पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० पाकदर्पणम्
शिलाछिल्ली का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पूर्वोक्त पाकनिर्माण
प्रकार से शिलाछिल्ली को लेकर विधानपूर्वक पकावे । यह कुष्ठ रोग को नाश
करनेवाली, सभी प्रकार के दोषों को नाश करने वाली तथा वृश्चिक (बिच्छू)
के विष को दूर करती है ॥ ३४०॥
बाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं बाष्पमानीय नवं सम्यक् विशोधयेत् ।
सिञ्चेत् क्षीरं प्रवण्याञ्च रामठं च ततः क्षिपेत् ॥ ३४१ ॥
तस्मिन् क्षीरे पुनस्तस्मिन् शोधितं बाष्पमाविशेत् ।
निक्षिपेत्तप्तबाष्पे च लशुनाईकयोः कणान् ॥ ३४२ ॥
लवणं च यथायोग्यं नवं सर्पिंश्च निक्षिपेत् ।
ततोऽवतार्य तत्रैव कर्पूरादीन् विनिक्षिपेत् ॥ ३४३ ॥
पूगपट्टेन तं बद्ध्वा दापयेद्भक्षयेत्ततः ।
अयं बाष्पस्त्रिदोषघ्नो लघुः स्वादुतरः सरः ॥ ३४४ ॥
बाष्प शाक (मारिष--मार्च्छाशाक ) बनाने की विधि तथा गुण - नवीन
तथा तरुण बाष्प (मार्छा) शाक लेकर अच्छी तरह साफ कर ले । इसके बाद
बटलोही में दूध तथा हींग का घोल छोड़ दे और उसमें साफ वाष्प शाक को
छोड़ दे । पुनः संतप्तबाष्पशाक में लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को मिला दे ।
इसके बाद उचित मात्रा में नमक तथा नवीन घी छोड़ दे । तदनन्तर उतार कर
उसमें कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों को मिला दे, और उसको पूगपट्ट से बाँधकर
खाने के लिये दे तथा स्वयं भक्षण करे । यह बाष्पशाक त्रिदोष को नाश करने
वाला, हल्का, स्वादिष्ट तथा दस्तावर होता है ॥ ३४१-३४४ ॥
ग्रन्थान्तरानुसारेणबाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पूर्ववत्तरुणं बाष्पं पक्वं सम्यग्विधं पुनः ।
सहकारफलोद्भूतशकलानि ततः पचेत् ॥ ३४५ ॥
लसुनाईकयोः कृत्वा कणान् चणकवत् क्षिपेत् ।
कुस्तुम्बुरीं बीजपूरं कैटर्यस्य दलानि च ॥ ३४६ ॥
कुसुमानि च केतक्याः कर्पूरं तत्र निक्षिपेत् ।
तमेतैः सह सम्पक्त्वा तं बाष्पमवतारयेत् ॥ ३४७ ॥
बद्ध्वा तं पूगपट्टेन प्रदद्याद्भोजनाथिने ।
अयं स्वादुतरो बाष्णो रुच्यो वृष्यकरः सरः ॥ ३४८ ॥
नलविरचितम् ५१
अन्य ग्रन्थानुसार बाष्प (मार्छा) का शाक बनाने की विधि तथा गुण -
बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से अच्छी तरह परिपक्व बाष्प को आम के फल के
टुकड़ों के साथ पकावे और लहसुन तथा अदरक के चने की तरह टुकड़ों को मिला
दे । इसके बाद धनियां, बिजौरा नींबू, कायफर के पत्र, केतकी का फूल तथा कर्पूर
को छोड़ दे । बाष्प के शाक को पूर्वोक्त सभी पदार्थों के साथ पकाकर उतार ले ।
तैयार हो जाने पर उस बाष्प शाक को पूगपट्ट से बाँधकर खानेवाले को दे । यह
बाष्प शाक स्वादिष्ट, रुचिकारक, वीर्यवर्द्धक तथा दस्तावर होता है । ३४५-४८।
चणकपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं दलमानीय शोधयेच्चणकस्य च ।
चुल्यां निधाय प्रवणीं तत्र सिञ्चेद् घृतं नवम् ॥ ३४९ ॥
सम्यक्तप्ते घृते तत्र लसूनस्य कणान् क्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य तद्दलं शोधितं क्षिपेत् ॥ ३५० ॥
पर्पटंस्य कणान् क्षिप्त्वा कुष्माण्डवटकांस्ततः ।
एभिः साकं समालोड्य दर्व्या पाकं च योजयेत् ॥ ३५१ ॥
अवलोक्य पुनः पाकमवतार्याधिवासयेत् ।
नेत्रेण वेष्टयित्वाथ भुक्तिक काले प्रदापयेत् ॥ ३५२ ॥
इदं स्वादुतरं वृष्यं पित्तघ्नं कफनाशनम् ॥ ३५३ ॥
चना के पत्ते का शाक बनाने की विधि तथा गुण -चना के तरुण पत्तों को
लेकर साफ कर ले । इसके बाद चूल्हे के ऊपर वटलोही में रखकर उसमें नया घृत
छोड़ दे । घी के अच्छी तरह संतप्त हो जाने पर लहसुन के टुकड़ों को छोड़े और
हींग को छोड़कर उसमें साफ किये हुए चना के पत्तों को मिला दे । साथ में पापड़
तथा कोहड़बटी को भी छोड़कर इन सबों के साथ कलछुल से चलाकर पकावे ।
पुनः उसको देखकर अच्छी तरह पक जाने पर उतार ले और कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित कर ले । तत्पश्चात् पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर भोजन के समय
परोसे । यह चणक पत्र शाक अत्यन्त स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, पित्त एवं कफनाशक
होता है ॥ ३४९-३५३ ॥
तण्डुलीयशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तण्डुलीयं समादाय पचेदेवं नवं बुधः ।
लघुः पित्तादि दोषघ्नो वातदोषहरः परः ३५४ ॥
चक्षुष्यो दीपनं रुच्यं स्तन्यकृत् स्तनरोगहा ।
मूत्रकृच्छ्रप्रशमनो पित्तघ्नो रक्तसारनुत् ॥ ३५५ ॥
६ पा. द.