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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

२४ पाकदर्पणम्
त्रिकटुकखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तक्राजमोदसंयुक्तः खलस्त्रिकटुकोद्भवः ।
वासितः प्रसवैः सम्यक् सुगन्धसुमनोहरैः ॥ १५३ ॥
औदरानामयान् हन्ति जठराग्निप्रवर्द्धनम् ॥ १५४ ॥
त्रिकटु खल बनाने की विधि तथा गुण - तक्र (मट्ठा) तथा अजवायन से
युक्त त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) से बनाया हुआ सुगन्धित एवं मनोहर पुष्पों
से अच्छी तरह सुवासित किया हुआ खल (त्रिकटु खल) उदर के रोगों को नष्ट
करता है। तथा जाठराग्नि को बढ़ाता है ॥ १५३-१५४ ॥
शुद्धतेमननिर्माणविधिर्गुणांश्च
तक्रस्याम्लं मर्दयित्वा जलेन च विचक्षणः ।
तत्र सैन्धवसिद्धार्थं मरीचानागरोद्भवम् ॥ १५५ ॥
कल्कं चालोडयित्वा च वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
अयं तक्रसमुत्पन्नः खलो दीपनपाचनः ॥ १५६ ॥
त्रिदोषशमनं सम्यक् पीयूषसदृशः शुभः ॥ १५७ ॥
शुद्ध तेमन बनाने की विधि तथा गुण - बुद्धिमान् पाचक अम्लतक्र को जल
के साथ मर्दन कर उसमें सेन्धा नमक, सरसों, मरिच तथा सोंठ का कल्फ मिलाकर
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करें। यह तक्र के योग से बना हुआ खल
(शुद्ध तेमन) जाठराग्निदीपक तथा पाचक है। यह अच्छी तरह त्रिदोष को
शान्त करनेवाला अमृत के समान कल्याणकारक है ॥ १५५-१५७॥
कैटर्यं खलनिर्माणविधिर्गुणांश्च
व्योषकैडर्यलसुनजीरकाणि पुनर्नवैः ।
सैन्धवप्रमुखैर्युक्तः शरीरालनकृत्खलः ॥ १५८ ॥
कैटर्य खल निर्माणविधि तथा गुण - व्योष (सोंठ, पीपर, मरिच) कैटर्य
(कट्फल) लहसुन, जीरा, पुनर्नवा, सेन्धानमक आदि प्रमुख द्रव्यों से युक्त खल
(कैटर्य खल) जाठराग्नि को बढ़ानेवाला हैं। अर्थात् पूर्वोक्त खल में व्योष आदि
द्रव्यों को मिला देने से इसे कैटर्यखल कहते हैं और यह जाठराग्निवर्द्धक है ॥१५८॥
विशिष्टखलनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मरिचं लशुनं चैवं निर्गुण्डी वैजयन्तिका ।
कर्णमालाग्निकाचूतजीरकाहिङ्गु सैन्धवान् ॥ १५९ ॥
पेषयित्वा यथामात्रमेतान् तक्रेण लोडयेत् ।
आलोड़ितं पुनः कल्कं जालिन्या च विशोधयेत् ॥ १६० ॥


नर्लविरचितम् २५
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्ल्यां सं च प्रदापयेत् ।
निक्षिप्य गोघृतं तत्र नयेत्तस्मिन् प्रमाणवित् ॥ १६१ ॥
लशुनाजाजिसिद्धार्थं हिगुपर्पटमेथिकान् ।
भर्जयित्वा क्षिपेत्तत्र खलं तक्रविमिश्रितम् ॥ १६२ ॥
तन्मुखञ्च पिधानेन संछाद्य विपचेद्बुधः ।
यादृशं खलमादाय प्रदद्याद्बोधने दिने ॥ १६३ ॥
खलोऽयं साधितः सम्यक् वातश्लेष्मविनाशकः ।
उष्णं वीर्यकरं सम्यक् दीपन्नाग्निकरं शुभम् ॥ १६४ ॥
विशिष्ट 'खल' बनाने की विधि तथा गुण - काली मरिच, लहसुन, निर्गुण्डी-
बीज, वैजयन्तिका (गनियारी), कर्णमाला (नील कमल), अग्निका (चित्रक)
चूत (आम की गुठली), जीरा, हींग तथा सेन्धानमक इन सबको पीसकर
उचित मात्रा में तक्र के साथ मिला दे। पुनः मिलाये हुए कल्क को चलनी से छान
ले। इसके बाद प्रवणी भाण्ड (बटलोही या मिट्टी की हाड़ी) को चूल्हा पर रख
कर उसमें पूर्वोक्त कल्क को छोड़ दे और उसमें गाय का घी उचित मात्रा में
डालकर लहसुन, जीरा, सरसो, हींग, पित्त पापड़ा तथा मेथी को भूनकर मिला दे।
इसके बाद उसमें तक्र मिश्रित "खल" को छोड़ दे और उसका मुँह ढक्कन
से बन्द कर बुद्धिमान् पाचक पकाये। तैयार हो जाने पर एक चौथाई (एक
तोल = दस मि० ली०) खल प्रातःकाल पीने के लिये दे। यह अच्छी तरह
बनाया हुआ खल वात-कफ को नाश करने वाला है। यह उष्ण है तथा अच्छी
तरह वीर्यवर्द्धक है और जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है ॥ १५९-१६४ ॥
सितकुलित्थरसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
रसं शीतकुलित्थोत्थं लशुनामरिचान्वितम् ।
रामठं सैन्धवं तत्र निवेद्येन्मानवः पुनः ॥ १६५ ॥
प्रदद्याद्वासितं पुष्पैः कर्पूराद्यैश्च सूदराट् ।
रसं शीतकुलित्थोत्थं समस्तामयहृत्तथा ॥ १६६ ॥
क्षुत्कृत् हृत्परमं स्वादु परमात्मसुहृत्पुनः ॥ १६७ ॥
सफेद कुरथी का रस बनाने की विधि तथा गुण--सफेद कुरथी का रस लेकर
उसमें लहसुन तथा मरिच का चूर्ण मिला दे और पुनः पाचक उसमें हींग तथा सेन्धा-
नमक छोड़ दे। इसके बाद उत्तम पाचक पुष्प तथा कर्पूर आदि से सुवासित
कुरथी के रस को पान करने के लिये दे। यह सितकुलित्थोत्थरस सम्पूर्ण रोगों को