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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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५४ पाकदर्पणम्
तिक्तपटोलफलस्य पाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पटोलस्य फलं तिक्तं समादाय सुकोमलम् ।
जम्बीररससंयोगात् कुर्यात्तिक्तविमोचनम् ॥ ३६७ ॥
पाकं च पूर्ववत्कृत्वा शेषं पूर्ववदर्पयेत् ।
एतद्रुचिकरं पथ्यं वातश्लेष्महरं परम् ॥ ३६८ ॥
**तिक्तपटोलफल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—**कोमल तितऊआ
परवल के फल को लेकर तथा जम्बीरी निबू के रस के साथ पकाकर उसकी
तिताई को दूर कर ले । पुनः पूर्वोक्त पाक-विधि के अनुसार पकाकर तथा नमक,
मसाला आदि मिलाकर, कर्पूर आदि से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट से बाँधकर खाने
के लिये प्रदान करे। यह तिक्तपटोलफलपाक रुचिकारक, पथ्य तथा वात-कफ को
अच्छी तरह दूर करनेवाला है ॥३६७-३६८॥
कारवल्लीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अव्रणङ्कारवल्ल्याश्च दलमानीय कोमलम् ।
तिक्तं मूलेन पर्णेन श्वदंष्ट्रायाः परित्यजेत् ॥ ३६९ ॥
अथवा तिक्तपर्णैर्वा तत्तिक्तं परिमोचयेत् ।
पुनः पाके कृते तच्च मधुरत्वं प्रपद्यते ॥ ३७० ॥
यथार्हं पाकवित्तत्र कुर्यात्सम्भारमेलनम् ।
ततोऽवतार्य तत्रैव वासनादीन् समाचरेत् ॥ ३७१ ॥
विशदं दीपनं रुच्यं श्लेष्मकृमिसमीरनुत् ॥ ३७२ ॥
**करैली के पत्ते का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कृमिदंश आदि
विकाररहित कोमल करैले के पत्तों लेकर गोखुरू की जड़ तथा पत्तों से तिक्तता
को दूर करे अथवा नीम के पत्तों के साथ पकाकर तिक्तता दूर करे। तिक्तता
दूर करने के बाद पुनः पाक करने पर वह मधुर हो जाता है । इसके बाद अच्छी
तरह पाक को जानने वाला उसमें सम्भार (नमक मसाला आदि) को मिला दे
और उतारकर वहीं पर कर्पूर आदि से सुगन्धित बना ले। यह विशद, जाठराग्नि-
दीपक, रुचिकारक, कफविकार, कृमिरोग तथा वातविकार को दूर करता है।
जीवन्तीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तरुणं पर्णमानीय जीवन्त्याः क्रिमिवर्जितम् ।
पचेच्छ्रीहस्तिनीपर्णैर्यद्वा पौनर्नवैर्दलैः ॥ ३७३ ॥
सम्भारमेलपर्यन्तं पाकं कुर्याच्च तत्पुनः ।
तस्मिन् पाके पुनस्तानि निक्षिपेद्भर्जितान्यपि ॥ ३७४ ॥


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नलविरचितम् ५५
भर्जितानि पुनस्तानि वासयित्वाथ वेष्टयेत् ।
स्थापयेत्पूर्ववत्तानि दापयेत्सूपकोविदाः ॥ ३७५ ॥
लघु स्वादुतरं रम्यं वातपित्तादिनाशनम् ॥ ३७६ ॥
**जीवन्ती पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कृमिदंश-आदि से रहित
जीवन्ती के तरुण पत्तों को लेकर कर्कटी (ककड़ी = त्रपुसविशेषः) के पत्र के
साथ या पुनर्नवा के पत्र के साथ पाक करने के बाद पुनः सम्भार (नमक-मसाला
आदि) मिलाने पर्यन्त पाक करे । पाक हो जाने पर पुनः उनको भूनकर घी
छोड़ दे । इसके बाद भूने हुए उस शाक को सुगन्धित कर पूगपट्ट से वेष्टित करे
और रक्खे । तदनन्तर पाकशास्त्रवेत्ता उस शाक को खाने के लिये दे । यह जीवन्ती
पत्रशाक हल्का, स्वादिष्ट, मनोरम तथा वात-पित्तादिदोषों को नाश करनेवाला
होता है ॥ ३७३-३७६ ॥
उण्डूकफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
उण्डूकस्य फलं सम्यक्-आनीय तरुणं बुधः ।
उण्डूकस्योदरे सम्यक् पचेच्चार्याविमिश्रिते ॥ ३७७ ॥
कल्किन्या तक्षयित्वा च विसृजेत्तस्य कण्टकान् ।
धारयित्वा पुनस्तस्य सवृन्तं दण्डमुद्धरेत् ॥ ३७८ ॥
अन्यत्र निक्षिपेद्दण्डं उण्डूकं दण्डवर्जितम् ।
छिन्द्याद्द्विधा छिन्नान् भर्जयेद्भाजनेधृतेः ॥ ३७९ ॥
कल्किन्या च पुनः सूक्ष्मं छिन्द्यात्तदुण्डुकं फलम् ।
सम्भारान् सैन्धवादींश्च सर्पिषा सह निक्षिपेत् ॥ ३८० ॥
ततो दुग्धं च शकलं नारिकेलफलस्य च ।
एभिः सार्द्धं च कुर्वीत फलं कल्कञ्च तत्पुनः ॥ ३८१ ॥
उण्डूकस्य फलान्तस्थं सवृन्तं दण्डमुत्तमम् ।
करेणादाय कुर्वीत फलाकारं च पूर्ववत् ॥ ३८२ ॥
आकारस्य विना वार्धं सर्पिषा भर्जयेत्पुनः ॥ ३८३ ॥
घनसारदिना सम्यक् वासयित्वावतारयेत् ।
नेत्रेण पूगपट्टस्य कुर्यात्तत्पोटलीं बुधः ॥ ३८४ ॥
तप्ते घृते पुनस्तानि निक्षिप्याथ प्रदापयेत् ।
विसृज्य कण्टकानेतान् छलदन्तःस्थिरं रसम् ॥ ३८५ ॥
भोक्तुर्नित्यं सुखं सम्यक् अर्पयेदमृतं तथा ॥ ३८६ ॥
**उण्डूक फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण—**बुद्धिमान् पाचक उण्डूक