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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

९८ | पाकदर्पणम्
कर्पूरादींश्च विन्यस्य घनीभूतघृतं क्षिपेत् ।
सर्वानितान् प्रकुर्वीत कल्काकारं शनैः बुधः ॥ ४०४ ॥
सुस्निग्धं प्रवणीभाण्डे कल्कमेतत्समाविशेत् ।
कल्कमेतत्समादाय यथा योग्यं प्रमाणवित् ॥ ४०५ ॥
कारवल्लोफलोद्भूतघटिकां पूरयेत्ततः ।
तद्रसं चारयेद्भिद्रांस्तदुत्थशकलानि च ॥ ४०६ ॥
नेत्रेण वेष्टयित्वाथ पूगपट्टेन शोभिना ।
उष्णे सर्पिषि निक्षिप्य फलमेतत्प्रदापयेत् ॥ ४०७ ॥
पथ्यं श्लेष्महरं नित्यं समीरणहरं पुनः ।
सर्बामयप्रशमनं कारवल्लीफलं त्विदम् ॥ ४०८ ॥
**कारवल्ली (करैला) फल का पाक (कलौंजी) बनाने की विधि तथा गुण—**विद्वान् पाचक क्रिमि आदि से अच्छी तरह शोधित, थोड़ा पका, कोमल, नवीन करैला के फल को पाक के लिये ग्रहण करे । इसके बाद उसके मूल तथा अग्रभाग को चाकू से काट कर फेंक दे तथा उस फल को बटलोही में रख कर उसमें काञ्जी मिश्रित जल छोड़ दे। तदनन्तर उस बटलोही को चूल्हा पर रख कर उसकी तिक्तता दूर करने के लिये पकावे । पुनः उस पात्र से निकाल कर दूसरी बटलोही में रक्खे तथा नमक के जल से पाक करे। इसके बाद बुद्धिमान् पाचक उस फल को धीरे-धीरे घी के साथ भून कर उसके एक स्थान को पैसा के बराबर शलाका से काट ले और उस टुकड़ा को सुरक्षित रख ले । पुनः उस फल को लेकर शलाका से कोश सहित बीज को काट दे तथा निकाल दे और घंटी की (घंटी के आकार) के आकार का बनाकर रख ले । तदनन्तर बीजकोश को तेज धार वाली चाकू से पतला-पतला काटे और उसी में खट्टे दूध के वटक को छोड़ दे । साथ ही नारियल के फल के पुष्प के आकार के टुकड़ों तथा लहसुन एवं अदरक के टुकड़ो को छोड़ दे । पुनः मरिच, धनिया, मसाला, नमक आदि के चूर्ण, कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य तथा गाढ़ा घी छोड़ दे। इसके बाद बुद्धिमान् पाचक इन सबों को कल्क के आकार का बना ले और अच्छी तरह स्निग्ध पात्र में रक्खे। तदनन्तर उचित प्रमाण को जानने वाला पाचक इस कल्क में से लेकर घटिकाकार करैला के फल के अन्दर भर दे और उसके रस को चलाकर पहले के टुकड़े से बन्द कर दे। इसके बाद पूगपट्ट के सुन्दर रस्सी से आवेष्टित कर गरम घी में छोड़ दे और इस कारवल्ली फल पाक को खाने के


नलविरचितम् | ५९
लिये दे । यह कारवल्ली फल पाक (करैला की कलौंजी) पथ्य, श्लेष्म हर, वात हर तथ सभी रोगों को शान्त करने वाला है ॥ ३९५-४०८ ॥
ग्रन्थान्तरे कारवल्लीफलपाकविधिर्गुणाश्च
कानिचित्कारवल्ल्यास्तु फलानि सुशुभानि च।
समादाय पुनस्तानि सूदः पाकविदाम्बरः ॥ ४०९ ॥
शोधितं क्रिमिभिः सम्यग्बहिरन्तः स्थितं पुनः ।
छित्वा च विसृजेत्तेषामग्राणि च ततः पुनः ॥ ४१० ॥
संछिद्य च पुनस्तानि शकलानि समं ततः ।
निधाय प्रवणीभाण्डे पुनस्तानि ततः परम् ॥ ४११ ॥
सैन्धवस्य ततश्चूर्ण विकिरेत्तेषु मानतः।
जम्बीराम्लजलं सिञ्चेत् पुनस्तेषु प्रमाणतः ॥ ४१२ ॥
पचेच्चुल्यां ततस्तानि भाण्डमारोप्य पाकवित् ।
छादयित्वा पचेत्तानि विधानेन तदाननम् ॥ ४१३ ॥
पिधानेन विना तेषां पाकश्चेत्तिक्तता भवेत् ।
अतः पिधानं संरक्षेत् यावत्पाकं समन्ततः ॥ ४१४ ॥
जले विलीनपाकस्य तानि ज्ञात्वावतारयेत् ।
नवं घृतं समासिच्य सर्पिषा तानि भर्जयेत् ॥ ४१५ ॥
अन्यस्मिन् प्रवणीभाण्डे भर्जयेद्द्रामठेन तत् ।
चातुर्जातकचूर्णञ्च चूर्णञ्च मरिचस्य च ॥ ४१६ ॥
चूर्णं च विकिरेत्तत्र मेथ्याजीरकसम्भवम् ।
कुस्तुम्बरीं च तत्रैव कैटर्यं च विनिक्षिपेत् ॥ ४१७ ॥
घनसार्रादिना सम्यक् कस्तूरीं च विनिक्षिपेत् ।
तथा कुङ्कुमचूर्णं च किञ्चित्किञ्चिद्द्रिमाम्बु च ॥ ४१८ ॥
एभिः साकं मेलयित्वा सूदस्तान्यवतारयेत् ।
पूगपट्टस्य नेत्रेण बद्धवा तानि नवेन च ॥ ४१९ ॥
निक्षिपेदुष्णसंयुक्ते तानि सर्पिषि दापयेत् ।
एतच्च कारवल्यायाः फलं भुञ्ज्यात्सुखप्रदम् ॥ ४२० ॥
हितकृत्सर्वजन्तूनां पथ्यं ज्ञानप्रदं लघु ॥ ४२१ ॥
**अन्य ग्रन्थ के अनुसार करैला का पाक बनाने की विधि—**पाकशास्त्र में प्रवीण पाचक बाहर-भीतर क्रिमि आदि से शुद्ध किये गये सुन्दर करैला के फलों को लेकर उनके अग्रभागों को काटकर फेंक दे पुनः उनके बराबर-बराबर टुकड़े