाओं से तथा केला, पुष्प आदि रूप प्रमुख सेनासमूहों से घृत रूप छत्र से युक्त
सूपराज मूंग की दाल शालि (जड़हन चावल का) भातरूपी सिंहासन पर स्थित
होकर सु शोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
तेमनतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्चः
सप्रभेदः सूपभेदः कथितः कथ्यते खलु ।
जातितोलुलितं तक्रं तिलतैलेन संयुतम् ॥ १४२ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तं कुसुमैरधिवासयेत् ।
मुहूर्त्तमात्रं संस्थाप्य कुसुमानि परित्यजेत् ॥ १४३ ॥
लशुनार्द्रकयोः खण्डान् पुनस्तत्र विनिक्षिपेत् ।
कुम्भीदलं च धान्याकं शुण्ठीचूर्णं च निक्षिपेत् ॥ १४४ ॥
सैन्धवं च यथा योग्यं जम्बीराम्लञ्च निक्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य कुर्यादालोडनं बुधः ॥ १४५ ॥
चुल्यां पचेच्च तं तक्रं दवघट्टनपूर्वकम् ।
पाकार्थं निक्षिपेत्तत्र शुचिभिन्नमरीचिकाः ॥ १४६ ॥
तद्यावतां कटु भवेत्तावत् पाकावतारयेत् ।
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्यामस्यां प्रदापयेत् ॥ १४७ ॥
दर्वीविघट्टनं कृत्वा तेमनं तत्र निक्षिपेत् ।
पिधानेन समाच्छाद्य तन्मुखं तत्पुनः पचेत् ॥ १४८ ॥
प्रकृतेऽस्मिन् तदादाय मातुलुंगदलं क्षिपेत् ।
कर्पूरं मृगनाभि च केतकी कुसुमं न्यसेत् ॥ १४९ ॥
स्वादु पथ्यं लघुतरं तेमनं तत्र सम्भवम् ।
आरोग्यदं रोगहरं वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५० ॥
नलविरचितम् २३
तेमन तक्र (मट्ठा) बनाने की विधि तथा गुण—सूप (दाल) के विविध
भेद को मैंने कहा । अब तेमन तक्र को कहता हूँ। अच्छी तरह मथा हुआ तक्र
(मट्ठा) तिल तैल के साथ मिला दे और सुगन्ध से युक्त कर फूल से सुवासित
कर दे । पुष्पों को मट्ठा में थोड़ा देर रखकर निकाल दे । इसके बाद लहसुन
तथा अदरक के टुकड़ों को उसमे छोड़ दे । पुनः कट्फल का पत्र, धनिया तथा
सोंठ का चूर्ण, उचित मात्रा में सेन्धानमक तथा जम्बीरी नीबू छोड़ दे । इसके
बाद उसमें हींग छोड़कर बुद्धिमान् पाचक अच्छी तरह मिला दे । इन द्रव्यों से
युक्त तक्र को कलछुल से चलाते हुए चुल्ही के ऊपर पकाये । उसमें पाक के लिये
शुद्धमरिच का चूर्ण छोड़ दे । जब तब वह कड़ुआ न हो जाय तब तक पाक करे ।
वटलोही में रखकर चूल्हे के ऊपर रखे । कलछुल से चला कर उसमें "तेमन"१
छोड़ दे, और ढक्कन से उसका मुँह ढँक कर पुनः पाक करें । अच्छी तरह परि-
पाक हो जाने पर विजोरा नीबू का दल छोड़ दे इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी
तथा केवड़ा का फूल रक्खे । इस प्रकार तैयार "तेमन तक्र" स्वादिष्ट, पथ्यकारक
तथा हल्का होता है। यह आरोग्यप्रद, रोगनाशक, वात-कफ को दूर करनेवाला
तथा कल्याण कारक होता है ॥ १४२-१५० ॥
'खलतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पुनर्नवा तथा वह्निघजाजीतक्रसमुद्भवम् ।
वासितं घनशारेण वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५१ ॥
खलं गुल्महरं शीघ्रं पुष्पैश्च सुमनोहरैः ।
अशीतिवातजान् रोगान् जठरानलवृद्धिकृत् ॥ १५२ ॥
खल तक्र बनाने की विधि तथा गुण—पुनर्नवा, चित्रक, अजाजी (जीरा)
तथा तक्र से बनाया हुआ कर्पूर तथा मनोहर पुष्पों से सुवासित किया हुआ "खल
तक्र"२ शीघ्र ही गुल्म रोग को दूर करता है। यह अस्सी प्रकार के वात रोगों
को नाश करता है तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १५१-१५२ ॥
१. व्यञ्जनं सूपशाकादि मिष्ठान्न तेमनं स्मृतम्—(रा० नि० २०) ।
२. मालवे व्यञ्जनविशेषः । मातुधानीयकपुष्पैर्योषितगुणः स "खल" इत्युच्यते ।
फलमूलैर्धनादानं व्यञ्जनं पाकतो घनम् । लेहवत् खल इत्यन्ये दोषलाः स्व
स्व योनिवत् ।। कल्को विल्वशलाटूनां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः सरोऽम्लः
सस्नेहः खलो हन्ति प्रवाहिकाम् । श्रीकुक्कुटः अपराजितश्च नामपरो खला-
वपि । (वा० चि०-९।१२) ।
२४ पाकदर्पणम्
त्रिकटुकखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तक्राजमोदसंयुक्तः खलस्त्रिकटुकोद्भवः ।
वासितः प्रसवैः सम्यक् सुगन्धसुमनोहरैः ॥ १५३ ॥
औदरानामयान् हन्ति जठराग्निप्रवर्द्धनम् ॥ १५४ ॥
त्रिकटु खल बनाने की विधि तथा गुण - तक्र (मट्ठा) तथा अजवायन से
युक्त त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) से बनाया हुआ सुगन्धित एवं मनोहर पुष्पों
से अच्छी तरह सुवासित किया हुआ खल (त्रिकटु खल) उदर के रोगों को नष्ट
करता है। तथा जाठराग्नि को बढ़ाता है ॥ १५३-१५४ ॥
शुद्धतेमननिर्माणविधिर्गुणांश्च
तक्रस्याम्लं मर्दयित्वा जलेन च विचक्षणः ।
तत्र सैन्धवसिद्धार्थं मरीचानागरोद्भवम् ॥ १५५ ॥
कल्कं चालोडयित्वा च वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
अयं तक्रसमुत्पन्नः खलो दीपनपाचनः ॥ १५६ ॥
त्रिदोषशमनं सम्यक् पीयूषसदृशः शुभः ॥ १५७ ॥
शुद्ध तेमन बनाने की विधि तथा गुण - बुद्धिमान् पाचक अम्लतक्र को जल
के साथ मर्दन कर उसमें सेन्धा नमक, सरसों, मरिच तथा सोंठ का कल्फ मिलाकर
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करें। यह तक्र के योग से बना हुआ खल
(शुद्ध तेमन) जाठराग्निदीपक तथा पाचक है। यह अच्छी तरह त्रिदोष को
शान्त करनेवाला अमृत के समान कल्याणकारक है ॥ १५५-१५७॥
कैटर्यं खलनिर्माणविधिर्गुणांश्च
व्योषकैडर्यलसुनजीरकाणि पुनर्नवैः ।
सैन्धवप्रमुखैर्युक्तः शरीरालनकृत्खलः ॥ १५८ ॥
कैटर्य खल निर्माणविधि तथा गुण - व्योष (सोंठ, पीपर, मरिच) कैटर्य
(कट्फल) लहसुन, जीरा, पुनर्नवा, सेन्धानमक आदि प्रमुख द्रव्यों से युक्त खल
(कैटर्य खल) जाठराग्नि को बढ़ानेवाला हैं। अर्थात् पूर्वोक्त खल में व्योष आदि
द्रव्यों को मिला देने से इसे कैटर्यखल कहते हैं और यह जाठराग्निवर्द्धक है ॥१५८॥
विशिष्टखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मरिचं लशुनं चैवं निर्गुण्डी वैजयन्तिका ।
कर्णमालाग्निकाचूतजीरकाहिङ्गु सैन्धवान् ॥ १५९ ॥
पेषयित्वा यथामात्रमेतान् तक्रेण लोडयेत् ।
आलोड़ितं पुनः कल्कं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १६० ॥
नर्लविरचितम् २५
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्ल्यां सं च प्रदापयेत् ।
निक्षिप्य गोघृतं तत्र नयेत्तस्मिन् प्रमाणवित् ॥ १६१ ॥
लशुनाजाजिसिद्धार्थं हिगुपर्पटमेथिकान् ।
भर्जयित्वा क्षिपेत्तत्र खलं तक्रविमिश्रितम् ॥ १६२ ॥
तन्मुखञ्च पिधानेन संछाद्य विपचेद्बुधः ।
यादृशं खलमादाय प्रदद्याद्बोधने दिने ॥ १६३ ॥
खलोऽयं साधितः सम्यक् वातश्लेष्मविनाशकः ।
उष्णं वीर्यकरं सम्यक् दीपन्नाग्निकरं शुभम् ॥ १६४ ॥
विशिष्ट 'खल' बनाने की विधि तथा गुण - काली मरिच, लहसुन, निर्गुण्डी-
बीज, वैजयन्तिका (गनियारी), कर्णमाला (नील कमल), अग्निका (चित्रक)
चूत (आम की गुठली), जीरा, हींग तथा सेन्धानमक इन सबको पीसकर
उचित मात्रा में तक्र के साथ मिला दे। पुनः मिलाये हुए कल्क को चलनी से छान
ले। इसके बाद प्रवणी भाण्ड (बटलोही या मिट्टी की हाड़ी) को चूल्हा पर रख
कर उसमें पूर्वोक्त कल्क को छोड़ दे और उसमें गाय का घी उचित मात्रा में
डालकर लहसुन, जीरा, सरसो, हींग, पित्त पापड़ा तथा मेथी को भूनकर मिला दे।
इसके बाद उसमें तक्र मिश्रित "खल" को छोड़ दे और उसका मुँह ढक्कन
से बन्द कर बुद्धिमान् पाचक पकाये। तैयार हो जाने पर एक चौथाई (एक
तोल = दस मि० ली०) खल प्रातःकाल पीने के लिये दे। यह अच्छी तरह
बनाया हुआ खल वात-कफ को नाश करने वाला है। यह उष्ण है तथा अच्छी
तरह वीर्यवर्द्धक है और जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है ॥ १५९-१६४ ॥
सितकुलित्थरसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
रसं शीतकुलित्थोत्थं लशुनामरिचान्वितम् ।
रामठं सैन्धवं तत्र निवेद्येन्मानवः पुनः ॥ १६५ ॥
प्रदद्याद्वासितं पुष्पैः कर्पूराद्यैश्च सूदराट् ।
रसं शीतकुलित्थोत्थं समस्तामयहृत्तथा ॥ १६६ ॥
क्षुत्कृत् हृत्परमं स्वादु परमात्मसुहृत्पुनः ॥ १६७ ॥
सफेद कुरथी का रस बनाने की विधि तथा गुण--सफेद कुरथी का रस लेकर
उसमें लहसुन तथा मरिच का चूर्ण मिला दे और पुनः पाचक उसमें हींग तथा सेन्धा-
नमक छोड़ दे। इसके बाद उत्तम पाचक पुष्प तथा कर्पूर आदि से सुवासित
कुरथी के रस को पान करने के लिये दे। यह सितकुलित्थोत्थरस सम्पूर्ण रोगों को
दूर करनेवाला है तथा भूख को बढ़ाने वाला, हृदय के लिये हितकर, स्वादिष्ट एवं
आत्मा को अच्छी तरह प्रसन्न करनेवाला है ॥ १६५-१६७ ॥
असित कुलित्थररसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सितेतरकुलित्थस्य रसमादायसूदराट् ।
क्षिपेन्मरिचलशुनरामठानलसैन्धवान् ॥ १६८ ॥
दापयेद्वासितं द्रव्यैरधिवास्य सुगन्धिभिः ।
मरुद्दोषहरं सम्यक् श्लेष्मजिद्वातशोषणम् ॥ १६९ ॥
कृष्णकुरथीरस बनाने की विधि तथा गुण— उत्तम पाचक कृष्णकुरथी
का रस लेकर उसमें मरिच, लहसुन, हींग, चित्रक तथा सेन्धा नमक को (उचित
मात्रा में) छोड़ दे और सुगन्धित द्रव्यों से अधिवासित कर सुगन्धित बना ले
और पान करने के लिये दे । यह अच्छी तरह वात-विकार को दूर करता है,
कफ विकार को जीत लेता है तथा वात रोग का शोषण करता है ॥१६८-१६९॥
खलस्य (निर्मित खलद्रव्यस्य) प्रशस्तिः
[पृष्ठ २८]
२८ पाकदर्पणम्
चुल्ल्यामारोपयेद्विद्वान् तापयेन्मृदुवह्निना ।
तदीषद्व्रव्यसंयुक्तं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १८२ ॥
शोधितं तत्पचेत्सम्यगवघट्टनपूर्वकम् ।
बुद्बुदेषु विलीनेषु रक्तवर्णं प्रदापयेत् ॥ १८३ ॥
सौरभ्यं निक्षिपेत्तत्र किञ्चिद्गोधूमचूर्णकम् ।
तदावलोक्य सूदस्तु तद्घृतं चावतारयेत् ॥ १८४ ॥
न्यसेत्तत्र च तक्राक्तताम्बूलीकृष्णवर्णकम् ।
घनसारदिना सूदो वासयेत् सर्पिरुत्तमम् ॥ १८५ ॥
इदमाज्यं नवं पूज्य प्रदद्याद्भोजनार्थिने ।
अत्र भोजनवेलायां प्रदद्याद्द्रवपूर्वकम् ॥ १८६ ॥
ईषद्धनीकृतं सर्पिर्दद्यात्पायसभोजने ।
भक्ष्यादिभक्षणे काले घृतं दद्याद् घनीकृतम् ॥ १८७ ॥
वातपित्तप्रशमनं सुरभि स्वादु बृंहणम् ।
धातुप्रसाधनं शीतं विपाकि मधुरावहम् ॥ १८८ ॥
माङ्गल्यचाक्षुषं सर्पिर्गव्यं ग्रहनिवारणम् ॥ १८९ ॥
**गोघृत निर्माण विधि तथा गुण—**सफेद गाय का नवनीत लेकर पीत वर्ण
होने तक अच्छी तरह शोधन करे। उसी दिन का बनाया हुआ गाय का घी
चूल्हे पर रखे और विद्वान् पाचक मन्दाग्नि से तपाये । कुछ थोड़े द्रव्यों से संयुक्त
उस घी को छलनी से छान ले । इसके बाद शोधित गोघृत को कलछुल से चलाते
हुए पकाये । पकाते समय बुदबुद शब्द के बन्द हो जाने पर रक्त वर्ण होने तक
