पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ पाकदर्पणम्
का तरुण फल लेकर उसी के चर्या मिश्रित जल ( फिटकरी का पानी ) में अच्छी
तरह पकावे और चाकू से उनके कांटों को निकाल कर रख दे । पुनः उसके वृन्त
सहित दण्ड निकाल कर रख ले और उण्डूक फल को अलग लेकर काट ले तथा
घी के साथ भून ले । इसके बाद पुनः उस उण्डूक फल को चाकू से छोटा-छोटा
काट ले और सेन्धा नमक मसाला आदि घी के साथ छोड़ दे । इसके बाद दूध
तथा नारियल फल के टुकड़ों को मिलाकर सभी फल एवं कल्क को एकत्र कर
उण्डूक के फल के अन्दर के वृन्त सहित दण्ड को लेकर पूर्ववत् हाथ से फल
के आकार का बनावे और पूर्ववत् कण्टकों को यथा स्थान स्थान स्थापित कर दे ।
इसके बाद फल के आकार के विकृत हुए बिना ही घी में पुनः भून ले और कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों से अच्छी तरह सुगन्धित कर उतार ले । तदनन्तर पूगपट्ट के
नेत्र से पोटली बनावे तथा संतप्त घृत में रख दे । इसके बाद खाने के लिये प्रदान
करे । पूर्वोक्त कण्टकों को निकाल कर उसके अन्दर स्थित सुखप्रद स्वादिष्ट रस
को अमृत के सदृश खाने वाले को अर्पित करे । अर्थात् यह पाक अमृत के सदृश है
और खाने वालों के लिये सुखप्रद है ॥ ३७७-३८६ ॥
मुण्डकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलं मुण्डकमानीय छिन्द्यान्निष्पावमानतः ।
पूर्ववद्द्विपचेद्विद्वान् भूफलं भर्जयेत्तु पुनः ॥ ३८७ ॥
क्षीरेण विपचेत्कल्कं मरिचादिसमुद्भवम् ।
निक्षिपेत्तत्र निष्पावं सर्पिषा भर्जितं पुनः ॥ ३८८ ॥
निक्षेपेच्छकलं तत्र नारिकेलफलस्य च ।
निक्षिपेत् क्षुद्रपनसं फलं तत्र विभर्जितम् ॥ ३८९ ॥
दर्वीपुटेन तं पाकं समालोड्यावतारयेत् ।
तप्ते भाण्डे ततः सम्यक् घृतमासिच्य तत्र तु ॥ ३९० ॥
निक्षिपेच्च कणान् सूदः कुष्माण्डवटकोद्भवान् ।
पर्पटस्य कणांस्तत्र तत्फलं भर्जयेत्तु पुनः ॥ ३९१ ॥
ततोऽवतार्य तं पाकं कर्पूरेणाधिवासयेत् ।
कर्पूरपोटलीं कृत्वा तप्तसर्पिषि निक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥
ततश्च भुक्तिसमये प्रदद्यात्पाकमृत्तमम् ।
एष पाकः सुधास्तुल्यो वातपित्तहरः शुभः ॥ ३९३ ॥
सद्यः श्लेष्महरो वृष्यो लघुः स्वादुतरः शुभः ॥ ३९४ ॥
मुण्डक फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण — मुण्डक का फल लेकर
नलविरचितम् ५७
भटवांस के बराबर-बराबर काटे और विद्वान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से पकावे
पुनः भू-फल को भून ले और मरिच-धनिया आदि का कल्क मिलाकर दूध के साथ
पका ले । पुनः उसमें घी में भूना हुआ भटवांस तथा नारियल के टुकड़ों को मिला
दे । इसी प्रकार क्षुद्रपनस ( बाल कटहल ) के टुकड़ों को घी में भून कर मिला
दे । इसके बाद क ल्छुल से चला कर उस मुण्डक फल पाक को उतार ले । पुनः
एक गरम पात्र में घृत छोड़कर उसमें कुष्माण्डकण ( कोहड़ौरी के टुकड़ों ) तथा
पापड़ के टुकड़ों को छोड़ दे और मुण्डक फल पाक को मिलाकर भूने । इसके
बाद उस पाक को उतार कर कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य से सुगन्धित कर ले ।
पुनः कर्पूर की पोट ली बनाकर संतप्त घृत में रख दे । इस उत्तम पाक को भोजन
के समय दे । यह मुण्डक पाक अमृत के समान है और वात-पित्त को अच्छी तरह
दूर करता है । यह शीघ्र ही कफ को दूर करता है, वीर्य बढ़ाता है, हल्का तथा
अधिक स्वादिष्ट है ॥ ३८७-३९४ ॥
कारवल्लीफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शोधितं क्रिमिभिः सम्यक् कदुष्णं कोमलं नवम् ।
पाकार्थमाहरेद्विद्वान् कारवल्ली फलं ततः ॥ ३९५ ॥
मूलाग्रे विसृजेच्छित्त्वा कल्किन्यासस्य विचक्षणः ।
निक्षिपेत्प्रवणीभाण्डे कारवल्लीफलं ततः ॥ ३९६ ॥
काञ्जिकामिश्रितं सिञ्चेत् जलं तत्र पुनर्बुधः ।
चुल्यां निधाय तद्भाण्डं पचेत्तत्तिक्तमोचनम् ॥ ३९७ ॥
ततस्तस्मात्समादाय पुनरत्र विनिक्षिपेत् ।
पुनः पाकं प्रकुर्वीत (पटु जैस्तु रसैः) पटु जम्बु रसै बुधः ॥ ३९८ ॥
भर्जयित्वा पुनः सूदः सर्पिषा तत्फलं शनैः ।
तत्रैकदेशं प्रच्छिन्द्यात् पणमात्रं शलाकया ॥ ३९९ ॥
शकलं रक्षयित्वाथ फलमादाय सुदराट् ।
शलाकया सकोशञ्च बीजं छिन्द्यात् समुद्धरेत् ॥ ४०० ॥
रक्षेत् घटिकाकारकारवल्लीफलं बुधः ।
बीजकोशं तनुं छिन्द्यात् कल्किन्या तीव्रधारया ॥ ४०१ ॥
तत्रैव निक्षिपेत् क्षीरं वटकानामम्लसम्भवान् ।
नारिकेलफलोद्भूतपुष्पाकारकणान् क्षिपेत् ॥ ४०२ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाईकयोः कणान् ।
मरिचादिसमुद्भूतचूर्णं तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ४०३ ॥