पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ पाकदर्पणम्
बध्नीयाद्भर्जितं नेत्रे पूगपट्टस्य तत्फलम् ।
पूर्ववन्निक्षिपेद्विद्वान् तप्ते सर्पिषि तत्फलम् ॥ २३१ ॥
पित्तश्लेष्मप्रशमनं बृहत्यास्तरुणं फलम् ।
शरीरबलकृद्वृष्यं धातुवृद्धिकरं परम् ॥ २३२ ॥
बैंगन (गोल बैंगन) का दूसरे प्रकार से शाक बनाने की विधि तथा गुण—
पूर्वोक्त प्रकार से बैंगन को काटकर गरम पानी में छोड़कर निकाल ले और स्वच्छ पात्र में रखे। इसके बाद बैंगन फल के पात्र में इमली तथा आम के फल को मिला दे और कुम्भी, कुस्तुम्बुरी तथा सल्कीफल (सलईफल) छोड़ दे। तदनन्तर सेन्धानमक, जीरा आदि मिलाकर हींग का तड़का देकर घी में भून ले और कर्पूर आदि से अच्छी तरह पुनः सुगन्धित बना ले। इसके बाद भर्जित बैंगनफल को पूगपट्ट के नेत्र में बाँधे तथा पूर्ववत् संतप्तघृत में छोड़कर विद्वान् पाचक पका ले। यह तरुण बृहतीफल (गोल बैंगन) का शाक पित्त एवं कफ को शान्त करने वाला, शरीरबलकारक, वीर्यवर्द्धक तथा रस-रक्तादिधातुओं को अच्छी तरह बढ़ाने वाला है ॥ २२९-२३२ ॥
विशिष्टप्रकारेण बृहतीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलं बृहत्यास्तरुणं संवृत्तं धारयेद् द्विधा ।
वेष्टयेदार्द्रवस्त्रेण भागमेकं तयोर्बुधः ॥ २३३ ॥
भाण्डे चेदितमपरं भागं चुल्यामपचेत्पुनः ।
पाकावसानपर्यन्तमन्यस्य जलमाविशेत् ॥ २३४ ॥
पक्वञ्च वेष्टयेद्भागमपक्वं पूगनेत्रयोः ।
दृढञ्च निक्षिपेद्विद्वान् तप्तसर्पिषि पूर्ववत् ॥ २३५ ॥
बृहत्याः फलभागस्य चित्रपाकः प्रदर्शितः ।
पाकं पादसमायुक्तं भागद्वयसमन्वितम् ॥ २३६ ॥
भोजनावसरे प्राप्ते प्रदद्याद् बृहती फलम् ॥ २३७ ॥
विशिष्टप्रकार से बृहतीफलचित्रपाक बनाने की विधि तथा गुण—
बैंगन के तरुण फल को दो प्रकार से ग्रहण करे। उन दोनों में से एक भागको आर्द्रवस्त्र से वेष्टित कर दे और भाण्ड (पात्र) में रखकर पकाये तथा दूसरे भाग को चूल्हे में पकाये। दूसरे भाग का जल पाक होने तक गिरने दे। इसके बाद पूगपट्ट के दो नेत्रों में पक्व तथा अपक्व भाग को वेष्टित कर दे। तदनन्तर विद्वान् पाचक संतप्त घी में पूर्ववत् छोड़कर पका लें। यह बैंगन के फल भाग का चित्रपाक प्रदर्शित
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किया गया। बैंगन के पूर्वोक्त पाक के चौथाई भाग के साथ दो भाग बैंगन फल को मिलाकर भोजन के समय प्रदान करे ॥ २३३-२३७ ॥
पनसफलस्य शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पनसस्य फलं रम्यं तरुणं कोमलं सह ।
आनीय विसृजेच्छित्त्वा कण्टकांश्च बहिःस्थितान् ॥ २३८ ॥
पुनस्तद्बहुधा छित्त्वाखण्डं खण्डस्थितं त्यजेत् ।
पाकार्थं तत्पुनः छित्त्वा प्रवणीभाण्डमाविशेत् ॥ २३९ ॥
निशारामठकैटर्यधान्यकांस्तत्र निक्षिपेत् ।
पनसस्य फलान्यप्सु पचेद्विज्ञानि तैः सह ॥ २४० ॥
नीरसं विसृजेत्तानि समादायाऽथवा सह ।
समादाय पुनस्तेषां कानिचित्त्वच्छकलानि च ॥ २४१ ॥
कुर्यात्सूक्ष्मं च दीर्घं च शस्त्रेण च विचक्षणः ।
कल्कं च मरिचादीनाञ्जम्बीराम्लेन मेलयेत् ।
कल्केन लेपयेत्तानि भर्जयेत्सर्षिषा पुनः ॥ २४२ ॥
यदा कुङ्कुमकान्तेयं तदा तान्यवतारयेत् ।
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारि च ॥ २४३ ॥
मातुलुङ्गदलच्छेदान् केतकीकुसुमानि च ।
कुम्भीं कुस्तुम्बुरीं तत्र सर्वाण्येतानि निक्षिपेत् ॥ २४४ ॥
नेत्रेण पूगपट्टस्य वेष्टयेत् सूदराट् पुनः ।
पोटलीं वेष्टितां पूर्णां तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २४५ ॥
लघु पित्तहरं वृष्यं वातघ्नं च बलप्रदम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं पनसस्य फलन्त्विदम् ॥ २४६ ॥
कटहल फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कटहल के सुन्दर कोमल तथा तरुण फल को लेकर उसके बाहर के कण्टकदार छिलकों को काटकर फेंक दे। फिर उसके अनेक टुकड़े बनाकर खण्ड रूप में स्थित टुकड़ों को निकाल दे। इसके बाद पाक करने योग्य खण्ड को पुनः काटकर बटलोही में रखे और हल्दी, हींग, कैटर्य (कायफर) तथा धनियाँ को उसमें छोड़ दें। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ पूर्वोक्त प्रकार से कटे हुए कटहल के फल को जल में पकाये। नीरस भाग उन सबों के साथ लेकर छोड़ दें। पुनः बुद्धिमान् पाचक उनके कुछ टुकड़ों को लेकर शस्त्र से काटकर छोटा तथा बड़ा टुकड़ा बनाये और मरिच, जीरा आदि के कल्क एवं जम्बिरी नींबू का अम्ल मिला दे। पुनः उस कल्क से कटहल के टुकड़ों को
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