पकाये । उसमें सुगन्धित द्रव्य छोड़ दे और थोड़ा गेहूँ का चूर्ण भी छोड़ दे। पाचक
उस घृत को परिपक्व देखकर उतार ले । तदनन्तर उसमें तक्रलिप्त ताम्बूली
कृष्ण वर्ण को छोड़ दे और पाचक कर्पूर आदि से उत्तम घी को सुगन्धित बना ले
और इस नवीन उत्तम घृत को भोजन करनेवालों के लिये अर्पित करे। भोजन के
समय उसको गलाकर (द्रव्य रूप बनाकर दे। पावसभोजन (वर्षाकालीन)
भोजन या पायस (खीर) भोजन के समय थोड़ा गाढ़ा किया घृत दे। भक्ष्य
आदि पदार्थ खाने के समय गाढ़ा किया घृत दे। यह गाय का घी वात-पित्त को
शान्त करनेवाला सुगन्धित, स्वादिष्ट तथा बृंहण (मांसवर्द्धक) होता है और
धातुओं (रसरक्तादि) धातुओं को शुद्ध करने वाला, शीतल, विपाक में मधुर,
कल्याणकारक, नेत्र के लिये हितकर तथा ग्रह को दूर करनेवाला होता है।
[पृष्ठ २९]
नलविरचितम् २९
कुलत्थादीनां विशिष्टपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तानि तेभ्यः समादाय त्वचं दग्धां समुद्धरेत् ।
भाजने राजते तानि कल्कं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥ १९० ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
सैन्धवादीन् न्यसेत्तस्मिन् लशुनार्द्रकयोः कणान् ॥ १९१ ॥
कणेषु भर्जितेष्वेवं कुष्माण्डवटकोद्भवान् ।
सर्पिषा सह निक्षिप्य कुर्यादङ्गारधूपनम् ॥ १९२ ॥
फलाकाराणि कुर्वीत कल्केऽस्मिन् बहुलः सुधीः ।
तत्तदाकाररूपेण भर्जयेत्तलपेरैर्घृतैः ॥ १९३ ॥
भर्जितानि पुनस्तानि रक्षयेन्मक्षिकादिभिः ।
ततो भाण्डेषु कुर्वीत सम्भारांश्च पृथक् पृथक् ॥ १९४ ॥
सम्भाराणि पुनस्तानि फलाकाराणि निक्षिपेत् ।
तानि भाण्डेषु तप्तेषु भर्जयेद्रामठादिभिः ॥ १९५ ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
पुनश्च तानि बध्नीयात् पूगपट्टेसु सूद्राट् ॥ १९६ ॥
निक्षिप्य तानि सर्वाणि अन्तराट्टालकेष्वपि ।
भोजनावसरे प्राप्ते भोक्तृष्वेतानि दापयेत् ॥ १९७ ॥
भवन्ति बहवः शाखाः वस्तुनेकैन संयताः ।
सूदस्य हस्तवैचित्र्यात् तद्बुद्धिविभवात्ततः ॥ १९८ ॥
घ्नन्ति सर्वमयानेते शाकभेदाः सुखावहाः ।
वातपित्तप्रशमनाः साधुकल्पाः शुभावहाः ॥ १९९ ॥
कुलत्थी, उड़द आदि शिम्बीधान्यों की विशिष्टपाकनिर्माणविधि तथा गुण—
पूर्वोक्त कुलथी उड़द, आदि शिम्बी धान्यों में से लेकर पके छिलकों को निकाल दे
और उसे चाँदी के पात्र में कल्क बनावें । इसके बाद पाचक कर्पूर आदि से सुवा-
सित कर ले । पुनः सेन्धा नमक तथा लहसुन एवं अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से कणों के भुन जाने पर कुष्माण्ड वटक (कोहणवरी) को घी के
साथ छोड़कर छौंक दे । पुनः उस कल्क में अनेक प्रकार से बहुत फल के आकार
का बना ले और पूर्वोक्त आकार के रूप में ही कड़ाही में घृत डालकर भून ले।
इस भूने हुए व्यञ्जन को मक्खी आदि से सुरक्षित रखे। इसके बाद अलग-
अलग पात्रों में सम्भार (भूने हुए पदार्थ) को रखकर तथा पुनः उसको फलाकार
बनाकर संप्त भाण्ड में हींग आदि के साथ भूने तथा कर्पूर, कस्तूरी आदि से सुवा-
सित कर ले । तदनन्तर पाचक पूगपट्ट नेत्र में उनको बांध कर तथा अट्टालिका
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के अन्दर रखकर भोजन के समय भोजन करनेवाले को दे। उसके एक ही पदार्थ
से अन्य पदार्थों का संयोग होने पर बहुत सी शाखायें होती हैं। यह पाचक के
हस्तकौशल एवं उसके बुद्धिवैभव के ऊपर निर्भर करता है कि एक ही पदार्थ से
अनेक प्रकार के भोज्य शाक पदार्थों का निर्माण कर ले। ये शाक के प्रकार सभी
रोगों को नष्ट करते हैं तथा सुख को देनेवाले हैं। ये उत्तम कल्प वात-पित्त को
शान्त करने वाले तथा कल्याणकारक हैं ॥ १९०-१९९ ॥
रम्भाफलशाक निर्माणविधिर्गुणाश्च
वह्नरम्भाफलं रम्यं स्निग्धं स्थूलं सुदीर्घकम् ।
तदादाया पुनः छिन्द्यात् मूलमग्रं त्वचं पुनः ॥ २०० ॥
पुनश्च कलनीकोट्या भिन्नं कुर्वीत तद्विधा ।
त्रिधा वापि चतुर्धा वा च्छिन्द्यात्तियंक् च तत्पुनः ॥ २०१ ॥
प्रक्षाल्य प्रवणीभाण्डे निक्षिपेद् वारिणा च तान् ।
साधु मुद्गं यथायोग्यं प्रक्षिपेत्तत्र वारि च ॥ २०२ ॥
चुल्यामारोप्य तद्भाण्डे पचेत्तद्बहिना बुधः ।
अवतीर्य ततो रम्भाफलं पक्वं सुशोभनम् ॥ २०३ ॥
सितञ्च तत्र चूर्णञ्च मरीचिश्च विनिक्षिपेत् ।
प्रताष्य प्रवणीभाण्डमपरं सूदराट् ततः ॥ २०४ ॥
सिञ्चेत्तत्र नवं सर्पीरामठं तत्र निक्षिपेत् ।
घट्टयेद्द्वावपेत्तप्ते द्रव्यं सूदः पुनः पुनः ॥ २०५ ॥
तथैव तत्फलं तत्र निक्षिपेत्तत्प्रमाणवित् ।
छाद्येत्तन्मुखं तस्य पिधानेन प्रयत्नतः ॥ २०६ ॥
उत्क्षेपणमपक्षेपं कुर्यादन्तश्च तत्फलम् ।
प्रततं पाकमालोक्य वासयेत्तत्फलं ततः ॥ २०७ ॥
निक्षिपेद्वासितैः पुष्पैः पट्टपूगस्य तद्बुधः ।
कर्पूरप्रमुखैर्दिव्यैस्तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २०८ ॥
शैत्यं माभूत्ततस्तस्य उष्णत्वस्यानिवृत्तये ।
अन्तराट्टालके तच्च निक्षिपेत्किञ्चिदुष्णके ॥ २०९ ॥
दापयेद्भोजने काले तदादाय सुबुद्धिमान् ।
पित्तारुचिप gather प्रशमनं मेध्यं स्वादुतरं महत् ।
देहसारमिदं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ २१० ॥
**केला का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**गठा हुआ सुन्दर, स्निग्ध,
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स्थूल तथा बड़ा केला का फल लेकर उसके मूल भाग, अग्रभाग तथा छिलका को
काटकर निकाल दे और चाकू से दो भाग कर दे। अथवा तीन भाग या चार भाग
तिरछा काटे । इसके बाद उनका प्रक्षालन कर प्रवणी भाण्ड, (बटलोही) में
जल के साथ छोड़ दे। स्वच्छ एवं साफ मूँग की दाल तथा जल उसमें छोड़ दे।
तदनन्तर उस पात्र को चूल्हा पर रखकर बुद्धिमान् पाचक आग से पकावे। इसके
बाद अच्छी तरह पके हुए केला के फल को उतार कर उसमें मिस्री तथा मरिच
का चूर्ण छोड़ दे और-बार वार पाचक दूसरे बटलोही को गरम कर उसमें नवीन
घी तथा हींग का तड़का देकर उस केला के परिपक्व फल को छोड़ दे। इसके बाद
गरम रहते ही उसको कलछुल से घोटे और पतला बना ले।
पूर्वोक्त प्रकार से केला के फल को उसके प्रमाण को जानने वाला पाचक
भाण्ड में छोड़ दे और ढक्कन से उसे ढक दे। उत्क्षेपण एवं अपक्षेपण (झोंककर)
के द्वारा उस फल को ऊपर-नीचे कर दे। पाक हो जाने पर सुगन्धित द्रव्यों से
सुगन्धित कर ले। इसके बाद पूगपट्ट में रखे तथा सुगन्धित कर्पूर आदि दिव्य
द्रव्यों से अधिवासित कर ले। ठंडा न हो जाय तथा उसकी गर्मी बनी रहे इसके
लिये थोड़ा गरम अन्दर की अट्टालिका (रेफ्रिजेटर) में रखे और बुद्धिमान
पाचक उसमें से निकालकर भोजन के समय पर दे। यह पित्त विकार तथा अरुचि
को शान्त करता है, मेधा के लिये हितकर है तथा बहुत स्वादिष्ट होता है। यह
शरीर के ओज को बढ़ाता है, पथ्य है तथा इन्द्रियों को बल देनेवाला है॥
कदलीस्तम्भशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
राजरम्भान्तरागर्भमादाय त्वचमुत्सृजेत् ।
तन्मूलाग्रे ततश्छित्वा दात्रेण विसृजेद् बुधः ॥ २११ ॥
करवीरदलाकारं कृतं तत्तत्प्रदापयेत् ।
मध्यदण्डं समादाय छिन्द्यात्तण्डुलवत्पुनः ॥ २१२ ॥
दण्डमन्यं पुनश्छिन्द्यात् कणावत्तण्डुलस्य च ।
चणकाकारवच्छिन्द्यात् दण्डमन्यं सुबुद्धिमान् ॥ २१३ ॥
चक्राकारं च कुर्वीत स्तम्भरम्भातरूद्भवम् ।
निक्षिपेत्प्रवणीभाण्डेष्वेतान् विद्वान् पृथक् पृथक् ॥ २१४ ॥
सैन्धवं तेषु निक्षिप्य शोभार्थं रजनीं क्षिपेत् ।
जम्बीरारम्लं च निक्षिप्य पचेत्तान् वह्निना ततः ॥ २१५ ॥
सम्भारादीन् विनिक्षिप्य भर्जयित्वावतारयेत् ।
पूगपट्टेषु निक्षिप्य वासयेत्पूर्ववच्च तान् ॥ २१६ ॥
३२ पाकदर्पणम्
कृत्वा तु पोटलीं विद्वान् अन्तराट्टालके न्यसेत् ।
प्रदद्याद्भोजने काले रम्भास्तम्भाननुत्तमान् ॥ २१७ ॥
लघून् स्वादुतरान् रुच्यान् पवित्रान् पित्तनाशनान् ॥ २१८ ॥
कदली स्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—कदली
खम्भ के अन्दर के भाग को लेकर उसकी त्वचा को फेंक दे और उसके मूलभाग
तथा अग्रभाग को बुद्धिमान् पाचक चाकू से काटकर करवीर ( कनेर ) के पत्ते
के आकार का बनाकर रख ले । उसके बीच का दण्ड लेकर चावल के आकार
को काट ले । दूसरे दण्ड को लेकर चावल के कण के आकार का काट ले । बुद्धिमान्
पाचक कुछ अन्य दण्ड को लेकर चने के आकार का काट ले और कुछ दण्ड को
चक्राकार काट कर बना ले । इसके बाद उन सबों को अलग बटलोही में रखे
और उसमें सेन्धानमक छोड़कर सुन्दरता के लिये हल्दी का चूर्ण छोड़ दे । तदन-
न्तर जम्बीरी नींबू का रस छोड़कर उनको आग पर पकावै । इसके बाद घी, हींग
का तड़का तथा गरम मसाला आदि छोड़कर तथा भूनकर उतार ले । उतारने
के बाद पूगपट्ट में रखकर उनको पूर्ववत् सुगन्धित पुष्प, कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुवासित कर ले और उनकी पोटली बनाकर अन्तराट्टालक (रेफ्रीजेटर )
में रखे । इस उत्तम रम्भास्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक भोजन के समय दे । यह
शाक हल्का, स्वादिष्ट, रुचिकर, पवित्र तथा पित्तनाशक है ॥ २११-२१८ ॥
वृन्ताकशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
बालं तरुणमानीय वृन्ताकं सुमनोहरम् ।
वृन्ताग्रं विसृजेच्छित्त्वा कलिकन्या तीव्रधारया ॥ २१९ ॥
पुनश्च तत्फलं द्वेधा भिन्नं कृत्वा सुबुद्धिमान् ।
सजले निक्षिपेद् भाण्डे बृहत्या सदृशं फलम् ॥ २२० ॥
स्विद्येपो निशाभाण्डे निक्षिपेदपरे कटुम् ।
रामठं तत्र कैटर्यं धान्याकं च विनिक्षिपेत् ॥ २२१ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाईकयोः कणान् ।
एतस्य मेलनं कृत्वा पचेच्चुल्यां विचक्षणः ॥ २२२ ॥
बृहतीफलभिन्नानि निक्षिपेत् तप्तवारिणि ।
आदाय तानि पक्वानि निक्षिपेद्भाजने शुभे ॥ २२३ ॥
सम्भारैर्मरिचादीनां कल्कं कुर्याद् विधानतः ।
चिञ्चापक्वफलाम्लेन दध्ना कल्कं विलोडयेत् ॥ २२४ ॥
नलविरचितम् ३३
कुर्यात् कल्केन तेषाञ्च लेपनं बहिरन्ततः ।
भर्जयेत्तानि लिप्तानि गोघृतेनाथ सूदवित् ॥ २२५ ॥
अवतार्य पुनस्तानि कर्पूरेणाथ वासयेत् ।
शुचौ तु पूगपट्टस्य नेत्रे तानि समादिशेत् ॥ २२६ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २२७ ॥
स्वादु वृष्यं रुचिकरं त्रिदोषशमनं परम् ।
इदं बृहत्यास्तरुणं फलं पुष्टिविवर्द्धनम् ॥ २२८ ॥
वृन्ताक (बैगन) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—बाल तरुण
(थोड़े दिन का उत्पन्न हुआ) सुन्दर बैंगन लेकर तीक्ष्णधार वाले चाकू से बैंगन
के अग्रभाग (भेंटी) को काटकर फेंक दे । फिर बुद्धिमान् पाचक बैंगन फलके दो
