पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ पाकदर्पणम्
पुनः हींग का जल (हींग का घोल) तथा थोड़ा दूध छोड़ दे और वथुआ के शाक
के रस के साथ उसको पकावे। इस प्रकार परिपक्व वास्तूक शाक को संतप्त घृत
में छोड़ दे। उसका मुख ढक कर अधपका होने तक पकावे। पुनः उसको देखकर
उचित मात्रा में नमक छोड़ दे। पुनः उसमें लहसुन तथा अदरक के कुछ टुकड़ो
को छोड़ दे। अच्छी तरह पक जाने पर निकाल ले और कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित कर ले। इसके बाद पूगपट्ट से बाँधकर भोजन के समय पर दे।
वास्तूक (बथुआ) का शाक हल्का, मलावरोधक, त्रिदोषनाशक, नेत्र के लिये
हितकर, स्वाद में मधुर तथा अग्निवर्द्धक है। यह शीघ्र ही अच्छी तरह ग्रहणी-
विकार, अर्श तथा पित्तविकार को दूर करता है ॥ ३२२-३२८ ॥
प्रकारान्तरेण चक्रवर्तशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुजातं चक्रवर्तस्य दलमानीय केवलम् ।
पाकं च पूर्ववत्कृत्वा मन्थानेन मथेद्द्रुतम् ॥ ३३० ॥
आर्द्रनिष्पावबीजानि तत्र पक्वानि निक्षिपेत् ।
नारिकेल फलोद्भूतशकलानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३१ ॥
चूर्णं च विकिरेत्तत्र मरीच्याद्युद्भवं ततः ।
कुष्माण्डवटकच्छेदैः पर्पटस्य कणैश्च तम् ॥ ३३२ ॥
भर्जयित्वा तमादाय घनसारण वासयेत् ।
ततश्च पूगपट्टेन वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ ३३३ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं कामिन्यादिविनोदनम् ॥ ३३४ ॥
दूसरे प्रकार से बथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—सुन्दर चक्र-
वर्त (बथुआ) के केवल पत्र को लेकर तथा पूर्ववत् पकाकर मथनी से शीघ्र ही
मथ दे। इसके बाद उसमें गीला भंटवास का बीज पकाकर छोड़ दे। पुनः नारि-
यल फल के टुकड़ों को छोड़ दे। तदनन्तर मरिच, धनिया, जीरा आदि का चूर्ण
मिला दे। इसके बाद घी में बथुआ के शाक को कोहड़बती के टुकड़े तथा पापड़
के टुकड़ों के साथ भून ले, और भूनने के बाद उतार कर्पूर से सुगन्धित कर तैयार
हो जाने पर पूगपट्ट से आवेष्टित कर खाने के लिये दे। यह रुचिकारक, पथ्य तथा
कामिनी स्त्रियों के लिये विनोद कारक होता है ॥ ३२९-३३३ ॥
नववास्तूकशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वास्तुकस्य नवं तत्र आनीयैव पचेत्ततः ।
मेधाग्निबलकृद्रुच्यं सक्षारं सर्वरोगजित् ॥ ३३५ ॥
नलविरचितम् ४९
नवीन बथुआ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—नवीन बथुआ की जड़
रहित पत्र-तना आदि को लेकर पूर्वोक्त प्रकार से पकावे। यह जाठराग्नि को बढ़ाने
वाला, बल तथा रुचिकारक होता है। यह क्षार के साथ प्रयोग करने पर सभी
प्रकार के रोगों को जीत लेता है ॥ ३३५ ॥
चुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विधानेन पचेच्चुल्याः लघुपत्रं सुकोमलम् ।
वातला बद्धविण्मूत्ररूक्षपित्तकफेहिता ॥ ३३६ ॥
सत्तिक्तमधुराहारा मेहार्शो गुल्मनाशिनी ॥ ३३७ ॥
चुल्ली शाक बनाने की विधि तथा गुण—छोटे पत्रवाली कोमल चुल्ली शाक
लेकर विधिपूर्वक पकावे। यह वातकारक है तथा मल-मूत्र, विबन्ध (कब्जियत),
रूक्षता, पित्तविकार एवं कफविकार में हितकर है। वह स्वाद में तिक्त एवं मधुर है
और प्रमेह, अर्श रोग तथा गुल्मरोग को नाश करती है ॥ ३३६-३३७
लताचुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
लताचुल्याः पचेद्देवं नवचूतफलेन च ।
सरा विषघ्नी वृष्या च श्लेष्मनिग्रहिणीपरा ॥ ३३८ ॥
लता चुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण — सम्पूर्ण चुल्लीलता को
लेकर जड़ निकाल कर साफ कर ले और नवीन आम के फल के साथ पकावे।
यह दस्तावर, विषनाशक, वीर्यवर्द्धक तथा अच्छी तरह कफ को निकालने वाली
है ॥ ३३८ ॥
महाचुल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः पचेत् महाचुल्लीमेवमानीय कोमलाम् ।
वृष्या सरा वातहरा क्रिमिदोषहरा परा ॥ ३३९ ॥
महाचुल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण — कोमल महाचुल्ली लता
को लेकर पूर्व की तरह पका ले। यह वीर्यवर्द्धक, दस्तावर, वातहर तथा अच्छी
तरह क्रिमिविकार को दूर करनेवाली है ॥ ३३९ ॥
शिलाछिल्लीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शिलाछिल्लीं समादाय पचेदेवं विधानतः ।
कुष्ठघ्ना सर्वदोषघ्नी वृश्चिकस्य विषापहा ॥ ३४० ॥
१. चुल्ली तथा महाछिल्ली शाक किसी निघण्टु में नहीं मिलते। आजकल इन्हें
क्या कहते हैं, यह अन्वेषणीय है। — लेखक
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