पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ पाकदर्पणम्
तण्डुलीय (चौराई) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पूर्वोक्त प्रकार
से शोधित नवीन चौराई को लेकर चना के शाक सदृश पकावे । चौराई का शाक
हल्का, पित्तादिदोषनाशक, उत्तम वातविकारहर, नेत्र के लिये हितकर, जाठराग्नि-
दीपक, रुचिकारक, दुग्धवर्द्धक तथा स्तन के रोगों को नाश करने वाला है। यह
मूत्रकृच्छ्रशामक, पित्तनाशक तथा रक्तातिसार को दूर करता है ।। ३५४-३५५ ।।
महावाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
महावाष्पं समादाय पचेदेवं विधानतः ।
पित्तदोषहरं सम्यक् श्लेष्मदोषहरं सदा ॥
अपथ्यं श्लेष्मलो बल्यः सारो गुरुतरः परः ॥ ३५६ ॥
महावाष्प (महामार्छा) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-महावाष्प
(महामार्छा) का शाक लेकर पूर्वोक्त प्रकार से विधि पूर्वक पकावे । यह अच्छी
तरह पित्तदोष तथा कफविकार को दूर करनेवाला, अपथ्य, कफकारक, बलवर्द्धक,
दस्तावर तथा भारी होता है ।। ३५६ ।।
रक्तवाष्पशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
रक्तवाष्यं समादाय पचेदेवं विचक्षणः ।
समीरणहरो नित्यं वाष्पोऽयं सर्वरोगनुत् ॥ ३५७ ॥
रक्तमार्छा का शाक बनाने की विधि तथा गुण-विद्वान् पाचक लालमार्छा
को लेकर पूर्वोक्त प्रकार से विधिपूर्वक पकावे । यह रक्तवाष्पशाक हमेशा वात-
विकार को दूर करनेवाला तथा सभी रोगों को नाश करता है ।। ३५७ ।।
उपोदकीशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उपोदकीं समादाय शोधयेत्क्षालयेज्जलैः ।
लवणादींश्च निक्षिप्य पक्त्वा राज्ञे प्रदापयेत् ॥ ३५८ ॥
स्वादुपाकरसा बल्या गुर्वी शीता रुचिप्रदा ।
चक्षुष्या वृंहणी कार्या श्लेष्मनिद्रा विधायिनी ॥ ३५९ ॥
उपोदकी (पोई) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-पोई के शाक
को लेकर उसको अच्छी तरह साफ कर ले और जल से प्रक्षालन कर ले। पुनः
नमक मसाला आदि छोड़कर पकावे और राजा को खाने के लिये दे । यह स्वाद
में मधुर रसवाली, बलकारक, दुष्पच, शीतल, रुचिप्रद, नेत्र के लिये हितकर, मांस-
वर्द्धक किन्तु दुर्बल हरनेवाली तथा कफ एवं नींद लानेवाली है ।। ३५८-३५९ ।।
नलविरचितम् ५३
चित्रपाके तिक्तालाबुफलपाकविधिर्गुणाश्च
विचित्रशीलपाको यस्तिक्तालाबुफलं नयेत् ।
तत्तिक्तमोचनं कुर्यादन्यवस्तु प्रयोगतः ॥ ३६० ॥
गुञ्जामूलरसैस्तावत् तिक्तालाबु फलं पचेत् ।
अथवा यष्टिसम्भूत रसैर्वापि पचेद्बुधः ॥ ३६१ ॥
अथवा विपचेत्तच्च कुण्डलीरसयोगतः ।
अनेनैव प्रकारेण कुर्यात्तिक्तमोचनम् ॥ ३६२ ॥
पूर्ववच्च कृते पाके मधुरत्वं प्रजायते ।
वासनां पूर्ववद्दत्त्वा वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ ३६३ ॥
वातश्लेष्महरं पथ्यं दीपनं पाचनं भवेत् ।
चित्रपाक में कड़वी कद्दू फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण -यह
विचित्र प्रकार का शाक है जो कड़वे कद्दू फल का होता है । कड़वा कद्दू का
फल लेकर दूसरे वस्तुओं के संयोग से उसकी कड़ुवाहट को दूर करे । गुञ्जा की जड़
के रस से कड़वी लौकी के फल को पकावें । अथवा मुलेठी के साथ कड़वी लौकी
को पकावे अथवा गुडूची के रस के साथ पकावे । इसी प्रकार से कड़वी लौकी
की कड़ुआहट को दूर करे । इस प्रकार कड़ुआहट को दूर करने से उसमें मिठास
(मधुर रस) आ जाती है । अच्छी तरह परिपक्व हो जाने पर कर्पूर आदि द्रव्यों
से सुगन्धित बनाकर तथा पूगपट्ट से वेष्टित कर खाने लिये दे । यह वात-कफ को
दूर करनेवाला, पथ्य, जाठराग्निदीपक तथा पाचक होता है ॥ ३६०-३६३ ॥
तिक्तकोशातकीफलशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नवं तरुणमानीय तिक्तकोशातकीफलम् ॥ ३६४ ॥
तत्तिक्तमोचनं कुर्यात् जम्बूकल्क प्रयोगतः ।
ततः पाके कृते तस्मिन् मधुरत्वं प्रजायते ॥ ३६५ ॥
वासयेद्धनसारेण बद्धवा नेत्रेण दापयेत् ।
इदं रुचिकरं पथ्यं समीरणविजृम्भणम् ॥ ३६६ ॥
तिक्ततरोई के फल का शाक बनाने की विधि तथा गुण - नवीन तथा तरुण
तींत तरोई के फल को लेकर जामुन के कल्क के साथ पकाकर उसकी तींताई को
दूर करे । जामुन के कल्क के साथ पाक करने पर उसमें मिठास आ जाती है ।
पक जाने पर कर्पूर आदि से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से बांधकर खाने के
लिये दे । तिक्त तरोई फल का शाक रुचिकारक, पथ्य तथा वातनाशक होता है ।