टुकड़े कर जल वाले पात्र में छोड़ दे । बृहती (गोल बैंगन) के समान फल को
काटकर हल्दी के पात्र में रखकर जल से सींचे और दूसरे पात्र में रख कर सोंठ
के साथ जल से सींचे । इसके बाद उसमें हींग, कैटर्य ( कायफल ) तथा धनियां
का चूर्ण छोड़ दे । फिर उसमें लहसून तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे और
इन सबों को एक में मिलाकर चूल्ही पर रखकर पकावे । बृहती फल (बैंगन) को
टुकड़ा-टुकड़ा काटकर गरम जल में छोड़कर उन पके फलों को लेकर स्वच्छ पात्र
में रखे । इसके बाद मरिच, धनियां, जीरा आदि मसालों का विधिपूर्वक कल्क
बनावे और इमली के पके फल की खटाई तथा दही में कल्क को मिला दे । इसके
बाद इस कल्क से बैंगन के टुकड़ों को बाहर-भीतर लेप कर दे तथा पाकशास्त्र को
जानने वाला पाचक उन कल्कलिप्त बैंगन के टुकड़ों को गाय के घी के साथ भून
ले। पुनः उसको उतार कर कपूर से सुगन्धित बना ले और पुनः स्वच्छ पूगपट्ट के
नेत्र (फोंफी) में भर दे । इसके बाद पोटली बनाकर संतप्त घी में छोड़ दे और
उसमें से निकाल कर खाने को दे । यह शाक स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, रुचिकारक
तथा अच्छी तरह त्रिदोषशामक है । यह परिपुष्ट बैंगन का फल पुष्टिवर्द्धक
होता है ॥ २१९-२२८ ॥
बृहती फलस्यान्यविधशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
तिन्तिडीचूतफलयोर्भाण्डे कुर्याच्च मेलनम् ।
कुम्भीं कुस्तुम्बरीं तत्र निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ॥ २२९ ॥
सैन्धवादींस्तु निक्षिप्य भर्जयेद्रामठादिभिः ।
घनसारादिना सम्यक् तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २३० ॥
३४ पाकदर्पणम्
बध्नीयाद्भर्जितं नेत्रे पूगपट्टस्य तत्फलम् ।
पूर्ववन्निक्षिपेद्विद्वान् तप्ते सर्पिषि तत्फलम् ॥ २३१ ॥
पित्तश्लेष्मप्रशमनं बृहत्यास्तरुणं फलम् ।
शरीरबलकृद्वृष्यं धातुवृद्धिकरं परम् ॥ २३२ ॥
बैंगन (गोल बैंगन) का दूसरे प्रकार से शाक बनाने की विधि तथा गुण—
पूर्वोक्त प्रकार से बैंगन को काटकर गरम पानी में छोड़कर निकाल ले और स्वच्छ पात्र में रखे। इसके बाद बैंगन फल के पात्र में इमली तथा आम के फल को मिला दे और कुम्भी, कुस्तुम्बुरी तथा सल्कीफल (सलईफल) छोड़ दे। तदनन्तर सेन्धानमक, जीरा आदि मिलाकर हींग का तड़का देकर घी में भून ले और कर्पूर आदि से अच्छी तरह पुनः सुगन्धित बना ले। इसके बाद भर्जित बैंगनफल को पूगपट्ट के नेत्र में बाँधे तथा पूर्ववत् संतप्तघृत में छोड़कर विद्वान् पाचक पका ले। यह तरुण बृहतीफल (गोल बैंगन) का शाक पित्त एवं कफ को शान्त करने वाला, शरीरबलकारक, वीर्यवर्द्धक तथा रस-रक्तादिधातुओं को अच्छी तरह बढ़ाने वाला है ॥ २२९-२३२ ॥
विशिष्टप्रकारेण बृहतीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलं बृहत्यास्तरुणं संवृत्तं धारयेद् द्विधा ।
वेष्टयेदार्द्रवस्त्रेण भागमेकं तयोर्बुधः ॥ २३३ ॥
भाण्डे चेदितमपरं भागं चुल्यामपचेत्पुनः ।
पाकावसानपर्यन्तमन्यस्य जलमाविशेत् ॥ २३४ ॥
पक्वञ्च वेष्टयेद्भागमपक्वं पूगनेत्रयोः ।
दृढञ्च निक्षिपेद्विद्वान् तप्तसर्पिषि पूर्ववत् ॥ २३५ ॥
बृहत्याः फलभागस्य चित्रपाकः प्रदर्शितः ।
पाकं पादसमायुक्तं भागद्वयसमन्वितम् ॥ २३६ ॥
भोजनावसरे प्राप्ते प्रदद्याद् बृहती फलम् ॥ २३७ ॥
विशिष्टप्रकार से बृहतीफलचित्रपाक बनाने की विधि तथा गुण—
बैंगन के तरुण फल को दो प्रकार से ग्रहण करे। उन दोनों में से एक भागको आर्द्रवस्त्र से वेष्टित कर दे और भाण्ड (पात्र) में रखकर पकाये तथा दूसरे भाग को चूल्हे में पकाये। दूसरे भाग का जल पाक होने तक गिरने दे। इसके बाद पूगपट्ट के दो नेत्रों में पक्व तथा अपक्व भाग को वेष्टित कर दे। तदनन्तर विद्वान् पाचक संतप्त घी में पूर्ववत् छोड़कर पका लें। यह बैंगन के फल भाग का चित्रपाक प्रदर्शित
नलविरचितम् ३५
किया गया। बैंगन के पूर्वोक्त पाक के चौथाई भाग के साथ दो भाग बैंगन फल को मिलाकर भोजन के समय प्रदान करे ॥ २३३-२३७ ॥
पनसफलस्य शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पनसस्य फलं रम्यं तरुणं कोमलं सह ।
आनीय विसृजेच्छित्त्वा कण्टकांश्च बहिःस्थितान् ॥ २३८ ॥
पुनस्तद्बहुधा छित्त्वाखण्डं खण्डस्थितं त्यजेत् ।
पाकार्थं तत्पुनः छित्त्वा प्रवणीभाण्डमाविशेत् ॥ २३९ ॥
निशारामठकैटर्यधान्यकांस्तत्र निक्षिपेत् ।
पनसस्य फलान्यप्सु पचेद्विज्ञानि तैः सह ॥ २४० ॥
नीरसं विसृजेत्तानि समादायाऽथवा सह ।
समादाय पुनस्तेषां कानिचित्त्वच्छकलानि च ॥ २४१ ॥
कुर्यात्सूक्ष्मं च दीर्घं च शस्त्रेण च विचक्षणः ।
कल्कं च मरिचादीनाञ्जम्बीराम्लेन मेलयेत् ।
कल्केन लेपयेत्तानि भर्जयेत्सर्षिषा पुनः ॥ २४२ ॥
यदा कुङ्कुमकान्तेयं तदा तान्यवतारयेत् ।
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारि च ॥ २४३ ॥
मातुलुङ्गदलच्छेदान् केतकीकुसुमानि च ।
कुम्भीं कुस्तुम्बुरीं तत्र सर्वाण्येतानि निक्षिपेत् ॥ २४४ ॥
नेत्रेण पूगपट्टस्य वेष्टयेत् सूदराट् पुनः ।
पोटलीं वेष्टितां पूर्णां तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २४५ ॥
लघु पित्तहरं वृष्यं वातघ्नं च बलप्रदम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं पनसस्य फलन्त्विदम् ॥ २४६ ॥
कटहल फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कटहल के सुन्दर कोमल तथा तरुण फल को लेकर उसके बाहर के कण्टकदार छिलकों को काटकर फेंक दे। फिर उसके अनेक टुकड़े बनाकर खण्ड रूप में स्थित टुकड़ों को निकाल दे। इसके बाद पाक करने योग्य खण्ड को पुनः काटकर बटलोही में रखे और हल्दी, हींग, कैटर्य (कायफर) तथा धनियाँ को उसमें छोड़ दें। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ पूर्वोक्त प्रकार से कटे हुए कटहल के फल को जल में पकाये। नीरस भाग उन सबों के साथ लेकर छोड़ दें। पुनः बुद्धिमान् पाचक उनके कुछ टुकड़ों को लेकर शस्त्र से काटकर छोटा तथा बड़ा टुकड़ा बनाये और मरिच, जीरा आदि के कल्क एवं जम्बिरी नींबू का अम्ल मिला दे। पुनः उस कल्क से कटहल के टुकड़ों को
५ पा.द.
Here is the complete, line-by-line transcription of the Sanskrit verses and Hindi commentary from the provided image:
[Left Page: ३६ - पाकदर्पणम्]
लिस कर दे तथा घी के साथ भूने । जब केशर के वर्ण का हो जाय तब उतार
ले । इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी, केशर, शीतल जल, नींबू के दल के टुकड़े,
केवड़ा का फूल, कुम्भी तथा कुस्तुम्बुरी इन सबों को छोड़ दे। इसके बाद उत्तम
पाचक पूगपट्ट के नेत्र से वेष्टित कर दे और अच्छी तरह वेष्टित पोटली को संतप्त
घी में छोड़ दे । तदनन्तर उनमें से निकाल कर खाने को दे । यह कटहल फल
का शाक हल्का होता है और पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक,
बलप्रद, जाठराग्निदीपक, पाचक तथा रुचिकारक होता है ॥ २४८-२४६ ॥
प्रकारान्तरेण पनशशाकनिर्माणविधिः
शकलानि सुपक्वानि समादायाथ कानिचित् ।
पूर्ववच्छेद नं कुर्यात् सम्भारादींश्च पूर्ववत् ॥ २४७ ॥
सितखण्डान् पुनस्तत्र चिञ्चाम्लेन समक्षिपेतू ।
भर्जयेत् पूर्ववत्तानि रामठाद्यं च सूदराट् ॥ २४८ ॥
घनसारदिना सम्यक् पुनस्तान्यधिवासयेत् ।
नेत्रेण वेष्टयेत्तानि पूगपट्टस्य बुद्धिमान् ॥ २४९ ॥
पूर्ववत् पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ।
प्राप्ते भोजनकाले तु प्रदद्याद्भोजनार्थिने ॥ २५० ॥
अन्य प्रकार से कटहल का शाक बनाने की विधि—अच्छी तरह परिपक्व
कटहल के कुछ टुकड़ों को लेकर पूर्ववत् काट ले और सम्भार (हल्दी, हींग,
मसाला आदि) पूर्ववत् मिला दे। पुनः उसमें शक्कर को इमली की खटाई के साथ
छोड़ दे । इसके बाद उत्तम पाचक पूर्ववत् घी तथा हींग के साथ भून ले। पुनः
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से उनको सुवासित कर ले । इसके बाद पूगपट्ट के नेत्र
से उनको वेष्टित करे और पूर्ववत् पोटली बनाकर संतप्त घृत में छोड़ दे । तदन-
न्तर भोजन के समय खानेवाले को दे ॥ २४७-२५० ॥
पनसस्यान्यमिष्टपाकनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
शर्कराखण्डयुक्तानि फलानि पनसस्य च ।
दर्शनाय विधिः केषामुच्यते सविशेषतः ॥ २५१ ॥
कानिचिच्छकलान्यस्य आदाय च्छेदयेत्पुनः ।
नवेन सर्पिषा विद्वान् भर्जयेत्तानि बुद्धिमान् ॥ २५२ ॥
सम्भारादीन् मरिच्यादीन् कृत्वा भाण्डेऽथ मेलनम् ।
क्षीरेण सह खण्डांश्च नारिकेलफलस्य च ॥ २५३ ॥
[Right Page: ३७ - नलविरचितम्]
आर्द्रवीलेपमाशीतपूगपट्टस्य निक्षिपेत् ।
मूत्रस्रावी मलस्रावी रक्तजः पित्तजस्तथा ॥ २५४ ॥
कटहल का मीठा पाक बनाने का प्रकार तथा गुण—शक्कर से युक्त कटहल
के फलों को दिखाने के लिए कुछ पाक-निर्माण को विधि विशेषप्रकार से कह रहे
है । कटहल के परिपक्व कुछ टुकड़ों को लेकर पुनः छोटा-छोटा काटे और बुद्धि-
मान् पाचक उनको नवीन घी के साथ भून ले । इसके बाद उसमें मरिच, जीरा
आदि मसाला सामग्री को पात्र में रखकर मिला दे और दूध के साथ नारियल के
फल के टुकड़ों एवं शक्कर को मिलाकर पूगपट्ट में दव लेप पकाये तथा शीतल होने
तक छोड़ दे । इसका प्रयोग मलस्रावी, मूत्रस्रावी, रक्तज एवं पित्तज रोग में
करे ॥ २५१-२५४ ॥
निष्पावफलयुक्तपनसफलपाकप्रकारो गुणाश्च
निष्पावफलमानीय कोमलं क्रिमिवर्जितम् ।
त्वचमुत्सृज्य तद्बीजं आहरेच्छोधयेद्बुधः ॥ २५५ ॥
पचेत्तत्प्रवणीभाण्डे क्षतेनैव ततः परम् ।
नारिकेलफलं क्षोरं वटकान् पेषयेत्तिलान् ॥ २५६ ॥
मरीचान् सर्षपान् पिष्ट्वा कल्कं तत्र विनिक्षिपेत् ।
पुनः क्षीरं समासिच्य सुगन्धञ्च निषिञ्चयेत् ॥ २५७ ॥
रामठं क्षीरमासिच्य तानि पक्वावतारयेत् ।
ततश्च घनसारार्याः सूदस्तान्यधिवासयेत् ॥ २५८ ॥
ततस्तत्पूगपट्टेन वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
इदं स्वादुतरं हृद्यं कषायं गुरुपित्तकृत् ॥ २५९ ॥
वृष्यं बल्यं कफहरं समीरणविवर्धनम् ।
एवं च वननिष्पावं पक्वं सम्यक् प्रदापयेत् ॥ २६० ॥
इदञ्च वननिष्पावं स्निग्धं स्वादुतरं परम् ।
समीरणहरं वृष्यं पित्तश्लेष्मकरं हितम् ॥ २६१ ॥
निष्पाव फलयुक्त कटहलफल का पाक निर्माण प्रकार तथा गुण—बुद्धिमान्
पाचक क्रिमिरहित निष्पाव (भटवांस) के कोमल फल को लेकर उसकी त्वचा
को निकाल कर फेंक दे तथा उसके बीज को लेकर शोधन कर ले । इसके बाद
पूर्वोक्त परिपक्व कटहल के फल को बटलोही में क्षत (खण्डित) भटवांस के
साथ पकाये । इसके बाद नारियल के फल, दूध, वटक (कोहड़बटी) तथा तिल
को पीसकर कल्क बना ले और मरिच एवं सरसों को भी पीसकर कल्क बना ले ।
an 'ा'?
