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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

४४ | पाकदर्पणम्
तिक्तं कषायं वातघ्नमिदं श्लेष्मविनाशनम् ।
विसर्पहरं गुल्मरक्तातिसारमेहजित् ॥ ३०० ॥
गूलर का बालफलपाक बनाने की विधि तथा गुण—गूलर का बाल फल
लेकर पूर्ववत् पकावे । यह तिक्त तथा कषाय रसवाला होता है । वात एवं कफ
को नाश करता है, विसर्प को दूर करता है, गुल्मरोग, रक्तातिसार तथा प्रमेह को
जीत लेता है ॥ २९९-३०० ॥
पक्वकुष्माण्डफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वर्जितं क्रिमिभिः पक्वं कुष्माण्डफलमुत्तमम् ।
कलिकन्या खण्डयेत्तच्च कूटवच्चतुरश्रवम् ॥ ३०१ ॥
समुत्सृज्य ततो बीजान् अन्त्राणि तु समुत्सृजेत् ।
तानि प्रक्षाल्य तोयेन प्रवण्यां निक्षिपेत्पुनः ॥ ३०२ ॥
सामुद्रं तत्र निक्षिप्य पचेतानि पुनर्बुधः ।
दध्यम्लमाषपिष्टेन तानि लिम्पेत्समन्ततः ॥ ३०३ ॥
कुङ्कुमच्छविविप्यन्तं सर्पिषा तानि भर्जयेत् ।
मेथीजीरकसिद्धार्थं तिलमाषसमुद्भवान् ॥ ३०४ ॥
चूर्णश्च विकिरेत्तेषु तत्सिद्धयर्थं पुनः पचेत् ।
पलाण्डोस्तत्र खण्डानि कैटर्यस्य दलानि च ॥ ३०५ ॥
क्षिप्त्वा कुस्तुम्बरीं धान्यमङ्गारेष्वथ धूपयेत् ।
वासयेद् घनसारण पुनस्तानी विचक्षणः ॥ ३०६ ॥
वेष्टयेत्पूगपट्टेन तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ।
भोजनावसरे प्राप्ते दापयेद्भोजने दिने ॥ ३०७ ॥
इदं कुष्माण्डकफलं बृंहणं स्वादु शीतलम् ।
सर्वदोषहरं वृष्यं दाहतृड्भयनाशनम् ॥ ३०८ ॥
कुष्माण्ड फलपाक निर्माणविधि तथा गुण—क्रिमिदोषरहित परिपक्व उत्तम
कुष्माण्ड फल को लेकर चाकू से कूट के समान चौकोर काट ले । इसके बाद उसके
बीजों को निकाल कर फेंक दे और उसके अन्दर के रेशों को भी फेंक दे । तदनन्तर
उन कुष्माण्ड के टुकड़ों को जल से प्रक्षालन कर बटलोही में रक्खे । पुनः बुद्धि-
मान् पाचक उसमें सामुद्र नामक छोड़कर पकावे । इसके बाद दही, खटाई तथा
उड़द की पीठी से उसे लिप्त कर दे और केशर सदृश वर्ण होने तक उनको घी में
भूने । तदनन्तर मेथी, जीरा, सरसों, तिल तथा उड़द के चूर्ण को उनमें मिला दे
और उसको सिद्ध होने के लिये पुनः पकावे । इसके बाद प्याज के टुकड़ों तथा
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कायफर के पत्तों को छोड़कर धनियाँ को अंगार में पकाकर छेंवक दे दे और पुनः
कर्पूर से सुगन्धित बना ले । पुनः पूगपट्ट से वेष्टित करे तथा संतप्त घृत में छोड़
दे । सिद्ध हो जाने पर भोजन के समय दिन में खाने के लिये दे । यह कुष्माण्ड
का फलपाक मांस को बढ़ाने वाला, स्वादिष्ट, शीतल, सभी दोषों को दूर करने
वाला, वीर्यवर्द्धक, दाह तथा प्यास को नाश करनेवाला है ॥ ३०१-३०८ ॥
सनिष्पावकुष्माण्डफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कुष्माण्डखण्डमेवं च पचेन्निष्पावमिश्रितम् ।
वृष्यमोजस्करं रुच्यं दीपनं बृंहणं परम् ॥ ३०९ ॥
भंटवासयुक्त कुष्माण्ड फलपाक बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त
प्रकार के चौकोर टुकड़े किये हुए कुष्माण्ड खण्ड (कोहड़े के टुकड़ों) को भंटवास
मिलाकर पकावे । यह सनिष्पाव कुष्माण्ड फलपाक वीर्यवर्द्धक, ओजकारक, रुचि-
कर, जाठराग्निदीपक तथा अच्छी तरह बलवर्द्धक होता है ॥ ३०९ ॥
तुम्बीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तुम्बीफलं दीर्घमानादाहरेत्तरुणं नवम् ।
अनेनैव प्रकारेण पाकं कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ३१० ॥
गुरु स्वादुतरं शीतं वर्तुलं श्लेष्मनाशनम् ।
तुम्बी (लौकी) फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—लम्बे नवीन
तथा तरुण लौकी के फल को ले ले और पूर्वोक्त प्रकार से काटकर पका ले तथा
खाने के लिये प्रदान करे । यह तुम्बी फलपाक गरिष्ठ, उत्तम, मधुर तथा शीत
होता है और गोल लौकी के फल का पाक वातनाशक होता है ॥ ३१० ॥
एर्वारुकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एवमेर्वारुकफलं कुर्यात्पाकमन्द्रितः ।
करोति जीर्णमन्येषां अन्नं युक्तं रुचिप्रदम् ॥ ३११ ॥
ककड़ी फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त प्रकार से ककड़ी
फल का पाक आलस्य रहित होकर बनावे । यह अन्य प्रकार के अन्न को जीर्ण
(पकाना) करता है तथा उत्तम रुचिकारक है ॥ ३११ ॥
सूरणकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सूदस्तु कन्दमानीय सूरणस्य नवं ततः ।
रक्षयित्वा¹ त्वचं तस्य कलिकन्या विसृजेत्ततः ॥ ३१२ ॥
छित्वा तद्गुणवत्सूक्ष्मं प्रवण्वां निक्षिपैत्ततः ।
सामुद्रं तत्र निक्षिप्य चिञ्चाम्लञ्च विनिक्षिपेत् ॥ ३१३ ॥