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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 69 में से

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६० पाकदर्पणम्
काटकर तथा बटलोही में रखकर उसमें उचित मात्रा में सेन्धा नमक छोड़ दे ।
इसके बाद उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस छोड़ दे और चूल्हे पर पात्र को
रखकर पकावे । पकाते समय उसका मुख ढक कर पकावे । बिना ढके पकाने से
उसकी तिक्तता रह जाती है । अतः जब तक पाक होता है तब तक ढक कर रखे
जल में पाक हुआ जान कर उतार ले । इसके बाद नवीन घृत डाल कर घी के
साथ भून ले । एक दूसरे पात्र में हिंग के साथ भून ले और चातुर्जातचूर्ण
(दालचीनी, इलायची, तेजपत्र तथा नागकेशर ), मरिच का चूर्ण, मेथी चूर्ण तथा
जीरा का चूर्ण उसमें छोड़ दे । उसमें धनियाँ तथा जायफर का चूर्ण छोड़ दे और
कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य एवं कस्तूरी मिला दे । इसके बाद कुंकुम से सदृश रंग
होने तक ठंडा जल छोड़ता जाय और पकाता जाय । पाचक इन पूर्वोक्त सभी
द्रव्यों को मिलाकर उतार ले । नवीन पूगपट्ट नेत्र से बाँध कर गरम घी में छोड़
दे और खाने के लिये प्रदान करे । इस करैला फल के शाक को सुख पूर्वक खाय ।
यह सभी मनुष्यों के लिये हितकर, पथ्य, ज्ञानप्रद तथा सुपच है ॥ ४०९-४२१ ॥
अन्य विधिः
कानिचित्कारवल्ल्यास्तु फलानि पुनराहरेत् ।
पूर्ववच्छोधयेत्तानि कल्किन्या तीव्रधारया ॥ ४२२ ॥
छित्त्वा त्रिधा चतुर्धा वा पूर्ववत्पाकवित्पचेत् ।
भर्जयेत्पूर्ववत्तानि रक्षेदन्यत्र बुद्धिमान् ॥ ४२३ ॥
तण्डुलस्योदकं किञ्चित् सिद्धेऽङ्गाण्डे ततः सुधीः ।
कल्कं च मरिचादीनां क्षिप्त्वा तत्र विलोडयेत् ॥ ४२४ ॥
जलं च तादृशं सूदो जालिन्या च विशोधयेत् ।
भाण्डे निधाय प्रपचेत् चुल्ल्यां तन्मेलनं बुधः ॥ ४२५ ॥
कैटर्यं तत्र निक्षिप्य धान्याकं तु विनिक्षिपेत् ।
मेथीजीरकचूर्णं च क्षिप्त्वा क्वाथ्येऽवतारयेत् ॥ ४२६ ॥
घनसारिादिभिः सम्यक् तं क्वाथमधिवासयेत् ।
भोजनावसरे प्राप्ते भर्जितं च सुरक्षितम् ॥ ४२७ ॥
कारवल्लीफलं तत्र निक्षिप्याथ समाहरेत् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं सर्वमयहरं परम् ॥ ४२८ ॥
कारवल्लीफलमिदं श्लेष्मवातहरं परम् ॥ ४२९ ॥
करैलाफल का पाक बनाने की दूसरी विधि—पूर्वोक्त प्रकार से शोधित कुछ
करैला के फल को लेकर तीव्र धार वाले चाकू से तीन या चार टुकड़ा बनाकर
नलविरचितम् ६१
पाचक पूर्ववत् पकावे और पहले की ही तरह नवीन घी हींग आदि के साथ भून ले
तथा कहीं अच्छी तरह रख दे । इसके बाद बुद्धिमान् पाचक चावल का धोअन
किसी पात्र रखे और मरिच, चातुर्जात आदि का कल्क उसमें छोड़कर मिला दे ।
इस जल को छलनी से छान ले । पुनः पात्र में उस मिलित जल को रखकर चूल्हा
के ऊपर पकावे । उसमें जायफल छोड़कर धनिया छोड़ दे और मेथी एवं जीरा का
चूर्ण छोड़कर पक जाने पर उतार ले । भोजन का समय होने पर भून कर सुरक्षित
रखे हुए करैला के फल को उसमें छोड़ कर मिला दे तथा खाने को दे । यह
करैला का फलपाक जाठराग्नि दीपक, पाचक, रुचिकारक, अच्छी तरह सभी
प्रकार के रोगों को दूर करने वाला तथा कफ एवं वातविकारों को दूर करता
है ॥ ४२२-४२९ ॥
कोशातकीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोशातकी फलस्यैवं सुजातस्य नवस्य च ।
कृत्वा पाकादिकं तस्य दापयेद्भक्षयेद्बुधः ॥ ४३० ॥
कोशातकी फलं रुच्यं कफ-पित्त हरं लघु ।
कुष्ठ-मेह-क्रिमि-श्वास-कासारुचिनाशनम् ॥ ४३१ ॥
कोशातकी ( नेनुआ ) के फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—
सुन्दर नवीन नेनुआ के फल को लेकर पूर्वोक्त फलपाकनिर्माणविधि की तरह
पाक करे और बुद्धिमान् पाचक खाने के लिये दे और स्वयं खाय । यह कोशातकी
फल का शाक रुचिकारक, कफ-पित्तनाशक तथा हल्का है और यह कुष्ठरोग,
प्रमेह, क्रिमिरोग, श्वासवृद्धि, कास ( खांसी ) तथा अरोचक को नाश करता
है ॥ ४३०-४३१ ॥
बालकोशातकीफलस्य गुणाः
मधुरं गुरुपित्तघ्नं बालकोशातकीफलम् ।
श्लेष्मपित्तकरं दिव्यं विषमज्वरनाशनम् ॥ ४३२ ॥
बालकोशातकीफल ( बाल नेनुआ ) के फल का गुण—बालकोशातकीफल,
मधुर, भारी, पित्तनाशक, फक-पित्तहर, दिव्य ( उत्तम ) तथा विषम ज्वर नाशक
है ॥ ४३२ ॥
कोशातकीमहाकोशातकीफलयोर्गुणाः
कोशातकीफलं पक्वं लालासृक्क्रिमिनाशनम् ।
वृष्यं विषघ्नं मधुरं महाकोशातकीफलम् ॥ ४३३ ॥
छोटा तथा बड़ा नेनुआ के फल का गुण—छोटा नेनुआ का पका फल,