Look at it: it has a body and an 'ा' (aa-matra)!
What is the body?
It's 'व्र' or 'ब'?
Wait, look at 'ब' in 'बुधः': 'ब' has a loop with a diagonal slash inside!
Does this letter have a diagonal slash inside?
YES! It has a loop with a diagonal line inside, like 'ब' or 'व्र'!
Wait, is it 'चूर्णेनाव्रावयेत्ततः' or 'चूर्णेनाव्रापयेत्ततः'?
Wait, if the body is 'व' and it has a 'ा' and then 'व' with 'े':
Wait! Look at the letter before 'त्त':
Is it 'ये' or 'पे' or 'वे'?
Wait, look at 'य' in 'वासयेत्' (L52): 'य' has a curved left.
Look at 'वे' in 'प्रवरे' (L51): 'वे' has a round loop!
In this word, the letter before 'त्त' has a curved left like 'य'!
Wait, but does it?
Let's look at 'य' in 'मेथ्याश्च' just to the left:
मे - थ्या - श्च
'थ्या' has 'थ' connected to 'य'.
Now look at the letter before 'त्त':
It is curved like 'य' with an e-matra: 'ये
४० पाकदर्पणम्
रक्तक्षुद्रबृहतीफलस्यान्यपाकविधिः
ततश्च कानिचित्तेषां तदा सर्पिषि भर्जयेत् ।
ततश्च प्रवणीभाण्डे क्षीरमासिच्य यत्नतः ॥ २७४ ॥
सर्षपांश्च मरीचींश्च नारिकेलफलस्य च ।
तिलस्य कल्कमालोड्य जालिन्या तद्विशोधयेत् ॥ २७५ ॥
तत्पुनः क्वाथयित्वात्र तानि न्यस्यावतारयेत् ।
प्रक्षाल्य प्रवणीमन्यां घृतमासिच्य सूदवित् ॥ २७६ ॥
रामठञ्च विनिक्षिप्य माषस्य वटकान् क्षिपेत् ।
पर्पटस्य कणान् क्षिप्त्वा दर्या तानि विघट्टयेत् ॥ २७७ ॥
तत्क्वाथं तत्र निक्षिप्य सम्यक् कृत्वावतारयेत् ।
वाससा पूर्ववत् कृत्वा वेष्टयित्वावतारयेत् ॥ २७८ ॥
लाल क्षुद्रबृहतीफल का अन्य प्रकार का पाक बनाने की विधिः--पूर्वोक्त
लाल क्षुद्र बृहतीफल में से कुछ लेकर घी में भून लें । इसके बाद प्रवणी भाण्ड
( बटलोही ) में प्रयत्नपूर्वक दूध छोड़कर सरसों, मरिच, नारियल का फल तथा
तिल का कल्क मिलाकर छलनी से छान ले । इसके बाद क्वाथ बनाकर उसमें उन
घृतभृष्ट बृहती फल को छोड़कर उतार ले और दूसरी बटलोही को प्रक्षालन कर
उसमें पाकशास्त्र को जानने वाला पाचक घृत छोड़कर हींग छोड़े तथा उड़द के
वटकों को छोड़ दे और पर्पट ( पापड़ ) के टुकड़ों को छोड़कर कलछुल से घोट
दे । इसके बाद पूर्वोक्त क्वाथ को उसमें छोड़कर तथा अच्छा बनाकर उतार ले ।
'पुनः वस्त्र से पूर्ववत् बनाकर तथा वेष्टित कर उतार ले ॥ २७४-२७८ ॥
क्षुद्रबृहतीफलपाकस्य गुणाः
पित्तघ्नं दीपनं भेदि वातघ्नं बृहतीफलम् ।
गुल्मशोथज्वरश्वासकासघ्नं वह्निदीपनम् ॥ २७९ ॥
रुच्यं पथ्यं ज्वरार्शोघ्नं स्यात्क्षुद्रबृहतीफलम् ।
सनाभफलमतनु कृमिहीनं सुकोमलम् ॥ २८० ॥
कफपित्तहरं तिक्तं समीरणहरं तथा ।
बहुकण्टफलं पक्वं सक्षीरं पित्तवर्द्धनम् ॥ २८१ ॥
रक्त क्षुद्र बृहतीफल के पाक का गुण-क्षुद्र बृहती फल पाक पित्तनाशक,
जाठराग्निदीपक, मलभेदक तथा वातनाशक है । यह गुल्म रोग, शोथ, ज्वर,
श्वासवृद्धि, तथा कास नाशक है। अग्नि दीपक, रुचिकारक, पथ्य, ज्वर तथा
अर्शनाशक होता है। नाभिसहित, बड़ा, कृमिरहित तथा कोमलफल तिक्त रस-
नलविरचितम् ४१
वाला, कफ-पित्त को दूर करने वाला तथा वातनाशक है। दूधयुक्त पका हुआ
बहुत काँटों वाला फल पित्तवर्द्धक होता है ॥ २७९-२८१ ॥
कटुकीफलस्य पाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोमलानि समादाय कटुकस्य फलानि च ।
( पूर्ववद्विपचेत्सूदो गुणधर्मं प्रवक्ष्यते )
तिक्तं हृद्यं कफहरं कुष्ठजिज्ज्वरनाशनम् ॥ २८२ ॥
कासश्वासारुचिहरं समीरणहरं तथा ।
कटुकीफलं च पक्वञ्चेत् गुरु विष्टम्भि पित्तकृत् ॥ २८३ ॥
कटुकी-फल-पाक बनाने की विधि तथा गुण-कटुकी का कोमल फल
लेकर पूर्ववत् ( बृहती फल सदृश ) पाक करें। उसका गुण आगे कहते हैं। कटुकी
फल पाक स्वाद में तिक्त, हृदय को बल देनेवाला, कफ को दूर करनेवाला, कुष्ठ
रोग को जीतने वाला तथा ज्वरनाशक है। यह कास ( खांसी ), श्वास रोग
अरुचि तथा वात रोग को दूर करने वाला है। पके कटुकी फल का पाक गुरु
( गरिष्ठ ) विष्टम्भि ( विबन्धकारक ) तथा पित्तकारक होता है ॥ २८२-२८३ ॥
एरण्डबालफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एरण्डस्य फलं बालं पचेदेवं विधानतः ।
दीपनं पाचनं रुच्यं समीरणहरं परम् ॥
श्लेष्मक्रिमिहरं रुच्यं मूत्ररोगहरं तथा ॥ २८४ ॥
बालएरण्डफल के पाक की निर्माण विधि तथा गुण-एरण्ड ( रेड ) के
बाल फल को लेकर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पकावे । यह एरण्डफलपाक जाठ-
राग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, अच्छी तरह वातशामक, कफविकार तथा क्रिमि-
रोग को दूर करनेवाला, रुचिकारक तथा मूत्रविकार को नाश करनेवाला है ॥
शिग्रुफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः शिग्रुफलं रम्यं पचेदानीथ पूर्ववत् ।
वासेनावेष्टनं दान पूर्ववद्धि पचेद् बुधः ॥ २८५ ॥
दीपनं वातपित्तघ्नं वृष्यं वर्ण्यप्रमेहजित् ।
चक्षुष्यं शुक्रदं रुच्यं बृंहणं श्लेष्मनुत्तथा ॥ २८६ ॥
सहिजनफल की पाकनिर्माणविधि तथा गुण-सहिजन का मनोहर (सुन्दर)
फल लेकर पूर्ववत् पकावे । इसके बाद वस्त्र से आवेष्टित कर पूर्वबृहतीफलपाक के
सदृश पकावे और खाने के लिये दे । यह दीपक, वात-पित्तनाशक, वीर्यवर्द्धक,
वर्णकारक, प्रेमहनाशक, नेत्र के लिये हितकर, वीर्यवर्द्धक, रुचिकारक, मांस-
वर्द्धक तथा कफनाशन है ॥ २८५-२८६ ॥
अगस्त्यफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अगस्त्यस्य फलं सूदस्तरुणं कोमलं भवेत् ।
कलिकन्या तत्फलं छिन्द्यादङ्गुलीदीर्घमानतः ॥ २८७ ॥
जलेन पटुना सार्द्धं प्रवण्वां च पचेत्ततः ।
तस्मिन् पक्वे ततः सूदस्तदादाय च वै फलम् ॥ २८८ ॥
अन्यस्मिन् प्रवणीभाण्डे क्षीरमासिच्य यत्नतः ।
तिलबीजार्धपलिका नारिकेलफलोद्भवम् ॥ २८९ ॥
कल्कमालोड्य तत्रैव तत्फलानि विनिक्षिपेत् ।
निक्षिपेत्क्षीरवटकन् क्षीरं च परिवेष्टयेत् ॥ २९० ॥
प्रताप्य प्रवणीमन्यां घृतं तत्र क्षिपेन्नवम् ।
रामठञ्च विनिक्षिप्य कूष्माण्डवटकान् क्षिपेत् ॥ २९१ ॥
दर्या विघट्य तांस्तत्र पर्यवस्य ( पर्पटस्य ) कणान् क्षिपेत् ।
कृत्वा पाकं पुनः सम्यगवतार्य च तत्फलम् ॥ २९२ ॥
पुनश्च घनशारेण तं पाकमध्वासयेत् ।
नेत्रेण पूगपट्टस्य वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ २९३ ॥
इदं रुच्यं च वातघ्नं कफकृत् पित्तकृद्भवेत् ।
अवृष्यं रोचनं वह्निरसान्द्रं शूलका (हा) रि च ॥ २९४ ॥
अगस्त्य फल पाक बनाने की विधि तथा गुण— पाचक अगस्त्य के तरुण
एवं कोमल फल को लेकर अङ्गुली की लम्बाई के बराबर चाकू से काटे और जल
के साथ तथा नमक मिलाकर वटलोही पात्र में पकावे । इसके बाद पक जाने पर
पाचक उस फल को लेकर दूसरे वटलोही पात्र में लेकर तथा दूध से सींचकर
प्रयत्नपूर्वक पकावे । बाद में आधा पल ( २५ ग्रा. ) तिल का कल्क तथा नारियल
का कल्क मिलाकर उसीमें उस फल को छोड़ दे । तदनन्तर उसमें क्षीरवटक छोड़ दे
और दूध भी छोड़ दे । तत्पश्चात् दूसरी वटलोही को गरम कर उसमें नवीन घृत
तथा हींग छोड़कर कूष्माण्ड वटक छोड़ दे । पुनः उसको कलछुल से घोटकर उस
में पर्यव ( पर्पट-पित्तपापड़ा ) का चूर्ण छोड़ दे । पुनः अच्छीतरह पकाकर उतार
ले और उस फलपाक को कर्पूर से सुगन्धित कर ले । इसके बाद पूगपट्ट के नेत्र
( रस्सी ) से बाँधकर खाने के लिये दे । यह अगस्त्य फलपाक रुचिकारक, वात-
नाशक, कफ एवं पित्तकारक, अवृष्य, रुचिवर्द्धक, अग्निदीपक तथा शूलनाशक
होता है ॥ २८७-२९४ ॥
१हुंकारफलविरूपकफलयोः निर्माणविधिर्गुणाश्च
हुँकारफलमादाय सम्भारेण पचेद्बुधः ।
वासनादीन् पुनः कुर्यादनालस्येन पूर्ववत् ॥ २९५ ॥
आनीय पूर्ववद्विद्वान् विरूपकफलं पचेत् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं लघु पित्तानिलापहम् ॥ २९६ ॥
गुल्मशूलहरं नित्यं दन्तदार्ढ्यकरं परम् ॥
हुंकारफल तथा विरूपकफलपाक बनाने की विधि तथा गुण— बुद्धिमान् पाचक
हुँकार का फल लेकर पूर्वोक्त सामग्रियों के साथ पाक करे और पूर्ववत् आलस्य
रहित होकर कर्पूर आदि से सुगन्धित करे । इसी प्रकार विद्वान् पाचक विरूपक
फल लेकर भी पाक करे । यह जाठराग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, हल्का, पित्त-
वातनाशक, गुल्मरोग तथा शूलहर तथा अच्छी तरह दाँतों को मजबूत करने
वाला है ॥ २९५–२९६ ॥
औदुम्बरफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
औदुम्बरस्य रम्याणि फलान्यानीय बुद्धिमान् ।
शोधयेत्सर्ववृन्तानि सम्भारानि पुनः पचेत् ॥ २९७ ॥
वासनादीन् ततः कृत्वा दापयेद्भक्षयेद्बुधः ।
वातघ्नं कफहृद्ग्राहि कषायं दीपनं लघु ॥ २९८ ॥
बृंहणं रोचनं पथ्यं ज्वरातिसारदाहजित् ।
गूलरफल के पाक निर्माण की विधि तथा गुण— बुद्धिमान् पाचक गूलर के
सुन्दर फलों को लेकर उसकी सभी भेंटियों को साफ कर दे, और साम्भर नमक,
