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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 69 में से

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पृष्ठ 26

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२८ पाकदर्पणम्
चुल्ल्यामारोपयेद्विद्वान् तापयेन्मृदुवह्निना ।
तदीषद्व्रव्यसंयुक्तं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १८२ ॥
शोधितं तत्पचेत्सम्यगवघट्टनपूर्वकम् ।
बुद्बुदेषु विलीनेषु रक्तवर्णं प्रदापयेत् ॥ १८३ ॥
सौरभ्यं निक्षिपेत्तत्र किञ्चिद्गोधूमचूर्णकम् ।
तदावलोक्य सूदस्तु तद्घृतं चावतारयेत् ॥ १८४ ॥
न्यसेत्तत्र च तक्राक्तताम्बूलीकृष्णवर्णकम् ।
घनसारदिना सूदो वासयेत् सर्पिरुत्तमम् ॥ १८५ ॥
इदमाज्यं नवं पूज्य प्रदद्याद्भोजनार्थिने ।
अत्र भोजनवेलायां प्रदद्याद्द्रवपूर्वकम् ॥ १८६ ॥
ईषद्धनीकृतं सर्पिर्दद्यात्पायसभोजने ।
भक्ष्यादिभक्षणे काले घृतं दद्याद् घनीकृतम् ॥ १८७ ॥
वातपित्तप्रशमनं सुरभि स्वादु बृंहणम् ।
धातुप्रसाधनं शीतं विपाकि मधुरावहम् ॥ १८८ ॥
माङ्गल्यचाक्षुषं सर्पिर्गव्यं ग्रहनिवारणम् ॥ १८९ ॥
**गोघृत निर्माण विधि तथा गुण—**सफेद गाय का नवनीत लेकर पीत वर्ण
होने तक अच्छी तरह शोधन करे। उसी दिन का बनाया हुआ गाय का घी
चूल्हे पर रखे और विद्वान् पाचक मन्दाग्नि से तपाये । कुछ थोड़े द्रव्यों से संयुक्त
उस घी को छलनी से छान ले । इसके बाद शोधित गोघृत को कलछुल से चलाते
हुए पकाये । पकाते समय बुदबुद शब्द के बन्द हो जाने पर रक्त वर्ण होने तक
पकाये । उसमें सुगन्धित द्रव्य छोड़ दे और थोड़ा गेहूँ का चूर्ण भी छोड़ दे। पाचक
उस घृत को परिपक्व देखकर उतार ले । तदनन्तर उसमें तक्रलिप्त ताम्बूली
कृष्ण वर्ण को छोड़ दे और पाचक कर्पूर आदि से उत्तम घी को सुगन्धित बना ले
और इस नवीन उत्तम घृत को भोजन करनेवालों के लिये अर्पित करे। भोजन के
समय उसको गलाकर (द्रव्य रूप बनाकर दे। पावसभोजन (वर्षाकालीन)
भोजन या पायस (खीर) भोजन के समय थोड़ा गाढ़ा किया घृत दे। भक्ष्य
आदि पदार्थ खाने के समय गाढ़ा किया घृत दे। यह गाय का घी वात-पित्त को
शान्त करनेवाला सुगन्धित, स्वादिष्ट तथा बृंहण (मांसवर्द्धक) होता है और
धातुओं (रसरक्तादि) धातुओं को शुद्ध करने वाला, शीतल, विपाक में मधुर,
कल्याणकारक, नेत्र के लिये हितकर तथा ग्रह को दूर करनेवाला होता है।


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नलविरचितम् २९
कुलत्थादीनां विशिष्टपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तानि तेभ्यः समादाय त्वचं दग्धां समुद्धरेत् ।
भाजने राजते तानि कल्कं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥ १९० ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
सैन्धवादीन् न्यसेत्तस्मिन् लशुनार्द्रकयोः कणान् ॥ १९१ ॥
कणेषु भर्जितेष्वेवं कुष्माण्डवटकोद्भवान् ।
सर्पिषा सह निक्षिप्य कुर्यादङ्गारधूपनम् ॥ १९२ ॥
फलाकाराणि कुर्वीत कल्केऽस्मिन् बहुलः सुधीः ।
तत्तदाकाररूपेण भर्जयेत्तलपेरैर्घृतैः ॥ १९३ ॥
भर्जितानि पुनस्तानि रक्षयेन्मक्षिकादिभिः ।
ततो भाण्डेषु कुर्वीत सम्भारांश्च पृथक् पृथक् ॥ १९४ ॥
सम्भाराणि पुनस्तानि फलाकाराणि निक्षिपेत् ।
तानि भाण्डेषु तप्तेषु भर्जयेद्रामठादिभिः ॥ १९५ ॥
घनसारदिभिर्भूयः सूदस्तान्यधिवासयेत् ।
पुनश्च तानि बध्नीयात् पूगपट्टेसु सूद्राट् ॥ १९६ ॥
निक्षिप्य तानि सर्वाणि अन्तराट्टालकेष्वपि ।
भोजनावसरे प्राप्ते भोक्तृष्वेतानि दापयेत् ॥ १९७ ॥
भवन्ति बहवः शाखाः वस्तुनेकैन संयताः ।
सूदस्य हस्तवैचित्र्यात् तद्बुद्धिविभवात्ततः ॥ १९८ ॥
घ्नन्ति सर्वमयानेते शाकभेदाः सुखावहाः ।
वातपित्तप्रशमनाः साधुकल्पाः शुभावहाः ॥ १९९ ॥
कुलत्थी, उड़द आदि शिम्बीधान्यों की विशिष्टपाकनिर्माणविधि तथा गुण—
पूर्वोक्त कुलथी उड़द, आदि शिम्बी धान्यों में से लेकर पके छिलकों को निकाल दे
और उसे चाँदी के पात्र में कल्क बनावें । इसके बाद पाचक कर्पूर आदि से सुवा-
सित कर ले । पुनः सेन्धा नमक तथा लहसुन एवं अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से कणों के भुन जाने पर कुष्माण्ड वटक (कोहणवरी) को घी के
साथ छोड़कर छौंक दे । पुनः उस कल्क में अनेक प्रकार से बहुत फल के आकार
का बना ले और पूर्वोक्त आकार के रूप में ही कड़ाही में घृत डालकर भून ले।
इस भूने हुए व्यञ्जन को मक्खी आदि से सुरक्षित रखे। इसके बाद अलग-
अलग पात्रों में सम्भार (भूने हुए पदार्थ) को रखकर तथा पुनः उसको फलाकार
बनाकर संप्त भाण्ड में हींग आदि के साथ भूने तथा कर्पूर, कस्तूरी आदि से सुवा-
सित कर ले । तदनन्तर पाचक पूगपट्ट नेत्र में उनको बांध कर तथा अट्टालिका