पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 69 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्णकारक, प्रेमहनाशक, नेत्र के लिये हितकर, वीर्यवर्द्धक, रुचिकारक, मांस-
वर्द्धक तथा कफनाशन है ॥ २८५-२८६ ॥
अगस्त्यफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अगस्त्यस्य फलं सूदस्तरुणं कोमलं भवेत् ।
कलिकन्या तत्फलं छिन्द्यादङ्गुलीदीर्घमानतः ॥ २८७ ॥
जलेन पटुना सार्द्धं प्रवण्वां च पचेत्ततः ।
तस्मिन् पक्वे ततः सूदस्तदादाय च वै फलम् ॥ २८८ ॥
अन्यस्मिन् प्रवणीभाण्डे क्षीरमासिच्य यत्नतः ।
तिलबीजार्धपलिका नारिकेलफलोद्भवम् ॥ २८९ ॥
कल्कमालोड्य तत्रैव तत्फलानि विनिक्षिपेत् ।
निक्षिपेत्क्षीरवटकन् क्षीरं च परिवेष्टयेत् ॥ २९० ॥
प्रताप्य प्रवणीमन्यां घृतं तत्र क्षिपेन्नवम् ।
रामठञ्च विनिक्षिप्य कूष्माण्डवटकान् क्षिपेत् ॥ २९१ ॥
दर्या विघट्य तांस्तत्र पर्यवस्य ( पर्पटस्य ) कणान् क्षिपेत् ।
कृत्वा पाकं पुनः सम्यगवतार्य च तत्फलम् ॥ २९२ ॥
पुनश्च घनशारेण तं पाकमध्वासयेत् ।
नेत्रेण पूगपट्टस्य वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ २९३ ॥
इदं रुच्यं च वातघ्नं कफकृत् पित्तकृद्भवेत् ।
अवृष्यं रोचनं वह्निरसान्द्रं शूलका (हा) रि च ॥ २९४ ॥
अगस्त्य फल पाक बनाने की विधि तथा गुण— पाचक अगस्त्य के तरुण
एवं कोमल फल को लेकर अङ्गुली की लम्बाई के बराबर चाकू से काटे और जल
के साथ तथा नमक मिलाकर वटलोही पात्र में पकावे । इसके बाद पक जाने पर
पाचक उस फल को लेकर दूसरे वटलोही पात्र में लेकर तथा दूध से सींचकर
प्रयत्नपूर्वक पकावे । बाद में आधा पल ( २५ ग्रा. ) तिल का कल्क तथा नारियल
का कल्क मिलाकर उसीमें उस फल को छोड़ दे । तदनन्तर उसमें क्षीरवटक छोड़ दे
और दूध भी छोड़ दे । तत्पश्चात् दूसरी वटलोही को गरम कर उसमें नवीन घृत
तथा हींग छोड़कर कूष्माण्ड वटक छोड़ दे । पुनः उसको कलछुल से घोटकर उस
में पर्यव ( पर्पट-पित्तपापड़ा ) का चूर्ण छोड़ दे । पुनः अच्छीतरह पकाकर उतार
ले और उस फलपाक को कर्पूर से सुगन्धित कर ले । इसके बाद पूगपट्ट के नेत्र
( रस्सी ) से बाँधकर खाने के लिये दे । यह अगस्त्य फलपाक रुचिकारक, वात-
नाशक, कफ एवं पित्तकारक, अवृष्य, रुचिवर्द्धक, अग्निदीपक तथा शूलनाशक
होता है ॥ २८७-२९४ ॥
१हुंकारफलविरूपकफलयोः निर्माणविधिर्गुणाश्च
हुँकारफलमादाय सम्भारेण पचेद्बुधः ।
वासनादीन् पुनः कुर्यादनालस्येन पूर्ववत् ॥ २९५ ॥
आनीय पूर्ववद्विद्वान् विरूपकफलं पचेत् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं लघु पित्तानिलापहम् ॥ २९६ ॥
गुल्मशूलहरं नित्यं दन्तदार्ढ्यकरं परम् ॥
हुंकारफल तथा विरूपकफलपाक बनाने की विधि तथा गुण— बुद्धिमान् पाचक
हुँकार का फल लेकर पूर्वोक्त सामग्रियों के साथ पाक करे और पूर्ववत् आलस्य
रहित होकर कर्पूर आदि से सुगन्धित करे । इसी प्रकार विद्वान् पाचक विरूपक
फल लेकर भी पाक करे । यह जाठराग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, हल्का, पित्त-
वातनाशक, गुल्मरोग तथा शूलहर तथा अच्छी तरह दाँतों को मजबूत करने
वाला है ॥ २९५–२९६ ॥
औदुम्बरफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
औदुम्बरस्य रम्याणि फलान्यानीय बुद्धिमान् ।
शोधयेत्सर्ववृन्तानि सम्भारानि पुनः पचेत् ॥ २९७ ॥
वासनादीन् ततः कृत्वा दापयेद्भक्षयेद्बुधः ।
वातघ्नं कफहृद्ग्राहि कषायं दीपनं लघु ॥ २९८ ॥
बृंहणं रोचनं पथ्यं ज्वरातिसारदाहजित् ।
गूलरफल के पाक निर्माण की विधि तथा गुण— बुद्धिमान् पाचक गूलर के
सुन्दर फलों को लेकर उसकी सभी भेंटियों को साफ कर दे, और साम्भर नमक,
मसाला आदि के साथ पकावे । इसके बाद कर्पूर आदि से सुगन्धित कर राजा को
दे तथा स्वयं भक्षण करे । औदुम्बरफलपाक वातनाशक, कफ को दूर करनेवाला,
कषायरसयुक्त, जाठराग्निदीपक तथा हल्का ( सुपच ) होता है। यह मांसवर्द्धक
रुचिकारक, पथ्य, ज्वरातिसार तथा दाहनाशक है ॥ २९७–२९८ ॥
औदुम्बरबालफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
आनीय पूर्ववद्बालमक्षोवस्य फलं पचेत् ॥ २९९ ॥
१. हुँकार फल तथा विरूपक फल का नाम किसी निघण्टु में नहीं मिला ।
सम्भवतः विरूपक फल पिपरामूल का फल है । यह अन्वेषणीय है । —लेखक