मसाला आदि के साथ पकावे । इसके बाद कर्पूर आदि से सुगन्धित कर राजा को
दे तथा स्वयं भक्षण करे । औदुम्बरफलपाक वातनाशक, कफ को दूर करनेवाला,
कषायरसयुक्त, जाठराग्निदीपक तथा हल्का ( सुपच ) होता है। यह मांसवर्द्धक
रुचिकारक, पथ्य, ज्वरातिसार तथा दाहनाशक है ॥ २९७–२९८ ॥
औदुम्बरबालफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
आनीय पूर्ववद्बालमक्षोवस्य फलं पचेत् ॥ २९९ ॥
१. हुँकार फल तथा विरूपक फल का नाम किसी निघण्टु में नहीं मिला ।
सम्भवतः विरूपक फल पिपरामूल का फल है । यह अन्वेषणीय है । —लेखक
४४ | पाकदर्पणम्
तिक्तं कषायं वातघ्नमिदं श्लेष्मविनाशनम् ।
विसर्पहरं गुल्मरक्तातिसारमेहजित् ॥ ३०० ॥
गूलर का बालफलपाक बनाने की विधि तथा गुण—गूलर का बाल फल
लेकर पूर्ववत् पकावे । यह तिक्त तथा कषाय रसवाला होता है । वात एवं कफ
को नाश करता है, विसर्प को दूर करता है, गुल्मरोग, रक्तातिसार तथा प्रमेह को
जीत लेता है ॥ २९९-३०० ॥
पक्वकुष्माण्डफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वर्जितं क्रिमिभिः पक्वं कुष्माण्डफलमुत्तमम् ।
कलिकन्या खण्डयेत्तच्च कूटवच्चतुरश्रवम् ॥ ३०१ ॥
समुत्सृज्य ततो बीजान् अन्त्राणि तु समुत्सृजेत् ।
तानि प्रक्षाल्य तोयेन प्रवण्यां निक्षिपेत्पुनः ॥ ३०२ ॥
सामुद्रं तत्र निक्षिप्य पचेतानि पुनर्बुधः ।
दध्यम्लमाषपिष्टेन तानि लिम्पेत्समन्ततः ॥ ३०३ ॥
कुङ्कुमच्छविविप्यन्तं सर्पिषा तानि भर्जयेत् ।
मेथीजीरकसिद्धार्थं तिलमाषसमुद्भवान् ॥ ३०४ ॥
चूर्णश्च विकिरेत्तेषु तत्सिद्धयर्थं पुनः पचेत् ।
पलाण्डोस्तत्र खण्डानि कैटर्यस्य दलानि च ॥ ३०५ ॥
क्षिप्त्वा कुस्तुम्बरीं धान्यमङ्गारेष्वथ धूपयेत् ।
वासयेद् घनसारण पुनस्तानी विचक्षणः ॥ ३०६ ॥
वेष्टयेत्पूगपट्टेन तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ।
भोजनावसरे प्राप्ते दापयेद्भोजने दिने ॥ ३०७ ॥
इदं कुष्माण्डकफलं बृंहणं स्वादु शीतलम् ।
सर्वदोषहरं वृष्यं दाहतृड्भयनाशनम् ॥ ३०८ ॥
कुष्माण्ड फलपाक निर्माणविधि तथा गुण—क्रिमिदोषरहित परिपक्व उत्तम
कुष्माण्ड फल को लेकर चाकू से कूट के समान चौकोर काट ले । इसके बाद उसके
बीजों को निकाल कर फेंक दे और उसके अन्दर के रेशों को भी फेंक दे । तदनन्तर
उन कुष्माण्ड के टुकड़ों को जल से प्रक्षालन कर बटलोही में रक्खे । पुनः बुद्धि-
मान् पाचक उसमें सामुद्र नामक छोड़कर पकावे । इसके बाद दही, खटाई तथा
उड़द की पीठी से उसे लिप्त कर दे और केशर सदृश वर्ण होने तक उनको घी में
भूने । तदनन्तर मेथी, जीरा, सरसों, तिल तथा उड़द के चूर्ण को उनमें मिला दे
और उसको सिद्ध होने के लिये पुनः पकावे । इसके बाद प्याज के टुकड़ों तथा
नलविरचितम् | ४५
कायफर के पत्तों को छोड़कर धनियाँ को अंगार में पकाकर छेंवक दे दे और पुनः
कर्पूर से सुगन्धित बना ले । पुनः पूगपट्ट से वेष्टित करे तथा संतप्त घृत में छोड़
दे । सिद्ध हो जाने पर भोजन के समय दिन में खाने के लिये दे । यह कुष्माण्ड
का फलपाक मांस को बढ़ाने वाला, स्वादिष्ट, शीतल, सभी दोषों को दूर करने
वाला, वीर्यवर्द्धक, दाह तथा प्यास को नाश करनेवाला है ॥ ३०१-३०८ ॥
सनिष्पावकुष्माण्डफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कुष्माण्डखण्डमेवं च पचेन्निष्पावमिश्रितम् ।
वृष्यमोजस्करं रुच्यं दीपनं बृंहणं परम् ॥ ३०९ ॥
भंटवासयुक्त कुष्माण्ड फलपाक बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त
प्रकार के चौकोर टुकड़े किये हुए कुष्माण्ड खण्ड (कोहड़े के टुकड़ों) को भंटवास
मिलाकर पकावे । यह सनिष्पाव कुष्माण्ड फलपाक वीर्यवर्द्धक, ओजकारक, रुचि-
कर, जाठराग्निदीपक तथा अच्छी तरह बलवर्द्धक होता है ॥ ३०९ ॥
तुम्बीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तुम्बीफलं दीर्घमानादाहरेत्तरुणं नवम् ।
अनेनैव प्रकारेण पाकं कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ३१० ॥
गुरु स्वादुतरं शीतं वर्तुलं श्लेष्मनाशनम् ।
तुम्बी (लौकी) फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—लम्बे नवीन
तथा तरुण लौकी के फल को ले ले और पूर्वोक्त प्रकार से काटकर पका ले तथा
खाने के लिये प्रदान करे । यह तुम्बी फलपाक गरिष्ठ, उत्तम, मधुर तथा शीत
होता है और गोल लौकी के फल का पाक वातनाशक होता है ॥ ३१० ॥
एर्वारुकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एवमेर्वारुकफलं कुर्यात्पाकमन्द्रितः ।
करोति जीर्णमन्येषां अन्नं युक्तं रुचिप्रदम् ॥ ३११ ॥
ककड़ी फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त प्रकार से ककड़ी
फल का पाक आलस्य रहित होकर बनावे । यह अन्य प्रकार के अन्न को जीर्ण
(पकाना) करता है तथा उत्तम रुचिकारक है ॥ ३११ ॥
सूरणकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सूदस्तु कन्दमानीय सूरणस्य नवं ततः ।
रक्षयित्वा¹ त्वचं तस्य कलिकन्या विसृजेत्ततः ॥ ३१२ ॥
छित्वा तद्गुणवत्सूक्ष्मं प्रवण्वां निक्षिपैत्ततः ।
सामुद्रं तत्र निक्षिप्य चिञ्चाम्लञ्च विनिक्षिपेत् ॥ ३१३ ॥
पृष्ठ ४६
पाकदर्पणम्
चुल्यां निधाय तद्भाण्डं तत्कन्दं तादृशं भवेत् ।
पक्वे तस्मिन् पुनश्चूर्णं त्र्यूषणस्य विनिक्षिपेत् ॥ ३१४॥
चूर्णञ्च विकिरेत्तत्र मेथीजीरकसम्भवम् ।
कैटर्यस्य फलं तत्र धान्याकं च विनिक्षिपेत् ॥ ३१५ ॥
प्रताप्य प्रवणीमन्यां भर्जयेत् रामठादिभिः ।
भर्जितं कन्दमानीय कर्पूरेणाधिवासयेत् ॥ ३१६ ॥
वेष्टयित्वा ततस्तं च पूगपट्टेषु निक्षिपेत् ।
पथ्यं क्रिमिहरं बल्यमर्शोध्नं दीपनं परम् ॥ ३१७॥
लघु रुच्यं श्रमह्रं विषघ्नं पुष्टिवर्द्धनम् ।
कुष्ठघ्नं पुष्टिकृच्छ्रेष्ठं वृष्यं सूरणकन्दकम् ॥ ३१८ ॥
सूरनकन्दपाक की निर्माण-विधि तथा गुण—पाचक सूरन का नवीन कन्द
लेकर उसकी त्वचा को चाकू से काटकर फेंक दे। इसके बाद उसका छोटा-छोटा
टुकड़ा बनाकर बटलोही में रक्खे और सामुद्र नमक तथा इमली की खटाई डाल
दे । तत्पश्चात् चूल्हे के ऊपर उस पात्र (बटलोही) को रखकर उस कन्द को
पूर्वोक्त प्रकार से पकावे। उसके पक जाने पर उसमें त्र्यूषण (सोंठ, पीपर, मरिच)
का चूर्ण छोड़ दे। पुनः उसमें मेथी तथा जीरा का चूर्ण बिखेर दे, तथा कायफर
का पत्ता एवं धनियाँ छोड़ दे। दूसरी बटलोही को तपाकर उसमें पूर्वोक्त कन्द
को घी, हींग आदि से भून ले । भूने हुए कन्द को लेकर कर्पूर से सुगन्धित कर
ले । इसके बाद उसको पूगपट्ट में लपेटकर रख दे । सूरन कन्दपाक पथ्य, क्रिमि-
हर, बलकारक, अर्शनाशक, उत्तम जाठराग्निदीपक, हल्का, रुचिवर्द्धक, थकावट
दूर करनेवाला, विषनाशक, पौष्टिक, कुष्ठनाशक, उत्तम पोषक तथा वीर्यवर्द्धक
होता है ॥ ३१२-३१८ ॥
वनसूरणकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
प्रयत्नेन समादाय वनसूरणकन्दकम् ।
अनेनैव प्रकारेण पाकं कुर्याद्विचक्षणः ॥ ३१९ ॥
अग्निकृत्कटुको रूक्षो हृद्रोगशमनः परः ।
गुल्मस्थौल्यविपार्शोघ्नो वनसूरणकन्दकः ॥ ३२० ॥
वनसूरन कन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण—विद्वान् पाचक प्रयत्न-
पूर्वक जंगली सूरन के कन्द को लेकर पूर्वोक्त सूरन कन्दपाक की तरह पाक बना
ले । वनसूरन कन्दपाक स्वाद में कटु, जाठराग्निवर्द्धक, रूक्ष, उत्तम, हृदयरोग-
शामक, गुल्मरोग, स्थूलता, विषविकार तथा अर्श (बवासीर) रोग को नाश
करने वाला है ॥ ३१९-३२० ॥
पृष्ठ ४७
नलविरचितम्
कुमुदोत्पलकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कुमुदोत्पलकन्दानि तावन्त्येव पचेत् क्रमात् ।
हितवृद्धिकरोनित्यं मधुरः पित्तनाशनः ॥ ३२१ ॥
कमलकन्द (भिसौंडा) का पाक बनाने की विधि तथा गुण—कुमुद तथा
कमल का कन्द लेकर पूर्वोक्त प्रकार से क्रमशः पका ले। यह कमलकन्दपाक हमेशा
हितकर, वृद्धिकारक, स्वाद में मधुर तथा पित्तनाशक होता है ॥ ३२० ॥
मूलककन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मूलकस्य नवं कन्दं पचेदेवं च पाकवित् ।
लघु स्वादुतरं पथ्यं दीपनाग्निकरं परम् ॥ ३२२ ॥
मूलककन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण—पाकज्ञ पाचक मूली के
नवीन एवं कोमल कन्द लेकर पूर्ववत् पका ले । यह हल्का, स्वादिष्ट, पथ्य तथा
अच्छी तरह जाठराग्निदीपक है ॥ ३२१ ॥
चक्रवर्त्त (वास्तूक) शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घनसारार्द्रकैयुक्तं चक्रवर्त्तं सुकोमलम् ।
तरुणीदलमानीय क्रिमिभ्यः शोधयेच्च तत् ॥ ३२३ ॥
प्रक्षाल्य पात्रे निक्षिप्य छादयेदार्द्रवाससा ।
निधाय प्रवणी चुल्यां तत्र किञ्चिज्जलं हरेत् ॥ ३२४ ॥
रामठस्य पुनस्तत्र क्षीरमल्पं च सेचयेत् ।
चक्रवर्त्तं समुद्भूतैः रसैः सह पचेच्च तत् ॥ ३२५ ॥
तादृशं चक्रवर्त्तं तत्तप्ते पयसि निक्षिपेत् ।
तिरोधाय मुखं तस्य अर्द्धपाकं ततो भवत् ॥ ३२६ ॥
तमालोक्य पुनस्तत्र यथार्थं लवणं क्षिपेत् !
