पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ पाकदर्पणम्
कृत्वा तु पोटलीं विद्वान् अन्तराट्टालके न्यसेत् ।
प्रदद्याद्भोजने काले रम्भास्तम्भाननुत्तमान् ॥ २१७ ॥
लघून् स्वादुतरान् रुच्यान् पवित्रान् पित्तनाशनान् ॥ २१८ ॥
कदली स्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक बनाने की विधि तथा गुण—कदली
खम्भ के अन्दर के भाग को लेकर उसकी त्वचा को फेंक दे और उसके मूलभाग
तथा अग्रभाग को बुद्धिमान् पाचक चाकू से काटकर करवीर ( कनेर ) के पत्ते
के आकार का बनाकर रख ले । उसके बीच का दण्ड लेकर चावल के आकार
को काट ले । दूसरे दण्ड को लेकर चावल के कण के आकार का काट ले । बुद्धिमान्
पाचक कुछ अन्य दण्ड को लेकर चने के आकार का काट ले और कुछ दण्ड को
चक्राकार काट कर बना ले । इसके बाद उन सबों को अलग बटलोही में रखे
और उसमें सेन्धानमक छोड़कर सुन्दरता के लिये हल्दी का चूर्ण छोड़ दे । तदन-
न्तर जम्बीरी नींबू का रस छोड़कर उनको आग पर पकावै । इसके बाद घी, हींग
का तड़का तथा गरम मसाला आदि छोड़कर तथा भूनकर उतार ले । उतारने
के बाद पूगपट्ट में रखकर उनको पूर्ववत् सुगन्धित पुष्प, कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुवासित कर ले और उनकी पोटली बनाकर अन्तराट्टालक (रेफ्रीजेटर )
में रखे । इस उत्तम रम्भास्तम्भ के अन्तर्गर्भ का शाक भोजन के समय दे । यह
शाक हल्का, स्वादिष्ट, रुचिकर, पवित्र तथा पित्तनाशक है ॥ २११-२१८ ॥
वृन्ताकशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
बालं तरुणमानीय वृन्ताकं सुमनोहरम् ।
वृन्ताग्रं विसृजेच्छित्त्वा कलिकन्या तीव्रधारया ॥ २१९ ॥
पुनश्च तत्फलं द्वेधा भिन्नं कृत्वा सुबुद्धिमान् ।
सजले निक्षिपेद् भाण्डे बृहत्या सदृशं फलम् ॥ २२० ॥
स्विद्येपो निशाभाण्डे निक्षिपेदपरे कटुम् ।
रामठं तत्र कैटर्यं धान्याकं च विनिक्षिपेत् ॥ २२१ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाईकयोः कणान् ।
एतस्य मेलनं कृत्वा पचेच्चुल्यां विचक्षणः ॥ २२२ ॥
बृहतीफलभिन्नानि निक्षिपेत् तप्तवारिणि ।
आदाय तानि पक्वानि निक्षिपेद्भाजने शुभे ॥ २२३ ॥
सम्भारैर्मरिचादीनां कल्कं कुर्याद् विधानतः ।
चिञ्चापक्वफलाम्लेन दध्ना कल्कं विलोडयेत् ॥ २२४ ॥
नलविरचितम् ३३
कुर्यात् कल्केन तेषाञ्च लेपनं बहिरन्ततः ।
भर्जयेत्तानि लिप्तानि गोघृतेनाथ सूदवित् ॥ २२५ ॥
अवतार्य पुनस्तानि कर्पूरेणाथ वासयेत् ।
शुचौ तु पूगपट्टस्य नेत्रे तानि समादिशेत् ॥ २२६ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा तप्ते सर्पिषि निक्षिपेत् ॥ २२७ ॥
स्वादु वृष्यं रुचिकरं त्रिदोषशमनं परम् ।
इदं बृहत्यास्तरुणं फलं पुष्टिविवर्द्धनम् ॥ २२८ ॥
वृन्ताक (बैगन) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—बाल तरुण
(थोड़े दिन का उत्पन्न हुआ) सुन्दर बैंगन लेकर तीक्ष्णधार वाले चाकू से बैंगन
के अग्रभाग (भेंटी) को काटकर फेंक दे । फिर बुद्धिमान् पाचक बैंगन फलके दो
टुकड़े कर जल वाले पात्र में छोड़ दे । बृहती (गोल बैंगन) के समान फल को
काटकर हल्दी के पात्र में रखकर जल से सींचे और दूसरे पात्र में रख कर सोंठ
के साथ जल से सींचे । इसके बाद उसमें हींग, कैटर्य ( कायफल ) तथा धनियां
का चूर्ण छोड़ दे । फिर उसमें लहसून तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे और
इन सबों को एक में मिलाकर चूल्ही पर रखकर पकावे । बृहती फल (बैंगन) को
टुकड़ा-टुकड़ा काटकर गरम जल में छोड़कर उन पके फलों को लेकर स्वच्छ पात्र
में रखे । इसके बाद मरिच, धनियां, जीरा आदि मसालों का विधिपूर्वक कल्क
बनावे और इमली के पके फल की खटाई तथा दही में कल्क को मिला दे । इसके
बाद इस कल्क से बैंगन के टुकड़ों को बाहर-भीतर लेप कर दे तथा पाकशास्त्र को
जानने वाला पाचक उन कल्कलिप्त बैंगन के टुकड़ों को गाय के घी के साथ भून
ले। पुनः उसको उतार कर कपूर से सुगन्धित बना ले और पुनः स्वच्छ पूगपट्ट के
नेत्र (फोंफी) में भर दे । इसके बाद पोटली बनाकर संतप्त घी में छोड़ दे और
उसमें से निकाल कर खाने को दे । यह शाक स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, रुचिकारक
तथा अच्छी तरह त्रिदोषशामक है । यह परिपुष्ट बैंगन का फल पुष्टिवर्द्धक
होता है ॥ २१९-२२८ ॥
बृहती फलस्यान्यविधशाकनिर्माणविधिगुणाश्च
तिन्तिडीचूतफलयोर्भाण्डे कुर्याच्च मेलनम् ।
कुम्भीं कुस्तुम्बरीं तत्र निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ॥ २२९ ॥
सैन्धवादींस्तु निक्षिप्य भर्जयेद्रामठादिभिः ।
घनसारादिना सम्यक् तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २३० ॥