पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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के अन्दर रखकर भोजन के समय भोजन करनेवाले को दे। उसके एक ही पदार्थ
से अन्य पदार्थों का संयोग होने पर बहुत सी शाखायें होती हैं। यह पाचक के
हस्तकौशल एवं उसके बुद्धिवैभव के ऊपर निर्भर करता है कि एक ही पदार्थ से
अनेक प्रकार के भोज्य शाक पदार्थों का निर्माण कर ले। ये शाक के प्रकार सभी
रोगों को नष्ट करते हैं तथा सुख को देनेवाले हैं। ये उत्तम कल्प वात-पित्त को
शान्त करने वाले तथा कल्याणकारक हैं ॥ १९०-१९९ ॥
रम्भाफलशाक निर्माणविधिर्गुणाश्च
वह्नरम्भाफलं रम्यं स्निग्धं स्थूलं सुदीर्घकम् ।
तदादाया पुनः छिन्द्यात् मूलमग्रं त्वचं पुनः ॥ २०० ॥
पुनश्च कलनीकोट्या भिन्नं कुर्वीत तद्विधा ।
त्रिधा वापि चतुर्धा वा च्छिन्द्यात्तियंक् च तत्पुनः ॥ २०१ ॥
प्रक्षाल्य प्रवणीभाण्डे निक्षिपेद् वारिणा च तान् ।
साधु मुद्गं यथायोग्यं प्रक्षिपेत्तत्र वारि च ॥ २०२ ॥
चुल्यामारोप्य तद्भाण्डे पचेत्तद्बहिना बुधः ।
अवतीर्य ततो रम्भाफलं पक्वं सुशोभनम् ॥ २०३ ॥
सितञ्च तत्र चूर्णञ्च मरीचिश्च विनिक्षिपेत् ।
प्रताष्य प्रवणीभाण्डमपरं सूदराट् ततः ॥ २०४ ॥
सिञ्चेत्तत्र नवं सर्पीरामठं तत्र निक्षिपेत् ।
घट्टयेद्द्वावपेत्तप्ते द्रव्यं सूदः पुनः पुनः ॥ २०५ ॥
तथैव तत्फलं तत्र निक्षिपेत्तत्प्रमाणवित् ।
छाद्येत्तन्मुखं तस्य पिधानेन प्रयत्नतः ॥ २०६ ॥
उत्क्षेपणमपक्षेपं कुर्यादन्तश्च तत्फलम् ।
प्रततं पाकमालोक्य वासयेत्तत्फलं ततः ॥ २०७ ॥
निक्षिपेद्वासितैः पुष्पैः पट्टपूगस्य तद्बुधः ।
कर्पूरप्रमुखैर्दिव्यैस्तत्पुनश्चाधिवासयेत् ॥ २०८ ॥
शैत्यं माभूत्ततस्तस्य उष्णत्वस्यानिवृत्तये ।
अन्तराट्टालके तच्च निक्षिपेत्किञ्चिदुष्णके ॥ २०९ ॥
दापयेद्भोजने काले तदादाय सुबुद्धिमान् ।
पित्तारुचिप gather प्रशमनं मेध्यं स्वादुतरं महत् ।
देहसारमिदं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ २१० ॥
**केला का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**गठा हुआ सुन्दर, स्निग्ध,
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स्थूल तथा बड़ा केला का फल लेकर उसके मूल भाग, अग्रभाग तथा छिलका को
काटकर निकाल दे और चाकू से दो भाग कर दे। अथवा तीन भाग या चार भाग
तिरछा काटे । इसके बाद उनका प्रक्षालन कर प्रवणी भाण्ड, (बटलोही) में
जल के साथ छोड़ दे। स्वच्छ एवं साफ मूँग की दाल तथा जल उसमें छोड़ दे।
तदनन्तर उस पात्र को चूल्हा पर रखकर बुद्धिमान् पाचक आग से पकावे। इसके
बाद अच्छी तरह पके हुए केला के फल को उतार कर उसमें मिस्री तथा मरिच
का चूर्ण छोड़ दे और-बार वार पाचक दूसरे बटलोही को गरम कर उसमें नवीन
घी तथा हींग का तड़का देकर उस केला के परिपक्व फल को छोड़ दे। इसके बाद
गरम रहते ही उसको कलछुल से घोटे और पतला बना ले।
पूर्वोक्त प्रकार से केला के फल को उसके प्रमाण को जानने वाला पाचक
भाण्ड में छोड़ दे और ढक्कन से उसे ढक दे। उत्क्षेपण एवं अपक्षेपण (झोंककर)
के द्वारा उस फल को ऊपर-नीचे कर दे। पाक हो जाने पर सुगन्धित द्रव्यों से
सुगन्धित कर ले। इसके बाद पूगपट्ट में रखे तथा सुगन्धित कर्पूर आदि दिव्य
द्रव्यों से अधिवासित कर ले। ठंडा न हो जाय तथा उसकी गर्मी बनी रहे इसके
लिये थोड़ा गरम अन्दर की अट्टालिका (रेफ्रिजेटर) में रखे और बुद्धिमान
पाचक उसमें से निकालकर भोजन के समय पर दे। यह पित्त विकार तथा अरुचि
को शान्त करता है, मेधा के लिये हितकर है तथा बहुत स्वादिष्ट होता है। यह
शरीर के ओज को बढ़ाता है, पथ्य है तथा इन्द्रियों को बल देनेवाला है॥
कदलीस्तम्भशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
राजरम्भान्तरागर्भमादाय त्वचमुत्सृजेत् ।
तन्मूलाग्रे ततश्छित्वा दात्रेण विसृजेद् बुधः ॥ २११ ॥
करवीरदलाकारं कृतं तत्तत्प्रदापयेत् ।
मध्यदण्डं समादाय छिन्द्यात्तण्डुलवत्पुनः ॥ २१२ ॥
दण्डमन्यं पुनश्छिन्द्यात् कणावत्तण्डुलस्य च ।
चणकाकारवच्छिन्द्यात् दण्डमन्यं सुबुद्धिमान् ॥ २१३ ॥
चक्राकारं च कुर्वीत स्तम्भरम्भातरूद्भवम् ।
निक्षिपेत्प्रवणीभाण्डेष्वेतान् विद्वान् पृथक् पृथक् ॥ २१४ ॥
सैन्धवं तेषु निक्षिप्य शोभार्थं रजनीं क्षिपेत् ।
जम्बीरारम्लं च निक्षिप्य पचेत्तान् वह्निना ततः ॥ २१५ ॥
सम्भारादीन् विनिक्षिप्य भर्जयित्वावतारयेत् ।
पूगपट्टेषु निक्षिप्य वासयेत्पूर्ववच्च तान् ॥ २१६ ॥