शकलानि पुनस्तत्र लशुनाईकयोः क्षिपेत् ॥ ३२७॥
जातपाकं तमादाय वासयेत् कर्पूरादिभिः ।
बद्ध्वा तु पूगपट्टेन भुक्तिकाल प्रदापयेत् ॥ ३२८॥
लघुग्राहि त्रिदोषघ्नं चक्षुष्यो मधुरोऽग्निकृत् ।
परं सद्यो ग्रहण्यर्शः पित्तरोगविकारनुत् ॥ ३२९ ॥
चक्रवर्त्त (बथुआ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—कर्पूर तथा
अदरक से युक्त कोमल तथा तरुण बथुआ के पत्तों को लेकर क्रिमि आदि को साफ
कर ले और धोकर तथा पात्र (बटलोही) में रखकर गीले वस्त्र से ढक दे ।
इसके बाद प्रवणी (बटलोही) को चूल्हे पर रखकर उसमें थोड़ा जल मिला दे ।
४८ पाकदर्पणम्
पुनः हींग का जल (हींग का घोल) तथा थोड़ा दूध छोड़ दे और वथुआ के शाक
के रस के साथ उसको पकावे। इस प्रकार परिपक्व वास्तूक शाक को संतप्त घृत
में छोड़ दे। उसका मुख ढक कर अधपका होने तक पकावे। पुनः उसको देखकर
उचित मात्रा में नमक छोड़ दे। पुनः उसमें लहसुन तथा अदरक के कुछ टुकड़ो
को छोड़ दे। अच्छी तरह पक जाने पर निकाल ले और कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित कर ले। इसके बाद पूगपट्ट से बाँधकर भोजन के समय पर दे।
वास्तूक (बथुआ) का शाक हल्का, मलावरोधक, त्रिदोषनाशक, नेत्र के लिये
हितकर, स्वाद में मधुर तथा अग्निवर्द्धक है। यह शीघ्र ही अच्छी तरह ग्रहणी-
विकार, अर्श तथा पित्तविकार को दूर करता है ॥ ३२२-३२८ ॥
प्रकारान्तरेण चक्रवर्तशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुजातं चक्रवर्तस्य दलमानीय केवलम् ।
पाकं च पूर्ववत्कृत्वा मन्थानेन मथेद्द्रुतम् ॥ ३३० ॥
आर्द्रनिष्पावबीजानि तत्र पक्वानि निक्षिपेत् ।
नारिकेल फलोद्भूतशकलानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३१ ॥
चूर्णं च विकिरेत्तत्र मरीच्याद्युद्भवं ततः ।
कुष्माण्डवटकच्छेदैः पर्पटस्य कणैश्च तम् ॥ ३३२ ॥
भर्जयित्वा तमादाय घनसारण वासयेत् ।
ततश्च पूगपट्टेन वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ ३३३ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं कामिन्यादिविनोदनम् ॥ ३३४ ॥
दूसरे प्रकार से बथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—सुन्दर चक्र-
वर्त (बथुआ) के केवल पत्र को लेकर तथा पूर्ववत् पकाकर मथनी से शीघ्र ही
मथ दे। इसके बाद उसमें गीला भंटवास का बीज पकाकर छोड़ दे। पुनः नारि-
यल फल के टुकड़ों को छोड़ दे। तदनन्तर मरिच, धनिया, जीरा आदि का चूर्ण
मिला दे। इसके बाद घी में बथुआ के शाक को कोहड़बती के टुकड़े तथा पापड़
के टुकड़ों के साथ भून ले, और भूनने के बाद उतार कर्पूर से सुगन्धित कर तैयार
हो जाने पर पूगपट्ट से आवेष्टित कर खाने के लिये दे। यह रुचिकारक, पथ्य तथा
कामिनी स्त्रियों के लिये विनोद कारक होता है ॥ ३२९-३३३ ॥
नववास्तूकशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वास्तुकस्य नवं तत्र आनीयैव पचेत्ततः ।
मेधाग्निबलकृद्रुच्यं सक्षारं सर्वरोगजित् ॥ ३३५ ॥
नलविरचितम् ४९
नवीन बथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—नवीन बथुआ की जड़
रहित पत्र-तना आदि को लेकर पूर्वोक्त प्रकार से पकावे। यह जाठराग्नि को बढ़ाने
वाला, बल तथा रुचिकारक होता है। यह क्षार के साथ प्रयोग करने पर सभी
प्रकार के रोगों को जीत लेता है ॥ ३३५ ॥
चुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विधानेन पचेच्चुल्याः लघुपत्रं सुकोमलम् ।
वातला बद्धविण्मूत्ररूक्षपित्तकफेहिता ॥ ३३६ ॥
सत्तिक्तमधुराहारा मेहार्शो गुल्मनाशिनी ॥ ३३७ ॥
चुल्ली शाक बनाने की विधि तथा गुण—छोटे पत्रवाली कोमल चुल्ली शाक
लेकर विधिपूर्वक पकावे। यह वातकारक है तथा मल-मूत्र, विबन्ध (कब्जियत),
रूक्षता, पित्तविकार एवं कफविकार में हितकर है। वह स्वाद में तिक्त एवं मधुर है
और प्रमेह, अर्श रोग तथा गुल्मरोग को नाश करती है ॥ ३३६-३३७
लताचुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
लताचुल्याः पचेद्देवं नवचूतफलेन च ।
सरा विषघ्नी वृष्या च श्लेष्मनिग्रहिणीपरा ॥ ३३८ ॥
लता चुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण — सम्पूर्ण चुल्लीलता को
लेकर जड़ निकाल कर साफ कर ले और नवीन आम के फल के साथ पकावे।
यह दस्तावर, विषनाशक, वीर्यवर्द्धक तथा अच्छी तरह कफ को निकालने वाली
है ॥ ३३८ ॥
महाचुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः पचेत् महाचुल्लीमेवमानीय कोमलाम् ।
वृष्या सरा वातहरा क्रिमिदोषहरा परा ॥ ३३९ ॥
महाचुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण — कोमल महाचुल्ली लता
को लेकर पूर्व की तरह पका ले। यह वीर्यवर्द्धक, दस्तावर, वातहर तथा अच्छी
तरह क्रिमिविकार को दूर करनेवाली है ॥ ३३९ ॥
शिलाछिल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शिलाछिल्लीं समादाय पचेदेवं विधानतः ।
कुष्ठघ्ना सर्वदोषघ्नी वृश्चिकस्य विषापहा ॥ ३४० ॥
१. चुल्ली तथा महाछिल्ली शाक किसी निघण्टु में नहीं मिलते। आजकल इन्हें
क्या कहते हैं, यह अन्वेषणीय है। — लेखक
४ पा० द०
५० पाकदर्पणम्
शिलाछिल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पूर्वोक्त पाकनिर्माण
प्रकार से शिलाछिल्ली को लेकर विधानपूर्वक पकावे । यह कुष्ठ रोग को नाश
करनेवाली, सभी प्रकार के दोषों को नाश करने वाली तथा वृश्चिक (बिच्छू)
के विष को दूर करती है ॥ ३४०॥
बाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं बाष्पमानीय नवं सम्यक् विशोधयेत् ।
सिञ्चेत् क्षीरं प्रवण्याञ्च रामठं च ततः क्षिपेत् ॥ ३४१ ॥
तस्मिन् क्षीरे पुनस्तस्मिन् शोधितं बाष्पमाविशेत् ।
निक्षिपेत्तप्तबाष्पे च लशुनाईकयोः कणान् ॥ ३४२ ॥
लवणं च यथायोग्यं नवं सर्पिंश्च निक्षिपेत् ।
ततोऽवतार्य तत्रैव कर्पूरादीन् विनिक्षिपेत् ॥ ३४३ ॥
पूगपट्टेन तं बद्ध्वा दापयेद्भक्षयेत्ततः ।
अयं बाष्पस्त्रिदोषघ्नो लघुः स्वादुतरः सरः ॥ ३४४ ॥
बाष्प शाक (मारिष--मार्च्छाशाक ) बनाने की विधि तथा गुण - नवीन
तथा तरुण बाष्प (मार्छा) शाक लेकर अच्छी तरह साफ कर ले । इसके बाद
बटलोही में दूध तथा हींग का घोल छोड़ दे और उसमें साफ वाष्प शाक को
छोड़ दे । पुनः संतप्तबाष्पशाक में लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को मिला दे ।
इसके बाद उचित मात्रा में नमक तथा नवीन घी छोड़ दे । तदनन्तर उतार कर
उसमें कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों को मिला दे, और उसको पूगपट्ट से बाँधकर
खाने के लिये दे तथा स्वयं भक्षण करे । यह बाष्पशाक त्रिदोष को नाश करने
वाला, हल्का, स्वादिष्ट तथा दस्तावर होता है ॥ ३४१-३४४ ॥
ग्रन्थान्तरानुसारेणबाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पूर्ववत्तरुणं बाष्पं पक्वं सम्यग्विधं पुनः ।
सहकारफलोद्भूतशकलानि ततः पचेत् ॥ ३४५ ॥
लसुनाईकयोः कृत्वा कणान् चणकवत् क्षिपेत् ।
कुस्तुम्बुरीं बीजपूरं कैटर्यस्य दलानि च ॥ ३४६ ॥
कुसुमानि च केतक्याः कर्पूरं तत्र निक्षिपेत् ।
तमेतैः सह सम्पक्त्वा तं बाष्पमवतारयेत् ॥ ३४७ ॥
बद्ध्वा तं पूगपट्टेन प्रदद्याद्भोजनाथिने ।
अयं स्वादुतरो बाष्णो रुच्यो वृष्यकरः सरः ॥ ३४८ ॥
नलविरचितम् ५१
अन्य ग्रन्थानुसार बाष्प (मार्छा) का शाक बनाने की विधि तथा गुण -
बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से अच्छी तरह परिपक्व बाष्प को आम के फल के
टुकड़ों के साथ पकावे और लहसुन तथा अदरक के चने की तरह टुकड़ों को मिला
दे । इसके बाद धनियां, बिजौरा नींबू, कायफर के पत्र, केतकी का फूल तथा कर्पूर
को छोड़ दे । बाष्प के शाक को पूर्वोक्त सभी पदार्थों के साथ पकाकर उतार ले ।
तैयार हो जाने पर उस बाष्प शाक को पूगपट्ट से बाँधकर खानेवाले को दे । यह
बाष्प शाक स्वादिष्ट, रुचिकारक, वीर्यवर्द्धक तथा दस्तावर होता है । ३४५-४८।
चणकपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं दलमानीय शोधयेच्चणकस्य च ।
चुल्यां निधाय प्रवणीं तत्र सिञ्चेद् घृतं नवम् ॥ ३४९ ॥
सम्यक्तप्ते घृते तत्र लसूनस्य कणान् क्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य तद्दलं शोधितं क्षिपेत् ॥ ३५० ॥
पर्पटंस्य कणान् क्षिप्त्वा कुष्माण्डवटकांस्ततः ।
एभिः साकं समालोड्य दर्व्या पाकं च योजयेत् ॥ ३५१ ॥
अवलोक्य पुनः पाकमवतार्याधिवासयेत् ।
नेत्रेण वेष्टयित्वाथ भुक्तिक काले प्रदापयेत् ॥ ३५२ ॥
इदं स्वादुतरं वृष्यं पित्तघ्नं कफनाशनम् ॥ ३५३ ॥
चना के पत्ते का शाक बनाने की विधि तथा गुण -चना के तरुण पत्तों को
लेकर साफ कर ले । इसके बाद चूल्हे के ऊपर वटलोही में रखकर उसमें नया घृत
छोड़ दे । घी के अच्छी तरह संतप्त हो जाने पर लहसुन के टुकड़ों को छोड़े और
हींग को छोड़कर उसमें साफ किये हुए चना के पत्तों को मिला दे । साथ में पापड़
तथा कोहड़बटी को भी छोड़कर इन सबों के साथ कलछुल से चलाकर पकावे ।
पुनः उसको देखकर अच्छी तरह पक जाने पर उतार ले और कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित कर ले । तत्पश्चात् पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर भोजन के समय
परोसे । यह चणक पत्र शाक अत्यन्त स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, पित्त एवं कफनाशक
होता है ॥ ३४९-३५३ ॥
तण्डुलीयशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तण्डुलीयं समादाय पचेदेवं नवं बुधः ।
लघुः पित्तादि दोषघ्नो वातदोषहरः परः ३५४ ॥
चक्षुष्यो दीपनं रुच्यं स्तन्यकृत् स्तनरोगहा ।
मूत्रकृच्छ्रप्रशमनो पित्तघ्नो रक्तसारनुत् ॥ ३५५ ॥
६ पा. द.
