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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 69 में से

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पृष्ठ 35

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पाकदर्पणम्
चुल्यां निधाय तद्भाण्डं तत्कन्दं तादृशं भवेत् ।
पक्वे तस्मिन् पुनश्चूर्णं त्र्यूषणस्य विनिक्षिपेत् ॥ ३१४॥
चूर्णञ्च विकिरेत्तत्र मेथीजीरकसम्भवम् ।
कैटर्यस्य फलं तत्र धान्याकं च विनिक्षिपेत् ॥ ३१५ ॥
प्रताप्य प्रवणीमन्यां भर्जयेत् रामठादिभिः ।
भर्जितं कन्दमानीय कर्पूरेणाधिवासयेत् ॥ ३१६ ॥
वेष्टयित्वा ततस्तं च पूगपट्टेषु निक्षिपेत् ।
पथ्यं क्रिमिहरं बल्यमर्शोध्नं दीपनं परम् ॥ ३१७॥
लघु रुच्यं श्रमह्रं विषघ्नं पुष्टिवर्द्धनम् ।
कुष्ठघ्नं पुष्टिकृच्छ्रेष्ठं वृष्यं सूरणकन्दकम् ॥ ३१८ ॥
सूरनकन्दपाक की निर्माण-विधि तथा गुण—पाचक सूरन का नवीन कन्द
लेकर उसकी त्वचा को चाकू से काटकर फेंक दे। इसके बाद उसका छोटा-छोटा
टुकड़ा बनाकर बटलोही में रक्खे और सामुद्र नमक तथा इमली की खटाई डाल
दे । तत्पश्चात् चूल्हे के ऊपर उस पात्र (बटलोही) को रखकर उस कन्द को
पूर्वोक्त प्रकार से पकावे। उसके पक जाने पर उसमें त्र्यूषण (सोंठ, पीपर, मरिच)
का चूर्ण छोड़ दे। पुनः उसमें मेथी तथा जीरा का चूर्ण बिखेर दे, तथा कायफर
का पत्ता एवं धनियाँ छोड़ दे। दूसरी बटलोही को तपाकर उसमें पूर्वोक्त कन्द
को घी, हींग आदि से भून ले । भूने हुए कन्द को लेकर कर्पूर से सुगन्धित कर
ले । इसके बाद उसको पूगपट्ट में लपेटकर रख दे । सूरन कन्दपाक पथ्य, क्रिमि-
हर, बलकारक, अर्शनाशक, उत्तम जाठराग्निदीपक, हल्का, रुचिवर्द्धक, थकावट
दूर करनेवाला, विषनाशक, पौष्टिक, कुष्ठनाशक, उत्तम पोषक तथा वीर्यवर्द्धक
होता है ॥ ३१२-३१८ ॥
वनसूरणकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
प्रयत्नेन समादाय वनसूरणकन्दकम् ।
अनेनैव प्रकारेण पाकं कुर्याद्विचक्षणः ॥ ३१९ ॥
अग्निकृत्कटुको रूक्षो हृद्रोगशमनः परः ।
गुल्मस्थौल्यविपार्शोघ्नो वनसूरणकन्दकः ॥ ३२० ॥
वनसूरन कन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण—विद्वान् पाचक प्रयत्न-
पूर्वक जंगली सूरन के कन्द को लेकर पूर्वोक्त सूरन कन्दपाक की तरह पाक बना
ले । वनसूरन कन्दपाक स्वाद में कटु, जाठराग्निवर्द्धक, रूक्ष, उत्तम, हृदयरोग-
शामक, गुल्मरोग, स्थूलता, विषविकार तथा अर्श (बवासीर) रोग को नाश
करने वाला है ॥ ३१९-३२० ॥


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नलविरचितम्
कुमुदोत्पलकन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कुमुदोत्पलकन्दानि तावन्त्येव पचेत् क्रमात् ।
हितवृद्धिकरोनित्यं मधुरः पित्तनाशनः ॥ ३२१ ॥
कमलकन्द (भिसौंडा) का पाक बनाने की विधि तथा गुण—कुमुद तथा
कमल का कन्द लेकर पूर्वोक्त प्रकार से क्रमशः पका ले। यह कमलकन्दपाक हमेशा
हितकर, वृद्धिकारक, स्वाद में मधुर तथा पित्तनाशक होता है ॥ ३२० ॥
मूलककन्दपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मूलकस्य नवं कन्दं पचेदेवं च पाकवित् ।
लघु स्वादुतरं पथ्यं दीपनाग्निकरं परम् ॥ ३२२ ॥
मूलककन्द का पाक बनाने की विधि तथा गुण—पाकज्ञ पाचक मूली के
नवीन एवं कोमल कन्द लेकर पूर्ववत् पका ले । यह हल्का, स्वादिष्ट, पथ्य तथा
अच्छी तरह जाठराग्निदीपक है ॥ ३२१ ॥
चक्रवर्त्त (वास्तूक) शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घनसारार्द्रकैयुक्तं चक्रवर्त्तं सुकोमलम् ।
तरुणीदलमानीय क्रिमिभ्यः शोधयेच्च तत् ॥ ३२३ ॥
प्रक्षाल्य पात्रे निक्षिप्य छादयेदार्द्रवाससा ।
निधाय प्रवणी चुल्यां तत्र किञ्चिज्जलं हरेत् ॥ ३२४ ॥
रामठस्य पुनस्तत्र क्षीरमल्पं च सेचयेत् ।
चक्रवर्त्तं समुद्भूतैः रसैः सह पचेच्च तत् ॥ ३२५ ॥
तादृशं चक्रवर्त्तं तत्तप्ते पयसि निक्षिपेत् ।
तिरोधाय मुखं तस्य अर्द्धपाकं ततो भवत् ॥ ३२६ ॥
तमालोक्य पुनस्तत्र यथार्थं लवणं क्षिपेत् !
शकलानि पुनस्तत्र लशुनाईकयोः क्षिपेत् ॥ ३२७॥
जातपाकं तमादाय वासयेत् कर्पूरादिभिः ।
बद्ध्वा तु पूगपट्टेन भुक्तिकाल प्रदापयेत् ॥ ३२८॥
लघुग्राहि त्रिदोषघ्नं चक्षुष्यो मधुरोऽग्निकृत् ।
परं सद्यो ग्रहण्यर्शः पित्तरोगविकारनुत् ॥ ३२९ ॥
चक्रवर्त्त (बथुआ) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—कर्पूर तथा
अदरक से युक्त कोमल तथा तरुण बथुआ के पत्तों को लेकर क्रिमि आदि को साफ
कर ले और धोकर तथा पात्र (बटलोही) में रखकर गीले वस्त्र से ढक दे ।
इसके बाद प्रवणी (बटलोही) को चूल्हे पर रखकर उसमें थोड़ा जल मिला दे ।