५२ पाकदर्पणम्
तण्डुलीय (चौराई) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पूर्वोक्त प्रकार
से शोधित नवीन चौराई को लेकर चना के शाक सदृश पकावे । चौराई का शाक
हल्का, पित्तादिदोषनाशक, उत्तम वातविकारहर, नेत्र के लिये हितकर, जाठराग्नि-
दीपक, रुचिकारक, दुग्धवर्द्धक तथा स्तन के रोगों को नाश करने वाला है। यह
मूत्रकृच्छ्रशामक, पित्तनाशक तथा रक्तातिसार को दूर करता है ।। ३५४-३५५ ।।
महावाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
महावाष्पं समादाय पचेदेवं विधानतः ।
पित्तदोषहरं सम्यक् श्लेष्मदोषहरं सदा ॥
अपथ्यं श्लेष्मलो बल्यः सारो गुरुतरः परः ॥ ३५६ ॥
महावाष्प (महामार्छा) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-महावाष्प
(महामार्छा) का शाक लेकर पूर्वोक्त प्रकार से विधि पूर्वक पकावे । यह अच्छी
तरह पित्तदोष तथा कफविकार को दूर करनेवाला, अपथ्य, कफकारक, बलवर्द्धक,
दस्तावर तथा भारी होता है ।। ३५६ ।।
रक्तवाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
रक्तवाष्यं समादाय पचेदेवं विचक्षणः ।
समीरणहरो नित्यं वाष्पोऽयं सर्वरोगनुत् ॥ ३५७ ॥
रक्तमार्छा का शाक बनाने की विधि तथा गुण-विद्वान् पाचक लालमार्छा
को लेकर पूर्वोक्त प्रकार से विधिपूर्वक पकावे । यह रक्तवाष्पशाक हमेशा वात-
विकार को दूर करनेवाला तथा सभी रोगों को नाश करता है ।। ३५७ ।।
उपोदकीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उपोदकीं समादाय शोधयेत्क्षालयेज्जलैः ।
लवणादींश्च निक्षिप्य पक्त्वा राज्ञे प्रदापयेत् ॥ ३५८ ॥
स्वादुपाकरसा बल्या गुर्वी शीता रुचिप्रदा ।
चक्षुष्या वृंहणी कार्या श्लेष्मनिद्रा विधायिनी ॥ ३५९ ॥
उपोदकी (पोई) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पोई के शाक
को लेकर उसको अच्छी तरह साफ कर ले और जल से प्रक्षालन कर ले। पुनः
नमक मसाला आदि छोड़कर पकावे और राजा को खाने के लिये दे । यह स्वाद
में मधुर रसवाली, बलकारक, दुष्पच, शीतल, रुचिप्रद, नेत्र के लिये हितकर, मांस-
वर्द्धक किन्तु दुर्बल हरनेवाली तथा कफ एवं नींद लानेवाली है ।। ३५८-३५९ ।।
नलविरचितम् ५३
चित्रपाके तिक्तालाबुफलपाकविधिर्गुणाश्च
विचित्रशीलपाको यस्तिक्तालाबुफलं नयेत् ।
तत्तिक्तमोचनं कुर्यादन्यवस्तु प्रयोगतः ॥ ३६० ॥
गुञ्जामूलरसैस्तावत् तिक्तालाबु फलं पचेत् ।
अथवा यष्टिसम्भूत रसैर्वापि पचेद्बुधः ॥ ३६१ ॥
अथवा विपचेत्तच्च कुण्डलीरसयोगतः ।
अनेनैव प्रकारेण कुर्यात्तिक्तमोचनम् ॥ ३६२ ॥
पूर्ववच्च कृते पाके मधुरत्वं प्रजायते ।
वासनां पूर्ववद्दत्त्वा वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ ३६३ ॥
वातश्लेष्महरं पथ्यं दीपनं पाचनं भवेत् ।
चित्रपाक में कड़वी कद्दू फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण -यह
विचित्र प्रकार का शाक है जो कड़वे कद्दू फल का होता है । कड़वा कद्दू का
फल लेकर दूसरे वस्तुओं के संयोग से उसकी कड़ुवाहट को दूर करे । गुञ्जा की जड़
के रस से कड़वी लौकी के फल को पकावें । अथवा मुलेठी के साथ कड़वी लौकी
को पकावे अथवा गुडूची के रस के साथ पकावे । इसी प्रकार से कड़वी लौकी
की कड़ुआहट को दूर करे । इस प्रकार कड़ुआहट को दूर करने से उसमें मिठास
(मधुर रस) आ जाती है । अच्छी तरह परिपक्व हो जाने पर कर्पूर आदि द्रव्यों
से सुगन्धित बनाकर तथा पूगपट्ट से वेष्टित कर खाने लिये दे । यह वात-कफ को
दूर करनेवाला, पथ्य, जाठराग्निदीपक तथा पाचक होता है ॥ ३६०-३६३ ॥
तिक्तकोशातकीफलशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नवं तरुणमानीय तिक्तकोशातकीफलम् ॥ ३६४ ॥
तत्तिक्तमोचनं कुर्यात् जम्बूकल्क प्रयोगतः ।
ततः पाके कृते तस्मिन् मधुरत्वं प्रजायते ॥ ३६५ ॥
वासयेद्धनसारेण बद्धवा नेत्रेण दापयेत् ।
इदं रुचिकरं पथ्यं समीरणविजृम्भणम् ॥ ३६६ ॥
तिक्ततरोई के फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण - नवीन तथा तरुण
तींत तरोई के फल को लेकर जामुन के कल्क के साथ पकाकर उसकी तींताई को
दूर करे । जामुन के कल्क के साथ पाक करने पर उसमें मिठास आ जाती है ।
पक जाने पर कर्पूर आदि से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से बांधकर खाने के
लिये दे । तिक्त तरोई फल का शाक रुचिकारक, पथ्य तथा वातनाशक होता है ।
पृष्ठ ५४
५४ पाकदर्पणम्
तिक्तपटोलफलस्य पाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पटोलस्य फलं तिक्तं समादाय सुकोमलम् ।
जम्बीररससंयोगात् कुर्यात्तिक्तविमोचनम् ॥ ३६७ ॥
पाकं च पूर्ववत्कृत्वा शेषं पूर्ववदर्पयेत् ।
एतद्रुचिकरं पथ्यं वातश्लेष्महरं परम् ॥ ३६८ ॥
**तिक्तपटोलफल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—**कोमल तितऊआ
परवल के फल को लेकर तथा जम्बीरी निबू के रस के साथ पकाकर उसकी
तिताई को दूर कर ले । पुनः पूर्वोक्त पाक-विधि के अनुसार पकाकर तथा नमक,
मसाला आदि मिलाकर, कर्पूर आदि से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट से बाँधकर खाने
के लिये प्रदान करे। यह तिक्तपटोलफलपाक रुचिकारक, पथ्य तथा वात-कफ को
अच्छी तरह दूर करनेवाला है ॥३६७-३६८॥
कारवल्लीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अव्रणङ्कारवल्ल्याश्च दलमानीय कोमलम् ।
तिक्तं मूलेन पर्णेन श्वदंष्ट्रायाः परित्यजेत् ॥ ३६९ ॥
अथवा तिक्तपर्णैर्वा तत्तिक्तं परिमोचयेत् ।
पुनः पाके कृते तच्च मधुरत्वं प्रपद्यते ॥ ३७० ॥
यथार्हं पाकवित्तत्र कुर्यात्सम्भारमेलनम् ।
ततोऽवतार्य तत्रैव वासनादीन् समाचरेत् ॥ ३७१ ॥
विशदं दीपनं रुच्यं श्लेष्मकृमिसमीरनुत् ॥ ३७२ ॥
**करैली के पत्ते का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कृमिदंश आदि
विकाररहित कोमल करैले के पत्तों लेकर गोखुरू की जड़ तथा पत्तों से तिक्तता
को दूर करे अथवा नीम के पत्तों के साथ पकाकर तिक्तता दूर करे। तिक्तता
दूर करने के बाद पुनः पाक करने पर वह मधुर हो जाता है । इसके बाद अच्छी
तरह पाक को जानने वाला उसमें सम्भार (नमक मसाला आदि) को मिला दे
और उतारकर वहीं पर कर्पूर आदि से सुगन्धित बना ले। यह विशद, जाठराग्नि-
दीपक, रुचिकारक, कफविकार, कृमिरोग तथा वातविकार को दूर करता है।
जीवन्तीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं पर्णमानीय जीवन्त्याः क्रिमिवर्जितम् ।
पचेच्छ्रीहस्तिनीपर्णैर्यद्वा पौनर्नवैर्दलैः ॥ ३७३ ॥
सम्भारमेलपर्यन्तं पाकं कुर्याच्च तत्पुनः ।
तस्मिन् पाके पुनस्तानि निक्षिपेद्भर्जितान्यपि ॥ ३७४ ॥
पृष्ठ ५५
नलविरचितम् ५५
भर्जितानि पुनस्तानि वासयित्वाथ वेष्टयेत् ।
स्थापयेत्पूर्ववत्तानि दापयेत्सूपकोविदाः ॥ ३७५ ॥
लघु स्वादुतरं रम्यं वातपित्तादिनाशनम् ॥ ३७६ ॥
**जीवन्ती पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कृमिदंश-आदि से रहित
जीवन्ती के तरुण पत्तों को लेकर कर्कटी (ककड़ी = त्रपुसविशेषः) के पत्र के
साथ या पुनर्नवा के पत्र के साथ पाक करने के बाद पुनः सम्भार (नमक-मसाला
आदि) मिलाने पर्यन्त पाक करे । पाक हो जाने पर पुनः उनको भूनकर घी
छोड़ दे । इसके बाद भूने हुए उस शाक को सुगन्धित कर पूगपट्ट से वेष्टित करे
और रक्खे । तदनन्तर पाकशास्त्रवेत्ता उस शाक को खाने के लिये दे । यह जीवन्ती
पत्रशाक हल्का, स्वादिष्ट, मनोरम तथा वात-पित्तादिदोषों को नाश करनेवाला
होता है ॥ ३७३-३७६ ॥
उण्डूकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उण्डूकस्य फलं सम्यक्-आनीय तरुणं बुधः ।
उण्डूकस्योदरे सम्यक् पचेच्चार्याविमिश्रिते ॥ ३७७ ॥
कल्किन्या तक्षयित्वा च विसृजेत्तस्य कण्टकान् ।
धारयित्वा पुनस्तस्य सवृन्तं दण्डमुद्धरेत् ॥ ३७८ ॥
अन्यत्र निक्षिपेद्दण्डं उण्डूकं दण्डवर्जितम् ।
छिन्द्याद्द्विधा छिन्नान् भर्जयेद्भाजनेधृतेः ॥ ३७९ ॥
कल्किन्या च पुनः सूक्ष्मं छिन्द्यात्तदुण्डुकं फलम् ।
सम्भारान् सैन्धवादींश्च सर्पिषा सह निक्षिपेत् ॥ ३८० ॥
ततो दुग्धं च शकलं नारिकेलफलस्य च ।
एभिः सार्द्धं च कुर्वीत फलं कल्कञ्च तत्पुनः ॥ ३८१ ॥
उण्डूकस्य फलान्तस्थं सवृन्तं दण्डमुत्तमम् ।
करेणादाय कुर्वीत फलाकारं च पूर्ववत् ॥ ३८२ ॥
आकारस्य विना वार्धं सर्पिषा भर्जयेत्पुनः ॥ ३८३ ॥
घनसारदिना सम्यक् वासयित्वावतारयेत् ।
नेत्रेण पूगपट्टस्य कुर्यात्तत्पोटलीं बुधः ॥ ३८४ ॥
तप्ते घृते पुनस्तानि निक्षिप्याथ प्रदापयेत् ।
विसृज्य कण्टकानेतान् छलदन्तःस्थिरं रसम् ॥ ३८५ ॥
भोक्तुर्नित्यं सुखं सम्यक् अर्पयेदमृतं तथा ॥ ३८६ ॥
**उण्डूक फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—**बुद्धिमान् पाचक उण्डूक
५६ पाकदर्पणम्
का तरुण फल लेकर उसी के चर्या मिश्रित जल ( फिटकरी का पानी ) में अच्छी
तरह पकावे और चाकू से उनके कांटों को निकाल कर रख दे । पुनः उसके वृन्त
सहित दण्ड निकाल कर रख ले और उण्डूक फल को अलग लेकर काट ले तथा
घी के साथ भून ले । इसके बाद पुनः उस उण्डूक फल को चाकू से छोटा-छोटा
काट ले और सेन्धा नमक मसाला आदि घी के साथ छोड़ दे । इसके बाद दूध
तथा नारियल फल के टुकड़ों को मिलाकर सभी फल एवं कल्क को एकत्र कर
उण्डूक के फल के अन्दर के वृन्त सहित दण्ड को लेकर पूर्ववत् हाथ से फल
के आकार का बनावे और पूर्ववत् कण्टकों को यथा स्थान स्थान स्थापित कर दे ।
इसके बाद फल के आकार के विकृत हुए बिना ही घी में पुनः भून ले और कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों से अच्छी तरह सुगन्धित कर उतार ले । तदनन्तर पूगपट्ट के
नेत्र से पोटली बनावे तथा संतप्त घृत में रख दे । इसके बाद खाने के लिये प्रदान
करे । पूर्वोक्त कण्टकों को निकाल कर उसके अन्दर स्थित सुखप्रद स्वादिष्ट रस
को अमृत के सदृश खाने वाले को अर्पित करे । अर्थात् यह पाक अमृत के सदृश है
और खाने वालों के लिये सुखप्रद है ॥ ३७७-३८६ ॥
मुण्डकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलं मुण्डकमानीय छिन्द्यान्निष्पावमानतः ।
पूर्ववद्द्विपचेद्विद्वान् भूफलं भर्जयेत्तु पुनः ॥ ३८७ ॥
क्षीरेण विपचेत्कल्कं मरिचादिसमुद्भवम् ।
निक्षिपेत्तत्र निष्पावं सर्पिषा भर्जितं पुनः ॥ ३८८ ॥
निक्षेपेच्छकलं तत्र नारिकेलफलस्य च ।
निक्षिपेत् क्षुद्रपनसं फलं तत्र विभर्जितम् ॥ ३८९ ॥
दर्वीपुटेन तं पाकं समालोड्यावतारयेत् ।
तप्ते भाण्डे ततः सम्यक् घृतमासिच्य तत्र तु ॥ ३९० ॥
निक्षिपेच्च कणान् सूदः कुष्माण्डवटकोद्भवान् ।
पर्पटस्य कणांस्तत्र तत्फलं भर्जयेत्तु पुनः ॥ ३९१ ॥
ततोऽवतार्य तं पाकं कर्पूरेणाधिवासयेत् ।
कर्पूरपोटलीं कृत्वा तप्तसर्पिषि निक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥
ततश्च भुक्तिसमये प्रदद्यात्पाकमृत्तमम् ।
एष पाकः सुधास्तुल्यो वातपित्तहरः शुभः ॥ ३९३ ॥
सद्यः श्लेष्महरो वृष्यो लघुः स्वादुतरः शुभः ॥ ३९४ ॥
मुण्डक फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण — मुण्डक का फल लेकर
नलविरचितम् ५७
भटवांस के बराबर-बराबर काटे और विद्वान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से पकावे
पुनः भू-फल को भून ले और मरिच-धनिया आदि का कल्क मिलाकर दूध के साथ
पका ले । पुनः उसमें घी में भूना हुआ भटवांस तथा नारियल के टुकड़ों को मिला
दे । इसी प्रकार क्षुद्रपनस ( बाल कटहल ) के टुकड़ों को घी में भून कर मिला
दे । इसके बाद क ल्छुल से चला कर उस मुण्डक फल पाक को उतार ले । पुनः
एक गरम पात्र में घृत छोड़कर उसमें कुष्माण्डकण ( कोहड़ौरी के टुकड़ों ) तथा
पापड़ के टुकड़ों को छोड़ दे और मुण्डक फल पाक को मिलाकर भूने । इसके
बाद उस पाक को उतार कर कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य से सुगन्धित कर ले ।
पुनः कर्पूर की पोट ली बनाकर संतप्त घृत में रख दे । इस उत्तम पाक को भोजन
के समय दे । यह मुण्डक पाक अमृत के समान है और वात-पित्त को अच्छी तरह
दूर करता है । यह शीघ्र ही कफ को दूर करता है, वीर्य बढ़ाता है, हल्का तथा
अधिक स्वादिष्ट है ॥ ३८७-३९४ ॥
कारवल्लीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शोधितं क्रिमिभिः सम्यक् कदुष्णं कोमलं नवम् ।
पाकार्थमाहरेद्विद्वान् कारवल्ली फलं ततः ॥ ३९५ ॥
मूलाग्रे विसृजेच्छित्त्वा कल्किन्यासस्य विचक्षणः ।
निक्षिपेत्प्रवणीभाण्डे कारवल्लीफलं ततः ॥ ३९६ ॥
काञ्जिकामिश्रितं सिञ्चेत् जलं तत्र पुनर्बुधः ।
चुल्यां निधाय तद्भाण्डं पचेत्तत्तिक्तमोचनम् ॥ ३९७ ॥
ततस्तस्मात्समादाय पुनरत्र विनिक्षिपेत् ।
पुनः पाकं प्रकुर्वीत (पटु जैस्तु रसैः) पटु जम्बु रसै बुधः ॥ ३९८ ॥
भर्जयित्वा पुनः सूदः सर्पिषा तत्फलं शनैः ।
तत्रैकदेशं प्रच्छिन्द्यात् पणमात्रं शलाकया ॥ ३९९ ॥
शकलं रक्षयित्वाथ फलमादाय सुदराट् ।
शलाकया सकोशञ्च बीजं छिन्द्यात् समुद्धरेत् ॥ ४०० ॥
रक्षेत् घटिकाकारकारवल्लीफलं बुधः ।
बीजकोशं तनुं छिन्द्यात् कल्किन्या तीव्रधारया ॥ ४०१ ॥
तत्रैव निक्षिपेत् क्षीरं वटकानामम्लसम्भवान् ।
नारिकेलफलोद्भूतपुष्पाकारकणान् क्षिपेत् ॥ ४०२ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाईकयोः कणान् ।
मरिचादिसमुद्भूतचूर्णं तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ४०३ ॥
९८ | पाकदर्पणम्
कर्पूरादींश्च विन्यस्य घनीभूतघृतं क्षिपेत् ।
सर्वानितान् प्रकुर्वीत कल्काकारं शनैः बुधः ॥ ४०४ ॥
सुस्निग्धं प्रवणीभाण्डे कल्कमेतत्समाविशेत् ।
कल्कमेतत्समादाय यथा योग्यं प्रमाणवित् ॥ ४०५ ॥
कारवल्लोफलोद्भूतघटिकां पूरयेत्ततः ।
तद्रसं चारयेद्भिद्रांस्तदुत्थशकलानि च ॥ ४०६ ॥
नेत्रेण वेष्टयित्वाथ पूगपट्टेन शोभिना ।
उष्णे सर्पिषि निक्षिप्य फलमेतत्प्रदापयेत् ॥ ४०७ ॥
पथ्यं श्लेष्महरं नित्यं समीरणहरं पुनः ।
सर्बामयप्रशमनं कारवल्लीफलं त्विदम् ॥ ४०८ ॥
**कारवल्ली (करैला) फल का पाक (कलौंजी) बनाने की विधि तथा गुण—**विद्वान् पाचक क्रिमि आदि से अच्छी तरह शोधित, थोड़ा पका, कोमल, नवीन करैला के फल को पाक के लिये ग्रहण करे । इसके बाद उसके मूल तथा अग्रभाग को चाकू से काट कर फेंक दे तथा उस फल को बटलोही में रख कर उसमें काञ्जी मिश्रित जल छोड़ दे। तदनन्तर उस बटलोही को चूल्हा पर रख कर उसकी तिक्तता दूर करने के लिये पकावे । पुनः उस पात्र से निकाल कर दूसरी बटलोही में रक्खे तथा नमक के जल से पाक करे। इसके बाद बुद्धिमान् पाचक उस फल को धीरे-धीरे घी के साथ भून कर उसके एक स्थान को पैसा के बराबर शलाका से काट ले और उस टुकड़ा को सुरक्षित रख ले । पुनः उस फल को लेकर शलाका से कोश सहित बीज को काट दे तथा निकाल दे और घंटी की (घंटी के आकार) के आकार का बनाकर रख ले । तदनन्तर बीजकोश को तेज धार वाली चाकू से पतला-पतला काटे और उसी में खट्टे दूध के वटक को छोड़ दे । साथ ही नारियल के फल के पुष्प के आकार के टुकड़ों तथा लहसुन एवं अदरक के टुकड़ो को छोड़ दे । पुनः मरिच, धनिया, मसाला, नमक आदि के चूर्ण, कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य तथा गाढ़ा घी छोड़ दे। इसके बाद बुद्धिमान् पाचक इन सबों को कल्क के आकार का बना ले और अच्छी तरह स्निग्ध पात्र में रक्खे। तदनन्तर उचित प्रमाण को जानने वाला पाचक इस कल्क में से लेकर घटिकाकार करैला के फल के अन्दर भर दे और उसके रस को चलाकर पहले के टुकड़े से बन्द कर दे। इसके बाद पूगपट्ट के सुन्दर रस्सी से आवेष्टित कर गरम घी में छोड़ दे और इस कारवल्ली फल पाक को खाने के
नलविरचितम् | ५९
लिये दे । यह कारवल्ली फल पाक (करैला की कलौंजी) पथ्य, श्लेष्म हर, वात हर तथ सभी रोगों को शान्त करने वाला है ॥ ३९५-४०८ ॥
ग्रन्थान्तरे कारवल्लीफलपाकविधिर्गुणाश्च
कानिचित्कारवल्ल्यास्तु फलानि सुशुभानि च।
समादाय पुनस्तानि सूदः पाकविदाम्बरः ॥ ४०९ ॥
शोधितं क्रिमिभिः सम्यग्बहिरन्तः स्थितं पुनः ।
छित्वा च विसृजेत्तेषामग्राणि च ततः पुनः ॥ ४१० ॥
संछिद्य च पुनस्तानि शकलानि समं ततः ।
निधाय प्रवणीभाण्डे पुनस्तानि ततः परम् ॥ ४११ ॥
सैन्धवस्य ततश्चूर्ण विकिरेत्तेषु मानतः।
जम्बीराम्लजलं सिञ्चेत् पुनस्तेषु प्रमाणतः ॥ ४१२ ॥
पचेच्चुल्यां ततस्तानि भाण्डमारोप्य पाकवित् ।
छादयित्वा पचेत्तानि विधानेन तदाननम् ॥ ४१३ ॥
पिधानेन विना तेषां पाकश्चेत्तिक्तता भवेत् ।
अतः पिधानं संरक्षेत् यावत्पाकं समन्ततः ॥ ४१४ ॥
जले विलीनपाकस्य तानि ज्ञात्वावतारयेत् ।
नवं घृतं समासिच्य सर्पिषा तानि भर्जयेत् ॥ ४१५ ॥
अन्यस्मिन् प्रवणीभाण्डे भर्जयेद्द्रामठेन तत् ।
चातुर्जातकचूर्णञ्च चूर्णञ्च मरिचस्य च ॥ ४१६ ॥
चूर्णं च विकिरेत्तत्र मेथ्याजीरकसम्भवम् ।
कुस्तुम्बरीं च तत्रैव कैटर्यं च विनिक्षिपेत् ॥ ४१७ ॥
घनसार्रादिना सम्यक् कस्तूरीं च विनिक्षिपेत् ।
तथा कुङ्कुमचूर्णं च किञ्चित्किञ्चिद्द्रिमाम्बु च ॥ ४१८ ॥
एभिः साकं मेलयित्वा सूदस्तान्यवतारयेत् ।
पूगपट्टस्य नेत्रेण बद्धवा तानि नवेन च ॥ ४१९ ॥
निक्षिपेदुष्णसंयुक्ते तानि सर्पिषि दापयेत् ।
एतच्च कारवल्यायाः फलं भुञ्ज्यात्सुखप्रदम् ॥ ४२० ॥
हितकृत्सर्वजन्तूनां पथ्यं ज्ञानप्रदं लघु ॥ ४२१ ॥
**अन्य ग्रन्थ के अनुसार करैला का पाक बनाने की विधि—**पाकशास्त्र में प्रवीण पाचक बाहर-भीतर क्रिमि आदि से शुद्ध किये गये सुन्दर करैला के फलों को लेकर उनके अग्रभागों को काटकर फेंक दे पुनः उनके बराबर-बराबर टुकड़े
६० पाकदर्पणम्
काटकर तथा बटलोही में रखकर उसमें उचित मात्रा में सेन्धा नमक छोड़ दे ।
इसके बाद उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस छोड़ दे और चूल्हे पर पात्र को
रखकर पकावे । पकाते समय उसका मुख ढक कर पकावे । बिना ढके पकाने से
उसकी तिक्तता रह जाती है । अतः जब तक पाक होता है तब तक ढक कर रखे
जल में पाक हुआ जान कर उतार ले । इसके बाद नवीन घृत डाल कर घी के
साथ भून ले । एक दूसरे पात्र में हिंग के साथ भून ले और चातुर्जातचूर्ण
(दालचीनी, इलायची, तेजपत्र तथा नागकेशर ), मरिच का चूर्ण, मेथी चूर्ण तथा
जीरा का चूर्ण उसमें छोड़ दे । उसमें धनियाँ तथा जायफर का चूर्ण छोड़ दे और
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य एवं कस्तूरी मिला दे । इसके बाद कुंकुम से सदृश रंग
होने तक ठंडा जल छोड़ता जाय और पकाता जाय । पाचक इन पूर्वोक्त सभी
द्रव्यों को मिलाकर उतार ले । नवीन पूगपट्ट नेत्र से बाँध कर गरम घी में छोड़
दे और खाने के लिये प्रदान करे । इस करैला फल के शाक को सुख पूर्वक खाय ।
यह सभी मनुष्यों के लिये हितकर, पथ्य, ज्ञानप्रद तथा सुपच है ॥ ४०९-४२१ ॥
अन्य विधिः
कानिचित्कारवल्ल्यास्तु फलानि पुनराहरेत् ।
पूर्ववच्छोधयेत्तानि कल्किन्या तीव्रधारया ॥ ४२२ ॥
छित्त्वा त्रिधा चतुर्धा वा पूर्ववत्पाकवित्पचेत् ।
भर्जयेत्पूर्ववत्तानि रक्षेदन्यत्र बुद्धिमान् ॥ ४२३ ॥
तण्डुलस्योदकं किञ्चित् सिद्धेऽङ्गाण्डे ततः सुधीः ।
कल्कं च मरिचादीनां क्षिप्त्वा तत्र विलोडयेत् ॥ ४२४ ॥
जलं च तादृशं सूदो जालिन्या च विशोधयेत् ।
भाण्डे निधाय प्रपचेत् चुल्ल्यां तन्मेलनं बुधः ॥ ४२५ ॥
कैटर्यं तत्र निक्षिप्य धान्याकं तु विनिक्षिपेत् ।
मेथीजीरकचूर्णं च क्षिप्त्वा क्वाथ्येऽवतारयेत् ॥ ४२६ ॥
घनसारिादिभिः सम्यक् तं क्वाथमधिवासयेत् ।
भोजनावसरे प्राप्ते भर्जितं च सुरक्षितम् ॥ ४२७ ॥
कारवल्लीफलं तत्र निक्षिप्याथ समाहरेत् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं सर्वमयहरं परम् ॥ ४२८ ॥
कारवल्लीफलमिदं श्लेष्मवातहरं परम् ॥ ४२९ ॥
करैलाफल का पाक बनाने की दूसरी विधि—पूर्वोक्त प्रकार से शोधित कुछ
करैला के फल को लेकर तीव्र धार वाले चाकू से तीन या चार टुकड़ा बनाकर
नलविरचितम् ६१
पाचक पूर्ववत् पकावे और पहले की ही तरह नवीन घी हींग आदि के साथ भून ले
तथा कहीं अच्छी तरह रख दे । इसके बाद बुद्धिमान् पाचक चावल का धोअन
किसी पात्र रखे और मरिच, चातुर्जात आदि का कल्क उसमें छोड़कर मिला दे ।
इस जल को छलनी से छान ले । पुनः पात्र में उस मिलित जल को रखकर चूल्हा
के ऊपर पकावे । उसमें जायफल छोड़कर धनिया छोड़ दे और मेथी एवं जीरा का
चूर्ण छोड़कर पक जाने पर उतार ले । भोजन का समय होने पर भून कर सुरक्षित
रखे हुए करैला के फल को उसमें छोड़ कर मिला दे तथा खाने को दे । यह
करैला का फलपाक जाठराग्नि दीपक, पाचक, रुचिकारक, अच्छी तरह सभी
प्रकार के रोगों को दूर करने वाला तथा कफ एवं वातविकारों को दूर करता
है ॥ ४२२-४२९ ॥
कोशातकीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोशातकी फलस्यैवं सुजातस्य नवस्य च ।
कृत्वा पाकादिकं तस्य दापयेद्भक्षयेद्बुधः ॥ ४३० ॥
कोशातकी फलं रुच्यं कफ-पित्त हरं लघु ।
कुष्ठ-मेह-क्रिमि-श्वास-कासारुचिनाशनम् ॥ ४३१ ॥
कोशातकी ( नेनुआ ) के फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—
सुन्दर नवीन नेनुआ के फल को लेकर पूर्वोक्त फलपाकनिर्माणविधि की तरह
पाक करे और बुद्धिमान् पाचक खाने के लिये दे और स्वयं खाय । यह कोशातकी
फल का शाक रुचिकारक, कफ-पित्तनाशक तथा हल्का है और यह कुष्ठरोग,
प्रमेह, क्रिमिरोग, श्वासवृद्धि, कास ( खांसी ) तथा अरोचक को नाश करता
है ॥ ४३०-४३१ ॥
बालकोशातकीफलस्य गुणाः
मधुरं गुरुपित्तघ्नं बालकोशातकीफलम् ।
श्लेष्मपित्तकरं दिव्यं विषमज्वरनाशनम् ॥ ४३२ ॥
बालकोशातकीफल ( बाल नेनुआ ) के फल का गुण—बालकोशातकीफल,
मधुर, भारी, पित्तनाशक, फक-पित्तहर, दिव्य ( उत्तम ) तथा विषम ज्वर नाशक
है ॥ ४३२ ॥
कोशातकीमहाकोशातकीफलयोर्गुणाः
कोशातकीफलं पक्वं लालासृक्क्रिमिनाशनम् ।
वृष्यं विषघ्नं मधुरं महाकोशातकीफलम् ॥ ४३३ ॥
छोटा तथा बड़ा नेनुआ के फल का गुण—छोटा नेनुआ का पका फल,